ब्रह्मचर्योपदेश

ओ३म्



 


 


अद्यतनीय ब्रह्मचर्योपदेश 
          महाभारत में महर्षि व्यास जी कहते हैं कि -
   ब्रह्मचर्यं_दहेद्राजन्सर्वपान्युपासितम् " अर्थात् ब्रह्मचर्य की उपासना करने से सत्याचारी और इन्द्रियधारी मनुष्यों के सर्वदोष दूर हो जाते हैं ! चूंकि यह #ब्रह्मचर्य शब्द दो शब्दों से मिलकर बनता है । 
१. ब्रह्म इसका अर्थ है -ईश्वर,वेद,ज्ञान और वीर्यादि ।
२. चर्य इसका अर्थ है -चिंतन, अध्ययन, उपार्जन और रक्षणादि ।इस प्रकार ब्रह्मचर्य के १. ईश्वर चिंतन, २. विद्या अध्ययन, ३. ज्ञान का उपार्जन, ४. वीर्य रक्षणादि अर्थ हुए। 
      इन सबका परस्पर घनिष्ठ सम्बन्ध है । वैसे #ब्रह्मचर्य का नाम लेते ही लोगों में वीर्य रक्षा का भाव उठ जाता है। इसी को ही लोग ब्रह्मचर्य समझते हैं । किन्तु, एक साथ ईश्वर चिंतन करना, वेद पढ़ना ,ज्ञान और विद्या प्राप्त करना तथा वीर्य रक्षा करने का नाम ब्रह्मचर्य है। 
विशेष :- अकेले ब्रह्मचर्य के साधने से ही समस्य समस्याओं का समाधान स्वतः ही हो जाएगा ।


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