वेदामृत

-: वेदामृत :-


न तस्य प्रतिमा अस्ति यस्य नाम महद् यशः ।


हिरण्यगर्भ इतयेष मा हिंसीत्येषायस्मान्त जात इत्येषः ।। यजुर्वेद 32/


शब्दार्थः- तस्य उस परमात्मा की प्रतिमा - मूर्ति, नाप टोल, तुल्यता आदि, न अस्ति-कोई भी नहीं है । यस्म नाम जिसका नाम सारण धर्मयुक्त कर्म आचरण द्वारा । महत यशः- मनुष्यों के महान यश का. कारण-है ।


हिरण्यगर्भः-वह परमात्मा सूर्य, बिजली, नक्षत्रो आदि का रचयिता और आधार है ! इति एषः इस प्रकार से उस अन्तर्यामी को प्राने के लिए उसकी उपासना करता हूँ यस्मात न जातः-जिस परमात्मा ने कभी जन्म नहीं लिया है । इति एषा इस प्रकार मैं उसकी उपासना करता हूँ । मा-मुझको, न मा हिंसीत - परमात्मा ताड़ना न दे, मैं परमात्मा की आज्ञाओं के विमुख आचरण न करूं । इति एष इस प्रकार मैं उस परमात्मा को जानता हूँ ।


भावार्थ:-वेद मन्त्र में स्पष्ट शब्दों में बताया है कि परमात्मा को कोई नापतोल रूप रंग काया आदि नहीं है। मन्त्र दूसरी पंक्ति में यह भी बताता है कि प्रभु ने कभी जन्म नही लिया, वह कभी उत्पन्न नहीं हुआ । अन्य वेद मन्त्रो (यजु० ४०-८) में कहा हुआ है कि परमात्मा की मनुष्यों की भांति कोई मांसपेशी आदि नहीं होती है । इस कारण परमात्मा की कोई भी वास्तविक मूर्ति चित्र आदि नहीं बनाई जा सकती । इस प्रकार परमात्मा मनुष्यों के रूप में पृथ्वी पर जन्म भी नहीं लेता है।


     आम हिन्दु जनता चाहें वेदों को अपना आदि मूल ग्रन्थ मानती है, पर वास्तविकता यह है कि अधिकांश हिन्दु जन वेद की शिक्षाओं पर आचरण नहीं करते उसकी अपेक्षा वेद विरूद्ध पुराण जैसे ग्रन्थों की शिक्षाओं को जीवन में अपनाते हैं । यही कारण है कि बहुत से हिन्दुओं में विश्वास है कि ईश्वर ने राम और कृष्ण के रूप में संसार में जन्म लिया था । इसी प्रकार ईसाई लोग यह मानते है कि ईश्वर ने ईसा मसीह के रूप में जन्म लिया था । यह मान्यता और ज्ञान वेद विरूद्ध है।


      इस मन्त्र में परमात्मा को हिरण्यगर्भः भी कहा गया है, जिसका अर्थ है कि परमात्मा प्रकाश वाले सूर्य और नक्षत्रों का, सम्पूर्ण विश्व का निर्माता है । हिरण्यगर्भ का अध्यात्मिक अर्थ यह भी है कि परमात्मा सब सत्य विद्याओं का आदि मूल है, जो हमारी आत्मा बद्धि व मन को सत्य ज्ञान से भर देता है जब हम उसकी योग द्वारा उपासना करते हैं ।


 


 


 


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