ईश्वर कभी शरीर धारण नहीं करता

 



 


 


 ईश्वर कभी शरीर धारण नहीं करता ।


*ओ३म् स पर्यगाच्छुक्रमकायमव्रणमस्नाविरं शुद्धमपापविद्धम् ।कविर्मनीषी परिभू: स्वयम्भूर्याथातथ्यतोऽर्थान् व्यदधाच्छाश्वतीभ्य: समाभ्य: ।।
(यजुर्वेद अध्याय 40,मन्त्र 8 )


भावार्थ :--


वह परमात्मा सबमें व्यापक, शीघ्रकारी और अनन्त बलवान, शुद्ध, सर्वज्ञ,सब का अन्तर्यामी, सर्वोपरि विराजमान, सनातन, स्वयंसिद्ध है ।वह अपनी जीवरूप सनातन अनादि प्रजा को अपनी सनातन विद्या से यथावत अर्थों का बोध वेद द्वारा कराता है ।वह कभी शरीर धारण नहीं करता अर्थात वह कभी भी जन्म नहीं लेता।उसमें छिद्र नहीं होता, वह नाड़ी आदि के बन्धन में नहीं आता।वह कभी भी पापाचरण नहीं करता।उसे क्लेश,दु:ख,अज्ञान कभी नहीं होता।वह राग द्वेष आदि गुणों से पृथक है।


परमेश्वर की स्तुति करने का तात्पर्य यह है कि परमेश्वर के जो गुण, कर्म, स्वभाव हैं,वैसे ही गुण,कर्म और स्वभाव अपने भीतर धारण करना।जैसे वह न्यायकारी है तो हम भी न्यायकारी बनें।यदि कोई व्यक्ति केवल भांड के समान परमेश्वर के गुणों का गुणकीर्तन तो करता रहता है और परमेश्वर के किसी भी गुण को अपने चरित्र में धारण नहीं करता और अपने चरित्र को नहीं सुधारता , तो ऐसे व्यक्ति का परमेश्वर की स्तुति करना व्यर्थ है ।


(आर्य समाज के संस्थापक महर्षि स्वामी दयानंद सरस्वती जी द्वारा लिखित पुस्तक सत्यार्थ प्रकाश के समुल्लास 7 से)


अग्ने नय सुपथा राये अस्मान् विश्वानि देव वयुनानि विद्वान्।
युयोध्यस्मज्जुहुराणमेनो भूयिष्ठां ते नम उक्तिं विधेम।
~ऋग्वेद-1/189/1,यजुर्वेद-5/36,7/43 व 40/16


अर्थ - हे सब जगत के प्रकाश करने वाले सकल सुखदाता परमेश्वर ! आप जिससे सम्पूर्ण विद्यायुक्त हैं, कृपा करके हम लोगों को अच्छे धर्मयुक्त आप्त लोगों के मार्ग से, सम्पूर्ण प्रज्ञान और उत्तम कर्म प्राप्त कराइये और हमसे कुटिलतायुक्त पापरूप कर्म को दूर कीजिये। इस कारण हम आपकी नम्रता पूर्वक प्रशंसा सदा किया करें और सर्वदा आनंद में रहें।


भावार्थ~ कोई कहता है कि "भगवान बुद्ध के मार्ग पर चलो", कोई कहता है कि "ईसा के मार्ग पर चलो" तो कोई भगवान महावीर, गांधी के मार्ग पर। ऐसे नारे लगाने वालें अज्ञानी हैं,साम्प्रदायिक हैं। देखिये मनुष्य चाहे कितना भी विद्वान हो, महान हो,फिर भी वह अपूर्ण है,अल्पज्ञ है। कभी मत कहो कि अमुक मनुष्य के मार्ग पर चलो (चाहे वह कितना भी महापुरुष हो) 


अपितु मनुष्यों के मार्ग पर नहीं,प्रभु के मार्ग पर चलो,सन्मार्ग पर चलो।अतः प्रभु के उपासक बनो,मनुष्य के नहीं।


परमपिता परमात्मा दयालु , सबका रक्षक , बुद्धि का देने वाला ,शान्ति और आनन्द का दाता है, दुखो से छुटकारा दिलाने वाला और प्राणी मात्र का सहारा है !
वही प्यारा प्रभु सभी को पिता के समान आश्रय देता है , वही माँ के जैसा ममत्व और अबोध बालक के समान सबको अपनी गोद मे रखकर सुरक्षा देता है , उसकी सानिध्य अमृत के समान है !


गोवित्पवस्व वसुविद्धिरण्यविद्रेतोधा इन्दो भुवनेष्वर्पितः।
त्वं सुवीरो असि सोम विश्ववित्तं त्वा नर उप गिरेम आसते।। सामवेद -९५५।।


हे प्रकाशस्वरूप परमात्मन्, आप ज्ञान के प्रदाता हैं। आप पवित्र हैं। आप हमें भी पवित्र करें। आप समस्त ब्रह्मांड में व्याप्त हैं। आप सर्वोपरि बलयुक्त वीर हैं। आप सर्वज्ञाता हैं। विद्वान लोग आप की ही उपासना करते हैं।  (सामवेद -९५५)


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