ईश्वर सदा सर्वत्र हमारे साथ है

 


 



 


 


 


व्यक्ति अपने आप को असहाय, असमर्थ, कमजोर, दुखी, परेशान, निराश समझता ही तब है जब वह अपने आप को अकेला देखता है।
हम कभी अकेले नहीं है वह महान ईश्वर सदा सर्वत्र हमारे साथ है अनुभव नहीं होने के कारण हम अकेले मान बैठे हैं। क्योंकि प्रकृति की अविद्या रूपी चादर मध्य में आड़े आ गयी है जैसे किसी मंच पर कोई नाटक हो रहा हो, जब तक पर्दा रहता है तब तक भीतर का किरदार नजर नहीं आता, जैसे ही पर्दा ऊपर होता है पूरा दृश्य स्पष्ट नजर आजाता है। अतः इस प्रकृति के अविद्या आवरण को हटाए बिन अकेलापन दूर नहीं हो सकता है। विद्या रूपी डोर से अविद्या रूपी पर्दे को हटाएं, आप दोनों साथ नजर आएंगे, किसी भी समय, किसी भी स्थान से वह आपसे अलग हो ही नही सकता, उसकी इतनी हिम्मत नहीं कि वह आपको छोड़ सके, आप अवश्य उसको कभी साथ अनुभव करते हो, कभी दूर।
देखा जाय तो अकेलेपन को हम दूर वहां से करना चाहते हैं जो कभी हमारे संग रह ही नहीं सकते।
क्या सब जगह सब समय आपके चहेते, प्रेमी रहते हैं नहीं न।
तो फिर जो प्रेमी कभी तुम्हें नहीं छोड़ता, तुम उसे क्यों छोड़े रहते हो इसलिए तुम अकेलेपन के अनुभव से उकता जाते हो।
भूल सुधारो, तनिक विचारो।
आप अकेले नहीं उस एक के साथ हो जिसने तुम्हें अपनी गोद में सदा सर्वत्र भरा हुआ है।
आगे से कोई तुमसे पूछे तुम कितने हो यदि स्वयं को बताते हो तो उत्तर देना दो और कोई साथ में एक व्यक्ति और हो तो कहना तीन।
 


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