अष्टावक्र

 


 


 


                   


 


 


 


अष्टावक्र ने जो कहा , स्पष्ट कहा , कोई उसकी मनमानी विवेचना कर ले , यह असंभव है और इसीलिए यह महागीता है।


ज्ञः सचिन्तोऽपि निश्चिन्तः सेन्द्रियोऽपि निरिन्द्रियः।
सुबुद्धिरपि निर्बुद्धिः साहंकारोऽनहङ्कृतिः॥१८- ९५
(अष्टावक्र: महागीता) 


 धीर पुरुष चिंन्तावान होने पर भी चिंतारहित होता है, इन्द्रिय युक्त होने पर भी इन्द्रिय रहित होता है, बुद्धि युक्त होने पर भी बुद्धि रहित होता है और अहंकार सहित होने पर भी निहंकारी है।
ज्ञानी चितासहित भी चितारहित है, इंद्रियसहित भी इंद्रियरहित है, बुद्धिसहित भी बुद्धिरहित है और अहंकारसहित भी निरहंकारी है।


ज्ञानी चिंतासहित भी चितारहित है। 


ज्ञानी पुरुष को कभी यदि चिंता करने का कारण आ जाए, तो चिंता करता है, परन्तु फिर भी किसी गहरे तल में चिंता के पार खड़ा रहता है। हम यदि उसे प्रश्न दे, हल करने को तो वह हल करने का प्रयास करेगा, परन्तु उस प्रयास में डूब नहीं जाता, भूल नहीं जाता, भटक नहीं जाता, स्मृति नहीं खोती। यदि एक ज्ञानी जंगल में भटक जाए, तो रास्ता तो खोजेगा,  चिंता तो करेगा कि बाएं जाऊं, कि दाएं जाऊं? यहां जाने से निकल पाऊंगा बाहर कि यहां जाने से निकल पाऊंगा? परन्तु फिर भी निश्चित होगा, चिंता में भी निश्चित होगा। चिंता चलती रहेगी और भीतर कोई भी डांवाडोल न होगा। अकंप।


इद्रियसहित भी इद्रियरहित है। 


जो ज्ञानी अंतिम अवस्था पर पहुंच गया उस की भी इंद्रिया हैं। आँख   है। परन्तु ज्ञानी,  यह जानता है कि आँख देखती नहीं, देखता कोई और है। कान हैं। परन्तु ज्ञानी जानता है कान सुनता नहीं, सुनता कोई और है। कान तो द्वार है, जिस पर भीतर का सुननेवाला बैठा है। आँख तो द्वार है, जिस पर भीतर झांकने वाला बैठा है।


            तब सारी इंद्रियां द्वार हो जाती हैं। द्वार की तरह इंद्रियां सुंदर हैं। परन्तु जब भीतर का स्वामी इंद्रियों में खो जाता है और जो द्वार होने चाहिए, वे दीवार हो जाती हैं, और जिन्हें दास होना चाहिए वे सिंहासन पर विराजमान हो जाती हैं, तब भूल हो जाती है। ज्ञानी प्रत्येक वस्तु को उसके स्थान पर रख देता है। जो जहां है,वहां है। आँख आँख के स्थान  पर, कान कान के स्थान है। न तो कान स्वामी है, न आँख स्वामी है। स्वामी भीतर बैठा है। भीतर, बहुत गहरे भीतर बैठा है, जहां इंद्रियों की कोई पहुंच नहीं है। जहां हम आँख से देखना चाहें तो देख न सकेंगे, क्योंकि इंद्रियों के पीछे बैठा है स्वामी। इंद्रिया बाहर देखती हैं, स्वामी भीतर है।


इंद्रियसहित भी इद्रियरहित है, बुद्धिसहित भी बुद्धिरहित है।


ज्ञानी कोई मूढ़ नहीं है। जब आवश्यकता होती है, बुद्धि का उपयोग करता है, जैसे आवश्यकता होती है तो पैर का उपयोग करता है। जब आवश्यकता होती है, तर्क का उपयोग करता है। जब आवश्यकता होती है तो ज्ञानी विवाद कर सकता है। वस्तुत: ज्ञानी ही विवाद कर सकता है। क्योंकि बुद्धि एक उपकरण मात्र है। और वह स्वामी की तरह बुद्धि को अपने हाथ में खेल की तरह, खिलौने की तरह उपयोग कर लेता है। बुद्धि एक यंत्र है। परन्तु ज्ञानी बुद्धि के साथ अपने को तादात्म्य नहीं करता है।


बुद्धिसहित भी बुद्धिरहित है और अहंकारसहित भी निरअहंकारी।


ज्ञानी भी तो मैं शब्द का उपयोग करता है। सम्भवतय अज्ञानी से ज्यादा बलपूर्वक करता है। अज्ञानी क्या करेंगे? अज्ञानी तो डरते-डरते करते हैं, मैं कहते हैं तो कंपते कंपते कहते हैं। 


 कृष्ण को सुनें ...


सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं वज।


 कहा अर्जुन से, छोड़ छाड़ सब व्यर्थ, धर्म इत्यादि, मेरी शरण आ। यह कोई ज्ञानी ही कह सकता है। मेरी शरण आत्र: मामेकं शरणं वज। मुझ एक की शरण आ। हम साधारणत: सोचते हैं कि ज्ञानी तो कहेगा मैं आपके पैर की धूल, मैं तो कुछ भी नहीं। परन्तु थोड़ा ज्ञानियों को सुने। 


*बुद्धपुरुष कार्य कारण के नियमों में बाधा नहीं बनते।


अनवरोध। जो होता है, होने देता है। तो किसी क्षण में यदि आवश्यकता हो, तो ज्ञानी अहंकार का भी उपयोग करता है। और किसी क्षण में आवश्यकता हो तो विनम्रता का भी उपयोग करता है। परन्तु हर अवस्था, जो भी ज्ञानी से होता है, ज्ञानी उसके बाहर बना रहता है। चाहे नींद हो, चाहे चिंता हो, चाहे इंद्रियां हों, चाहे बुद्धि विचार हो और चाहे अहंकार हो। ज्ञानी किसी भी कृत्य में नहीं समाता।*


श्री कृष्ण तो युद्ध में उतर गये, इतना बड़ा युद्ध करवा दिया। कृत्य से नहीं सोचना है। कृत्य का कोई मूल्य ही नहीं है, क्योंकि कृष्ण कृत्य के बाहर है। वास्तव में जिसने ऐसा जाना कि मैं कर्ता नहीं हूं, वही तो ज्ञानी है।   


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