स्वामी विवेकानंद परिव्राजक


अहंकार या अभिमान एक ऐसी भावना है, जो अत्यंत हानिकारक है, सर्वनाश करने वाली है। जब व्यक्ति में अभिमान जागृत होता है, तो सबसे पहले उसकी बुद्धि नष्ट हो जाती है। वह सही और गलत में विवेक नहीं कर पाता। अन्य अनेक गुणों = सेवा नम्रता सभ्यता परोपकार दयालुता आदि को अहंकार दबा देता है। 
व्यक्ति का मन जब अहंकार से रहित होता है, तब वह शांत होता है। उसमें अनेक उत्तम  गुणों की वृद्धि और विकास होता है। परंतु जैसे ही अभिमान या अहंकार जागृत होता है, वे सारे गुण दब जाते हैं। सब उत्तम भावनाएं कमजोर पड़ जाती हैं। 
अनेक लोग ईश्वर प्राप्ति का लक्ष्य बनाते हैं, उसके लिए पुरुषार्थ या परिश्रम भी करते हैं। ईश्वर की कृपा से उनमें अनेक गुणों का विकास भी होता है। परंतु लापरवाही के कारण उन लोगों में अभिमान का उदय भी होता है। उस स्थिति में उनके वे सभी उत्तम गुण दब जाते हैं। ईश्वर उनके हृदय में विराजमान होते हुए भी उन्हें अपनी अनुभूति नहीं कराता, उन्हें आनंद नहीं देता। क्योंकि यहां आकर वे ईश्वर के आदेश का उल्लंघन करते हैं। ईश्वर का आदेश है कि उत्तम गुणों का विकास करो, परंतु अभिमान मत करो। बस, इसी आदेश का उल्लंघन करने के कारण ईश्वर उन्हें अपनी अनुभूति नहीं कराता। यह ईश्वर की ओर से उन्हें कठोर दंड भोगना पड़ता है। 
तो जो लोग भी जीवन में उन्नति करना चाहते हैं, ईश्वर तक पहुंचना चाहते हैं अर्थात ईश्वर की अनुभूति करना चाहते हैं, उसका आनंद प्राप्त करना चाहते हैं, उन्हें इस अभिमान रूपी महाशत्रु से अपनी रक्षा करनी होगी। एक और आश्चर्य की बात संसार में यह भी देखने को मिलती है, कि अधिकांश लोग अभिमान भी करते हैं और यह स्वीकार भी नहीं करते कि हम अभिमानी हैं। यह और भी खतरनाक स्थिति है। इस स्थिति से बचें,  नम्रता को अपनाएं , तथा ईश्वर तक पहुंचें। अपने जीवन को सफल बनाएँ।


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