ईश्वर के स्वरूप का दार्शनिक और वैज्ञानिक विवेचन

ईश्वर के स्वरूप का दार्शनिक और वैज्ञानिक विवेचन - वेद की नित्यता पर प्रकाश
(सत्यार्थ प्रकाश के सप्तम समुल्लास के आधार पर)


[भाग- १]


लेखक- पं० क्षितिश कुमार वेदालंकार


[परोपकारी पत्रिका अपने 'ऐतिहासिक कलम से' नामक शीर्षक के माध्यम से पाठकों को कुछ ऐसे लेखों से परिचित करा रही है, जो 'आर्योदय' (साप्ताहिक) के सत्यार्थप्रकाश विशेषांक से लिये गये हैं। यह विशेषांक दो भागों में छपा था। पूर्वार्द्ध के सम्पादक श्री प्रकाशजी थे तथा उत्तरार्द्ध के सम्पादक पं० भारतेन्द्रनाथजी तथा श्री रघुवीर सिंह शास्त्री थे। यह विशेषांक विक्रम संवत् २०२० में निकाला गया था। यहां यह स्मरण रखना जरूरी है कि इस विशेषांक में जो लेख प्रस्तुत किये गये हैं वे पं० भारतेन्द्रनाथ जी ने विद्वानों से आग्रहपूर्वक लिखवाये थे, जो कि पण्डित जी अक्सर किया करते थे। उसी विशेषांक के कुछ चयनित लेख पाठकों की सेवा में प्रस्तुत किये जा रहे हैं। जिनमें यह सप्तम लेख 'ईश्वर के स्वरूप का दार्शनिक और वैज्ञानिक विवेचन - वेद की नित्यता पर प्रकाश' आर्यजगत् के सुप्रसिद्ध विद्वान् पं० क्षितिश कुमार वेदालंकार द्वारा लिखा गया है। -डॉ० सुरेन्द्रकुमार, सम्पादक- परोपकारी]


अनेक विद्वानों की यह धारणा है कि वेद में अनेक ईश्वरों का वर्णन है। पौराणिकों के विभिन्न सम्प्रदाय और उनमें पृथक्-पृथक् आराध्यदेवों का प्रचलन देखकर ही शायद उन्होंने यह धारणा बनाई हो। पौराणिकों के आचरण को देखकर उसे वेद पर आरोपित करने की भूल करनेवालों में सबसे आगे हैं वे पाश्चात्य विद्वान् जिनके वेद सम्बन्धी प्रभूत परिश्रम के आगे नत-मस्तक होकर भी हमें यह कहने में तनिक भी संकोच नहीं कि वेद में अनेकेश्वरवाद (Polytheism) सिद्ध करने की उनकी चेष्टा दुश्चेष्टा मात्र है।
वेद में अनेक ईश्वरों के वर्णन की कल्पना एक और भ्रम पर ही आधारित है। आजकल विज्ञान की प्रत्येक शाखा में प्रचलित विकासवाद के आधार पर सोचनेवाले लोग यह समझते हैं कि ईश्वर की कल्पना बौद्धिक ज्ञान की पराकाष्ठा की द्योतक है, और वेद क्योंकि आदिम रचना है, इसलिए आदिकाल के लोगों की बुद्धि का विकास इतना नहीं हो सकता कि वे ईश्वर के एकत्व की कल्पना कर सकें। वे तो नदी-नालों, वृक्ष-वनस्पतियों, भूधरों, वर्षा, बादल, बिजली आदि प्राकृतिक विपर्ययों और भौतिक घटना-विलासों को ही देव समझकर पूजने लगे या उन्हीं में ईश्वरत्व की बुद्धि रखने लगे। विकासवाद-जनित इसी कपोल-कल्पना के आधार पर इस्लाम के मतानुयायी यहां तक कहने लगे कि संसार के बड़े धर्मों में हमारा धर्म सबसे अर्वाचीन है, इसलिए यह परिपूर्ण धर्म है और इस परिपूर्णता की कसौटी यह है कि इस्लाम में एकेश्वरवाद पर सबसे अधिक बल दिया गया है। 'तौहीद की अमानत सीने में है हमारे'- कहकर इसी एकेश्वरवाद को इस्लाम का सबसे बड़ा वरदान स्वीकार किया गया है। इस्लाम के इस एकेश्वरवाद की चकाचौंध से कुछ लोग इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने यहां तक कहने में संकोच नहीं किया कि मध्यकाल में शंकराचार्य ने अद्वैतवाद के दार्शनिक आधार पर ईश्वर के एकत्व का जो प्रचार किया वह इस्लाम के और मुसलमान सूफियों के एकेश्वरवाद से ही प्रेरित होकर किया। ऐसा कहने वाले भारतीय विद्वानों में पं० सुन्दरलाल, डॉ० ताराचन्द और केन्द्रीय शिक्षमन्त्री डॉ० हुमायूँ कबीर प्रभृति का नाम लिया जा सकता है।


