क्या है सत्यार्थप्रकाश 

क्या है सत्यार्थप्रकाश 


      सत्यार्थ प्रकाश एक महान ग्रन्थ है | सत्यार्थ प्रकाश एक दार्शनिक ग्रन्थ है, ठीक-ठीक समझने के लिए अनेक ग्रंथो को अध्यन की आवश्यकता है,  सत्यार्थ प्रकाश ऐसा सरल ग्रन्थ है की साधारण शिक्षित भी उससे लाभ उठा सकते है और उसका अनुसरण करके अपने जीवन-केंद्र को परिवर्तित कर सकते है |


    बी   स्वामीजी भूमिका मे लिखते है – “ मेरा इस ग्रन्थ के बनाने का मुख्य प्रयोजन सत्य-असत्य अर्थ का प्रकाश करना है अर्थात जो सत्य है उसको सत्य और जो मिथ्या है उसे प्रतिपादन करना, सत्य अर्थ का प्रकाश समझा है | वह सत्य नहीं कहाता जो सत्य के स्थान मे असत्य और असत्य के स्थान मे सत्य का प्रकाश किया जाय |” अब आगे हम यह बताएँगे सत्यार्थ प्रकाश ग्रन्थ मे स्वामीजी ने चौदह समुल्लासो मे किन-किन विषयो पर प्रकाश डाला है |


प्रथम समुल्लास –


पहला समुल्लास कुछ अजीब-सा मालुम होता है | इसमें संस्कृत व्याकरण का इतना भाग है की नये पढ़नेवाले को यह समुल्लास बड़ा शुष्क प्रतीत होता है, परन्तु पहले समुल्लास मे यह सब इसलिए दिया की आगे का मार्ग साफ़ हो जाय | उस समय भी, जैसा आजकल है, सैकडो देवि-देवताओ की पूजा होती थी | ईश्वर विषय को इस समुल्लास मे स्वामीजी ने स्पष्ट किया है |


द्वितीय समुल्लास –


दूसरा समुल्लास मे स्वामीजी ने बालको की शिक्षा पर बल दिया है | भारतीय समाज मे जन्म से सम्बन्ध रखनेवाली अनेक भ्रान्तिया है जिनका आधार अज्ञान है | इसमें सुधार की आवश्यकता है | स्वामीजी का विश्वास है की बच्चो की शिक्षा का आरम्भ उनके जन्म लेने से बहोत पहले आरम्भ हो जाता है | इसलिए माता-पिता के स्वास्थ और आचार-विचार का बड़ा ध्यान रखना चाहिये |


तृतीय समुल्लास –


इस समुल्लास मे स्वामीजी ने पाठशाला मे शिक्षा का क्या क्रम होना चाहिये इसका विस्तृत वर्णन किया है | ब्रह्मचर्य आश्रम मे जिन-जिन नियमों का पालन होना चाइये उसका वर्णन इस अध्याय मे किया गया है | हमारे जीवन का चौथाई भाग अर्थात २५ वर्ष की शिक्षा मे व्यथित होने चाहिये | गृहस्थ आश्रम का प्रश्न २५ वर्ष से पूर्व नहीं उठना चाहिये |


चतुर्थ समुल्लास –


इस समुल्लास मे गृहस्थ आश्रम के सम्बन्ध मे शिक्षा दी गयी है अर्थात किस प्रकार विवाह करके स्त्री-पुरुष को परिवार के कार्यों को करना चाहिये | जिस प्रकार हमारे माता-पिता ने हमको जन्म दिया, पालन किया उसी प्रकार हमारे उपर यह ऋण है की हम भी अपने संतान का पालन करे | यह हमारा कर्त्तव्य है की जब हमारी बारी आई है तो हम अपने उत्तम अधिकारी छोड़कर जावे | समाज का यही नियम है |


पंचम समुल्लास –


इस समुल्लास मे स्वामीजी ने वानप्रस्थ और सन्यास के कर्तव्यों का वर्णन किया है | पहले बताया की मानवीय जीवन के ४ भाग है १. ब्रहमचर्य आश्रम २. गृहस्थ आश्रम ३. वानप्रस्थ आश्रम ४. सन्यास आश्रम | साधारणतः यह विचार किया जाता है की मनुष्य की आयु १०० वर्ष होती है |


 


