केन उपनिषद् की झलक

 


 



 


 


केन उपनिषद् की झलक


        सामवेद से संबंधित इस उपनिषद् का पहला शब्द " केन इषितम्.."  के कारण इसका नाम केनोपनिषद् पड़ा। इस में चार खण्ड और कुल 33 श्लोक हैं।
 
   मन और इन्द्रियां : मन इन्द्रियों के द्वारा विषयों की ओर भागता है। इन्द्रियां भोग के साधन मात्र है। कौन है जो इन्द्रियों के माध्यम से देखता, सूंघता, सुनता है ?  उत्तर में उपनिषद्कार लिखता है कि शरीर में स्थित आत्मा मन के साधन के माध्यम से इन्द्रियों के द्वारा विषयों को ग्रहण करता है। जो व्यक्ति आत्मा के स्वरूप को समझ लेता है  वह इन्द्रियों के वश में नहीं रहता अपितु इन को वश में कर लेता है। अपनें अमृत स्वरूप को पहचान कर वह आध्यात्मिक स्तर पर जीने लग जाता है


 "..धीरा: प्रेत्यस्मात् लोकात् अमृता भवन्ति"  ब्रह्म का स्वरूप:  चेतन आत्मतत्व को आंख से नहीं देखा जा सकता, वाणी से बतलाया नहीं जा सकता । इन्द्रियों से बाहर के पदार्थों का बोध होता है। जिन सांसारिक पदार्थों का इन्द्रियां ज्ञान कराती हैं, आत्मा उन्हीं की पूजा(प्रेम) करता रहता है। ऋषि का कथन है कि वह संसार ब्रह्म नहीं  है। शरीर इन्द्रियों का निर्माता संसार का आधार कण-कण में जो व्याप्त है वही ब्रह्म है। उस से महान कोई और नहीं है।


      ब्रह्म के स्वरूप को पूर्ण रूप से कोई नहीं जानता। ज्ञानी जन भी उस के थोड़े से अंश को ही जानते हैं। जो व्यक्ति यह मानता है कि वह ब्रह्म को पूर्ण रूप से नहीं जानता, मानो वह ब्रह्म को जान गया है। इसके विपरीत जो घोषणा करता है कि मैं ब्रह्म को जान गया हूँ वह वस्तुतः उस को नहीं जानता।


   ब्रह्म ज्ञान प्रतिबोध से सम्भव है। जब इन्द्रियों का संबंध अपने विषयों  से अर्थात बाहर की ओर होता है तो जो ज्ञान होता है उसे बोध कहते है। जब इंद्रियां विषयों की ओर जाना बंद कर दे और व्यक्ति भीतर की ओर खोजता है तो मन की चंचलता समाप्त हो जाती है। भौतिक आकर्षण उसे विचलित नहीं करते, उस समय का आंतरिक अनुभव जो उसे धारणा, ध्यान, समाधि द्वारा प्राप्त होता है उसे प्रतिबोध कहते हैं । उसी से अमृत प्राप्त होता है।


 


 


 



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