ईश्वर एक है-
जहां तक वेद का सम्बन्ध है, उसकी बात वेद के ही आधार पर कही जाए तो अच्छा है, क्योंकि अन्य ग्रन्थों के आधार पर कही हुई बात परत:प्रमाण होगी और उसके विवाद का विषय बन जाने की भी सम्भावना है। इसके अलावा वेद स्वयं इतना समर्थ है कि उसे अपनी बात की पुष्टि के लिए किसी अन्य ग्रन्थ की सहायता की आवश्यकता नहीं।
वेद ने स्वयं ही उक्त गुत्थी सुलझा दी है। ऋग्वेद का एक मन्त्र है-


इन्द्र मित्रं वरुणमग्निमाहुरथो दिव्य: स सुपर्णो गुरुत्मान्।
एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्त्यग्निं यमं मातरिश्वानमाहु:।। -ऋक् १/१६४/४६
ज्ञानी लोग एक ही ईश्वर को अनेक नामों से पुकारते हैं- अग्नि, यम, मातरिश्वा, इन्द्र, मित्र, वरुण सुपर्ण, गरुत्मान्- सब उसी एक ईश्वर के नाम हैं। [देखिए सत्यार्थप्रकाश प्रथम समुल्लास- उसमें परमात्मा के इस प्रकार के १०८ नामों की व्याख्या की गई है।]


इसी प्रकार "य एकश्चर्षणीनां वसूनामिरज्यति" (ऋक् १/७/९), "य एक इद्विदयते वसु मर्त्ताय दाशुषे" (ऋक् १/८४/७), "ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्" (यजु० ४०/१), "भुवनस्य यस्पतिरेक एव नमस्य:" (अथर्व० २/२/१)- इत्यादि अनेक मन्त्र चारों वेदों से उद्धृत किये जा सकते हैं, जिनसे ईश्वर का एकत्व प्रतिपादित होता है। विशेष बात यह है कि जहां ईश्वर की एकता के प्रतिपादक सैकड़ों मन्त्र हैं, वहां ईश्वर की अनेकता को सिद्ध करनेवाला एक मन्त्र भी प्रस्तुत करना कठिन है। इसी प्रसङ्ग में अथर्ववेद (१३/४/२) के १६ से १८ तक के मन्त्र ध्यान देने योग्य है-


"न द्वितीयो न तृतीयश्चतुर्थो नाप्युच्यते।
न पञ्चमो न षष्ठ: सप्तमो नाप्युच्यते।
नाष्टमो न नवमो दशमो नाप्युच्यते।
स एष एक एकवृदेक एव।।"
-उसे दूसरा, तीसरा और चौथा नहीं कह सकते। पांचवां, छठा, सातवां भी नहीं कह सकते। आठवां, नवां, और दसवां भी नहीं कह सकते। वह एक ही है, अकेला ही जगत् की उत्पत्ति-स्थिति-प्रलय करने वाला है। वह एक ही है।


अनेकेश्वरवाद का खण्डन करनेवाला और ईश्वर की एकता का प्रतिपादन करनेवाला इससे अधिक स्पष्ट और प्राञ्जल वर्णन संसार के अन्य किसी धर्मग्रन्थ में नहीं मिल सकता- यह बात चुनौती देकर कही जा सकती है। न सही अनेक ईश्वर, परन्तु वेद में अनेक देवताओं का तो वर्णन है? इसे कोई अस्वीकार नहीं करता। वेद में अनेक देवताओं का तो वर्णन अवश्य है, किन्तु उपासना के योग्य ईश्वर सर्वत्र एक ही बताया गया है। जहां तक देव या देवता शब्द की बात है, वहां सर्वत्र समझना यह है कि 'देव' शब्द 'दिवु' धातु से बनता है। उस 'दिवु' धातु का व्याकरणसम्मत अर्थ है- क्रीड़ा, विजिगीषा, व्यवहार, द्युति, स्तुति, मोद, मद, स्वप्न, कान्ति और गति। अर्थात् जिस किसी पदार्थ में इनमें से किसी भी गुण-विशेष का आधिक्य हो, वही देव कहलाएगा। संक्षेप में कह सकते हैं कि दिव्य गुण को धारण करनेवाली प्रत्येक वस्तु देवकोटि में आती है। पृथिवी, अग्नि, वायु, जल, चन्द्र, सूर्य आदि सब देव हैं, क्योंकि विशिष्ट गुणों को धारण करनेवाले हैं। विद्वानों को भी देव कहते हैं, क्योंकि वे अपनी विद्या के बल पर चमकते हैं। देववाची प्रत्येक शब्द प्रकारान्तर से परमात्मा का भी वाची होता है, क्योंकि आखिर सब देवों का अधिष्ठाता तो वही है। कौन-सा देववाची शब्द किस स्थान पर परमात्मा का वाचक है और किस स्थान पर अन्य पदार्थ का, इसका निर्णय प्रकरण के अनुसार करना होगा। देवता अनेक होने और भी आराध्यदेव केवल ईश्वर है और वह सब देवों का अधिष्ठाता है- वेद का यही सिद्धान्त है और इसमें कहीं शंका का स्थान नहीं है।


