कितनी सुंदर उसकी वाणी, मित्र बना प्रभु, भज ले प्राणी

 



 


 


 


कितनी सुंदर उसकी वाणी, मित्र बना प्रभु, भज ले प्राणी
ओ३म् वयमु त्वा तदिदर्था इंद्र त्वायन्तः सखायः। कण्वा उक्थेभिर्जरन्ते-सामवेद-उ0-१-२-३-१,
सकाव्य विनय
हे सर्वजन हिताय सर्व जन सुखाय परम आनंद के दाता मित्र परमात्मन्! मित्रवर्ग मेधावी जन आपकी ही स्तुति, प्रार्थना, उपासना, पूजन, वंदन, करते हैं।
हम भी आपको चाहें आपके अनन्य भक्त हो आपकी राह को पकड़ें आपके चहेते मित्र बन इस मानव काया को सफल कर सकें ऐसी हमें शक्ति, भक्ति, बुद्धि, युक्ति प्रदान कीजिये, जिससे चलते, फिरते, उठते, बैठते निरन्तर तेरा ध्यान कर तव आनंद का लाभ उठा सकें।
सभी मेधावी, विद्वान, ज्ञानी, ध्यानी, योगीजन आपको ही आपकी विमल वेदवाणी द्वारा पूजन वंदन करते हैं। आपको ही मित्र बना अपने पुरुषार्थ को सफल करते हैं। हे सर्वश्रेष्ठ, सबसे ज्येष्ठ  सबके हितैषी परमात्मन्! समस्त ज्ञानीजन विषय भोगों से ऊपर उठकर आपकी ही चाहना करते हैं, आपके अनुकूल हो अपने अनुकूल आपको बनाते हैं। हे प्रभु आज हम आपसे यही प्रार्थना करते हैं आप हमारे भी मित्र बन जाइये, हर सुख दुःख में आप ही हमारे सहायक बन हमारा मार्ग प्रशस्त करते हो। हे भगवन! हमारी इस फ्रेंडशिप रिक्वेस्ट को इंकार मत करना, आप ही हमारे असली फेसबुक फ्रेंड हो, आपसे ही हमें अपने असली चेहरे का पता लगता है। आपके ही द्वारा हम अपने आपको ठीक रख पाते हैं। हे नाथ हमारी मैत्री की इस विनय को स्वीकार करिये और अपनी मंगलमय छांव हमें प्रदान कर हमें आश्वस्त करिये।



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