ज्ञानमयी अमृतवाणी 


 



 


 


 


 


 


   ज्ञानमयी अमृतवाणी 


      🍁विद्या एक ऐसा धन है जिसे न तो कोई छीन सकता है और न चुरा सकता है और न नष्ट ही कर सकता है। यही एक धन ऐसा है जो खर्च करने से घटने की बजाय बढ़ता है, जितना खर्च करो उतना बढ़ता है।  


     विद्या माता के समान पोषण करती है, पिता के समान संरक्षण करती है, दुःख- विपत्ति में पत्नी के समान  धैर्य और उत्साह प्रदान कर दुःख को दूर करती है, विदेश में मित्र की तरह साथ देती है, चंहु ओर कीर्ति फैलाती है और बन्धु की तरह जीवन पर्यन्त साथ निभाती है।


  " विद्या ददाति विनय  " के अनुसार विद्यावान को विनम्र और विनयशील होना चाहिए, अहंकारी और शेखीबाज़ नही। यदि विद्या पाकर भी विनम्रता धारण नही की जाती तो विद्या प्राप्त करना निष्फल ही रहा। 


     विद्यावान जितना ज्ञान प्राप्त करता है उतना ही वह यह समझता है कि वह बहुत कम जानता है और बहुत कुछ जानना बाक़ी है जो अपने को बुद्धिमान समझे वह मूर्ख होता है।




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