भक्त की भावना

                                                         


 



                                         


     धर्म, आचार और भक्ति इन शब्दों का दुरुपयोग संसार में जितना हो रहा है, उतना शायद ही किसी शब्द का हुआ होगा। धर्म आचार और भक्ति के ही नाम पर इतने बड़े-बड़े अत्याचार संसार में हुए हैं कि उनकी गणना नहीं हो सकती। संसार की प्रायः सभी जातियाँ तथा देशों के इतिहास इनसे भरे पड़े हैं। निष्पक्ष उदारभाव से विचारने पर बुद्धिमान् मनुष्य को यही निश्चय हो रहा है कि धर्म आचार और भक्ति के वास्तविक स्वरूप को न समझ कर ही ये सब अनर्थ भूमण्डल में हुए वा हो रहे हैं। 
     'धर्म' (=धरति लोकं, धार्यते येन जगत्) नाम उन नियमों (Principal Laws of nature) का है, जिसके आधार=आश्रय पर यह संसार चल रहा है। 'आचार' उस व्यवहार का नाम है, जिस को करने से मनुष्यों का परस्पर कभी कुछ भी झगड़ा नहीं हो सकता। दूसरों के साथ वही वर्ताव करो जैसा कि तुम चाहते हो कि दूसरे तुम्हारे साथ करें। 🔥"आत्मवत् सर्वभूतेषु" "Do with others as you wish to be done by others" "हर चे बर खुद मपसन्दी बर दीगरां मपसन्द"। यह है धर्म और आचार का विशुद्ध स्वरूप। क्या कोई कह सकता है कि इस धर्म और आचार की विश्व में कभी किसी भी अवस्था में आवश्यकता नहीं? यह धर्म और आचार तो मानव समाज से तीन काल में भी लुप्त नहीं हो सकता। एक जैसा आवश्यक, नहीं-नहीं अन्तर्हृदय की सच्ची भावना से अपनाने योग्य है, और रहेगा। 
     'भक्ति' भी अन्तरात्मा की हृदय के अन्तःपटल में वर्तमान रहने वाली उन गहरी भावनाओं तथा उद्गारों का नाम है, जो विना किसी विडम्बना के सम्पूर्ण विश्व के नियन्ता प्रभु की सत्ता का स्वयं अनुभव करते हुए उत्पन्न होती है। और जिन भावनाओं का बाह्य जगत् वा लोकाचार से कुछ भी सम्बन्ध नहीं होता। पिता-पुत्र अथवा शिशु और माता की वह किलोले हैं, जो बिना किसी शब्द का उच्चारण किये स्नेह से परिपूर्ण अवस्था में होती हैं। 
     इसके विपरीत लोक-समाज के विचार से लोकषणा की दृष्टि से किसी विशेष समुदाय को अपने पीछे चलाने के लिए ध्यान के नाम पर की हुई हमारी अनेक क्रियायें "भक्ति" की परिभाषा में नहीं आ सकतीं। 
     इन मिथ्या भक्तियों से पृथक करने के विचार से ही परम तपस्वी, परम ईश्वर-भक्त महायोगी जितेन्द्रिय, निष्पक्षपात महात्मा ऋषि दयानन्द सरस्वती ने भक्तिमार्ग के इस ग्रन्थ ‘आर्याभिविनय’ की वेदमन्त्रों के आधार पर रचना की, अपनी कल्पनामात्र के आधार पर नहीं। 
     संसार में प्रायः यही देखा जाता है कि यम नियमों का पालन किये विना ही हम लोग 'भक्त' बनाना चाहते हैं। ऐसे मार्ग पर चलनेवाले "कनफकवे" गुरुओं की ही आजकल दाल गलती है। यम नियमोंवाले (जैसे इस ग्रन्थ की) सीधे-सादे शब्दों की भक्ति को तो सूखी भक्ति के नाम से पुकारा जाता है। यह भ्रम कहीं-कहीं आर्य कहलानेवालों में भी देखा जाता है। वे कोई भड़कीली चमाचम भक्ति चाहते हैं। सो ये तो प्रकृति के गुण हैं। दोनों आत्मा और परमात्मा तो इससे पृथक् हैं। हां, जीव अज्ञानवश उसमें फँस जाता है, तभी उसको यत्न भी करना पड़ता है। 
     पवित्र वेदवाणी में सूक्तों के सूक्त ऐसी भक्ति से परिपूर्ण हैं। जिनमें वही स्वाभाविक (Natural) भावों का ही संचार है। बनावटी बातों का उनमें लेश भी नहीं। यह इस ग्रन्थ के एक-एक मन्त्र का ध्यानपूर्वक पाठ करने से ज्ञान हो सकता है। 
     अन्तर्ह्रदय की उपर्युक्त भावनाओं के कुछ अंश इस ग्रन्थ में से सहृदय पाठकों के सम्मुख उपस्थित किये जाते हैं 
     "आपका तो स्वभाव ही है कि अङ्गीकृत को कभी नहीं छोड़ते। सो आप सदैव हम को सुख देंगे, यह हम लोगों को दृढ़ निश्चय है"। पृष्ठ १४।
     "हम सब लोग आपकी प्राप्ति की अत्यन्त इच्छा करते हैं। सो आप अब शीघ्र हमको प्राप्त होओ। जो प्राप्त होने में आप थोड़ा भी विलम्ब करेंगे, तो हमारा कुछ भी कभी ठिकाना न लगेगा"। पृष्ठ २१२। 
     "हे मनुष्यों! उसको मत भूलो। विना उसके कोई सुख का ठिकाना नहीं है"। पृष्ठ २२०। 
     "किञ्च हम लोग तो आपके प्रसन्न करने में कुछ भी समर्थ नहीं हैं। सर्वथा आपके अनुकूल वर्तमान नहीं कर सकते । परन्तु आप तो अधमोद्वारक हैं, इससे हमको स्वकृपाकटाक्ष से सुखी करें"। पृष्ठ १९६। 
     "जैसे पुत्र लोग अपने पिता के घर आनन्दपूर्वक निवास करते हैं, वैसे ही जो परमात्मा के भक्त हैं, वे सदा सुखी ही रहते हैं........."। पृष्ठ ८८। 
     यह है हृदयङ्गम-सच्ची भावना से परिपूर्ण श्रद्धायुक्त भक्त की भावना, जो एक साक्षात्कृतधर्मा परम ईश्वरभक्त के उद्गार हैं। जिनके एक-एक शब्द पर घण्टों विचार करने पर भी अधिक से अधिक आनन्द प्रतीत होता है। जिस दिन जिस घड़ी इस मार्ग पर चलने का दृढ निश्चय कर चुकेंगे, और हमें मार्ग की अनुकूल सामग्री की डटकर खोज होगी, तभी इन भोले-भोले सरल शब्दों का महत्त्व हमें समझ में आवेगा। 
     आत्मरोग की ओषध के इस महाभण्डार में न जाने कब कौन सी ओषध उपयुक्त सिद्ध हो=कारगर साबित हो। यह तो निश्चय ही है -
     🔥"स हि दीर्घकालनैरन्तर्यसत्काराऽऽसेवितो दृढभूमिः।" योग० १।१४॥ 
     इस भक्ति-मार्ग का निरन्तर उपासक ही अपने निर्दिष्ट लक्ष्य तक पहुंच सकता है। प्रभु कृपा करें हम इस पथ के अनुगामी बनें !!! 


