एकलव्य का अंगूठा--भाग तीन 

 



 


 


 


एकलव्य का अंगूठा--भाग तीन 


गुरु द्रोणाचार्य द्वारा अंगूठा गुरुदक्षिणा में मांगे जाने के बाद एकलव्य ने अपनी सेवाएँ मगध नरेश जरासंध को अर्पित कर दीं। 
जरासंध के साथ होते हुए भी उसके मन में गुरु के प्रति क्रोध या प्रतिहिंसा नहीं थी और इस बात के लिए महाअधर्मी जरासंध भी एकलव्य को धन्य धन्य कहने पर विवश हो गया। 


अब इस प्रसंग में कितने लोगों ने गुरु द्रोणाचार्य द्वारा ली गई गुरुदक्षिणा का औचित्य समझा??? 


सदैव की भांति हम अपने अधकचरे अविकसित उधार ज्ञान पर आधारित दर्शन के दृष्टिकोण से फिर भी गुरु द्रोणाचार्य को इस प्रसंग में स्वार्थी और क्रूर ही मान रहे हैं तो हमसे अधिक बौद्धिक दरिद्र इस पृथ्वी पर आज कोई नहीं है। 


बहुधा तर्क दिया जाता है कि ज्ञान पर सबका अधिकार है। विद्या पक्षपात नहीं करती। गुरु को हर जिज्ञासु को शिक्षा प्रदान करना चाहिए, वो भेदभाव नहीं कर सकता। 


एकलव्य के प्रसंग को ध्यान से देखो। वो भेदभाव नहीं है। वो एक सामरिक दृष्टि से लिया गया कठोर निर्णय है जो भविष्य में एकलव्य जैसे भावुक किंतु अबोध शिष्यों को द्रोणाचार्य से दूर रखने में सहायक हुआ। 


आचार्य द्रोण कोई सामान्य शिक्षक नहीं थे। न वो कोई भजन कीर्तन सिखाने वाले गुरु थे जो हर कोई उनके पास आकर सीख लेता। 


वो उस कालखंड के सर्वश्रेष्ठ सामरिक विषयों के आचार्यों में अग्रणी थे। उनके दायित्व सामान्य नहीं रहे होंगे। 
एक एकलव्य भविष्य में कितना बड़ा उत्पात सिद्ध हो सकता था और फिर अनेकों के लिए एक विद्या चोरी का मार्ग खोल सकता था ये गुरु द्रोणाचार्य की दूरदृष्टि से छुपा नहीं रह गया था। 


आज भी यदि कोई DRDO जैसे युद्धक विद्याओं के केंद्रों से तकनीक चुरा ले तो क्या उसे मात्र आदिवासी या ब्राह्मण होने के आधार पर क्षमा कर दिया जाएगा??? 


सामरिक तकनीकों के आचार्यों का प्रथम कर्तव्य है कि वो तकनीक गलत हाथों में न पहुंचे और भावुक व्यक्ति सही नहीं माना जाता है सामरिक महत्व के विषय में। 
एकलव्य की चेतना कितनी प्रबुद्ध थी इसका प्रमाण तो यहीं है कि वो वासुदेव कृष्ण की शरण में न जाकर जरासंध के शरणागत हुआ और अपनी निष्ठा उसे समर्पित की। 


हमारे ऐतिहासिक कथानक बहुत उच्च स्तरीय प्रतीकवाद का संवहन करते हैं। 
इन्हें समझने के लिए हमें भी कुछ ऊपर उठना होता है। 


नमस्ते सदा वत्सले मात्र भूमे,,,,,


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