षष्ट समुल्लास –


इस समुल्लास मे स्वामीजी ने राजा और प्रजा के सम्बन्ध का वर्णन किया है | कोई समाज बिना राजा के नहीं रह सकता, परन्तु राजा कही प्रकार के होते है | कही-कही तो जिसकी तलवार मे जोर है राजा बन जाता है और जब तक उसमे या उसके परिवार की तलवार मे जोर रहता है वह राजा रहता है | कही-कही प्रजा राजा का निर्वाचन करती है | इस समुल्लास मे स्वामीजी ने राज धर्म पर अपने विचार शास्त्रों के आधार पर व्यक्त किये जो पढ़ने योग्य है |


सप्तम समुल्लास –


इस समुल्लास मे स्वामी दयानन्द जी ईश्वर और उनके गुणों का वर्णन किया है | कोई धर्म ऐसा नहीं जिसका आधार ईश्वर पर न हो | जैन और बौद्ध ईश्वर के अस्तित्व मे विश्वास नहीं करते फिर भी वे पूजा धर्म मे विश्वास रखते है | सारे धर्म ईश्वर को मानते है पर उसके गुणों मे वे सर्वसम्मत नहीं, उसमे विभिन्नता पाई जाति है | गुण का समबन्ध गुनी से होता है | मनुष्य को गुनी से कुछ लेना नहीं, उसके गुणों से काम है | इसलिए ईश्वर पर विश्वास करते हुये यदि हमारे मष्तिष्क मे उसके गुणों की एकता नहीं तो धर्मिज झगडे पैदा हो सकते है |


अष्ठम्  समुल्लास –


इस समुल्लास मे स्वामीजी ने एक विशेष प्रश्न का समाधान किया है, जिसका बहोत से धर्मो मे उल्लेख भी नहीं है अर्थात इस प्रश्न को उठाना हि कुफ्र समझा गया है |


नवम समुल्लास –


इस समुल्लास मे स्वामीजी ने मुक्ति और मोक्ष का वर्णन किया है – मुक्ति क्या है ? कैसे प्राप्त होती है ?


दशम समुल्लास –


सत्यार्थ प्रकाश के दसवे समुल्लास मे स्वामीजी ने मनुष्य-जीवन की साधारण बातो पर विचार किया है, जैसे क्या खाना चाहिये ? क्या न खाना चाहिये ? आपस मे कैसे व्यवहार करना चाहिये ? दैनिक जीवन किस प्रकार होना चाहिये ? आदि-आदि |


एकादशसमुल्लास


इस समुल्लास मे स्वामीजी ने हिंदू धर्म मे सम्मलित अन्धविश्वास और कुरीतियों की आलोचना की है | हिंदू धर्म क्या है यही एक पहली है | हरेक अपने को हिंदू कहता है और अपने को हिंदू धर्म का अनुयायी मानता है | गैर लोग भी समझते है की यह हिंदू है और उसी का अनुयायी है |


द्वादश समुल्लास 


इस समुल्लास मे स्वामीजी ने तीन और मतों की आलोचना की है जिन्होंने हिंदू धर्म के समान भारत मे जन्म लिया, परन्तु उनकी गणना हिंदू धर्म मे नहीं है ; इसलिए उनका वर्णन ११ वे समुल्लास मे नहीं आया | उनके अनुयायियो की संख्या भी बहोत कम है उनमे एक है चार्वाक | उनका सिद्धान्त है – न ईश्वर का अस्तित्व है, न ईश्वर की आवश्यकता है | जब तत्व एक दूसरे से मिलते है, तो जीवन आरम्भ हो जाता है |


त्रयोदश और चतुर्दश समुल्लास –


इन दो समुल्लास १३ और १४ समुल्लास मे स्वामीजी ने ईसाइयत और इस्लाम की आलोचना की है, क्यों की कई सौ वर्ष से इन दोनों का संघर्ष वैदिक धर्म से चलता रहा | यद्यपि इन दोनों ने भारतवर्ष मे प्रभुता नहीं प्राप्त कर सखे, तो भी इनका प्रभाव बढ़ रहा है | भारत के राजनैतिक और सांस्कृतिक बातो मे भी इस्लाम और ईसाइयत का प्रभाव दृष्टिगोचर होता है |


इत्यादि इन सारे विषयों पर सत्यार्थ प्रकाश रूपी सूर्य ने प्रकाश डाला है | इच्छुक, स्वाध्यायी और अस्वाध्याई मनुष्य भी अपने ज्ञान की वृद्धि, संस्कार, संस्कृति, को जानने और इनको बचाने हेतु पूर्वाग्रह से दुर होकर इस कालजयी ग्रन्थ का इस समूह के माध्यम से अवश्य स्वाध्याय करे यह प्रार्थना | अपने जीवन को उन्नत बनाने मे इसका पूर्ण सहयोग ले और यही इस ग्रन्थ का मुख्य प्रतिपादित विषय है |


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