भक्ति-मार्ग और कर्म-योग
     वर्तमान समय में कर्मण्यता और भक्ति ये दोनों परस्पर विरुद्ध कहे जाते हैं। वैदिक भक्तिवाद इससे सर्वथा विपरीत है। वह तो 🔥'ईशा वास्यम्' के साथ 🔥'कुर्वन्नेवेह कर्माणि' = संसार में कर्मशील बनो, और कोई मार्ग नहीं, यही पुनः-पुनः पुकार कर कह रहा है । कर्म-मार्ग के प्रतिपादक अन्य भी ग्रन्थ हैं, परन्तु जितना निस्सन्देह विना किसी लाग-लपेट के कर्मण्यता का प्रतिपादन वेद करता है, उतना कोई दूसरा ग्रन्थ नहीं करता। यह बात इस ग्रन्थ [आर्याभिविनय] को देखने से स्पष्ट विदित हो जाती है -


     (१)🔥पाहि नो अग्ने रक्षसः पाहि धूर्तरराष्णः। 
     पाहि रीषत उत वा जिघांसतो बृहद्भानो यविष्ठय॥
     ऋ॰ १।३६।१५
     हे सर्वशत्रुदाहकाग्ने परमेश्वर! राक्षस हिंसाशील दुष्ट स्वभाव देहधारियों से हमारी पालना करो। जो हमको मारने लगे तथा जो मारने की इच्छा करता है, हे महातेज बलवत्तम! उन सबसे हमारी रक्षा करो।" पृष्ठ ३२
     (२) "हे महाराजाधिराज परब्रह्मन्! (क्षत्राय) अखण्ड चक्रवर्ती राज्य के लिये शौर्य विनय पराक्रम और बलादि उत्तम गुणयुक्त कृपा से हम लोगों को यथावत् पुष्टकर। अन्य देशवासी राजा हमारे देश में कभी न हों, तथा हम लोग पराधीन कभी न हों।" पृष्ठ १८०-१८१ 
     (३) "अन्योन्य प्रीति से परम वीर्य पराक्रम से निष्कण्टक चक्रवर्ती राज्य भोगें। हममें नीतिमान् सज्जन पुरुष हों।" पृष्ठ ११२ 
     (४) "वीरों के चक्रकर्ती राज्य को प्राप्त हों।" पृष्ठ ८६ 
     (५) "हे कृपासिन्धो भगवन्! ... हमारा राज्य अत्यन्त बढ़े।" पृष्ठ ४४
     (६) “साम्राज्याधिकारी सद्यः कीजिये।" पृष्ठ ४३
     सच्चे ईश्वर-भक्त की भावना में कर्मण्यता कहाँ तक है, तथा ऐसी कर्मण्यतापूर्ण भक्ति कहाँ तक ग्राह्य है, यह सहृदय पाठक स्वयं समझ सकते हैं। 
     आर्य और निष्कर्मण्य ये दोनों परस्पर विरोधी हैं। वैदिक कर्मवाद का सच्चा स्वरूप यही है।[आर्याभिविनय-भूमिका]  लेखक - पदवाक्यप्रमाणज्ञ पण्डित ब्रह्मदत्तजी जिज्ञासु 
प्रस्तुति -  ‘अवत्सार’


 


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