तैंतीस देवता-
यजुर्वेद में जो तैंतीस देवताओं का वर्णन आता है, उसकी व्याख्या शतपथ के अनुसार इस प्रकार है- आठ वसु, ग्यारह रुद्र, बारह आदित्य, एक इन्द्र और एक प्रजापति (८+११+१२+१+१=३३) ये तैंतीस देवता हैं। पृथिवी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, चन्द्र, सूर्य और नक्षत्र- ये आठ वसु हैं, क्योंकि ये समस्त सृष्टि के वास-हेतु हैं; इनके बिना सृष्टि की कल्पना नहीं की जा सकती। प्राण, अपान, व्यान, उदान, समान, नाग, कूर्म, कृकल, देवदत्त, धनञ्जय और जीवात्मा ये ग्यारह रुद्र हैं, क्योंकि जब ये शरीर को छोड़कर जाने लगते हैं तो सबको रुलाते हैं। संवत्सर के बारह मास चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद, आश्विन, कार्तिक, मार्गशीर्ष, पौष, माघ, फाल्गुन ये बारह आदित्य हैं, क्योंकि ये सबकी आयु को लेते जाते हैं। इन्द्र है बिजली- अन्तरिक्ष में यह वृष्टि की जनक है और भूलोक में वैज्ञानिक क्रान्ति की जनक है- इसलिए ऋषि ने इसे परमैश्वर्य का हेतु बताया है। बिना उद्योगों के राष्ट्र समृद्ध नहीं हो सकता और बिना बिजली के उद्योगों का विस्तार नहीं हो सकता। उद्योगीकरण से राष्ट्र को ऐश्वर्यशाली बनाने के लिए ही बिजली की अधिकाधिक आवश्यकता है और इसीलिए इस दिशा में इतना प्रयत्न किया जाता है। प्रजापति है यज्ञ। यज्ञ को प्रजापति इसलिए कहा है कि यज्ञ के द्वारा ही वायुमण्डल की शुद्धि, वृष्टि, जल और औषधि की शुद्धि होती है तथा विद्वानों के संगतिकरण से अनेक शिल्पविद्याओं का विकास होता है और ये ही सब प्रजापालन में सहायक है।


क्या ईश्वर का प्रत्यक्ष ज्ञान सम्भव है?-
आप देवताओं की व्याख्या के चक्कर में पड़े हैं, परन्तु हम तो सब देवों के देव- ईश्वर की सत्ता को ही स्वीकार करते हैं। क्या ईश्वर का अस्तित्व किसी तरह सिद्ध किया जा सकता है?
यों तो ईश्वर की सत्ता को सिद्ध करने के लिए अन्य अनेक प्रकार की युक्तियां दी जा सकती हैं; किन्तु इस समुल्लास में ऋषि ने अद्भुत ढंग से ईश्वर की सत्ता सिद्ध की है। जितने वैज्ञानिकम्मन्य लोग हैं, वे यह कहते हैं कि हम तो केवल प्रत्यक्ष को ही प्रमाण मानते हैं, अप्रत्यक्ष वस्तु तत्त्व में हमारी आस्था नहीं। प्रयोगशाला में बैठकर अपनी इच्छानुसार जिस पदार्थ को तोड़ने-फोड़ने, घटाने-बढ़ाने और उसकी क्रिया-प्रतिक्रिया को जांचने की सुविधा वैज्ञानिक को न मिले उस पदार्थ की सत्ता में वह विश्वास करे भी कैसे? न्यूट्रोन, प्रोटोन, और इलेक्ट्रोन जैसे सूक्ष्म तत्त्वों तक पहुंचकर तो उसका 'अहम्' और भी फूल गया। वैज्ञानिक यह समझने लगा कि अणुबम बनाकर सृष्टि का संहार करने की कुञ्जी मैंने अपनी मुट्ठी में बन्द कर ली, इसलिए इस सृष्टि का कर्त्ता-धर्त्ता-संहर्त्ता मेरे सिवाय और कौन हो सकता है?
ऋषि ने कहा कि ईश्वर का भी प्रत्यक्ष होता है। ईश्वर प्रत्यक्ष न होने की जिस युक्ति के भरोसे नास्तिकों के सब सम्प्रदाय और आधुनिक वैज्ञानिकगण मन में फूले नहीं समा रहे थे, ऋषि ने उसकी जड़ ही काट दी।


ईश्वर का प्रत्यक्ष कैसे होता है, अब यह देखिए।
न्यायदर्शन के अनुसार, इन्द्रिय और अर्थ के सन्निकर्ष से उत्पन्न जो निर्भ्रान्त और निश्चयात्मक ज्ञान है, वही प्रत्यक्ष कहलाता है। इन्द्रियां हैं- आंख, नाक, कान, जिह्वा, और त्वचा तथा मन। आंख से रूप का अनुभव होगा, नाक से गन्ध का, कान से शब्द का, जिह्वा से रस का और त्वचा से स्पर्श का। अब रूप, रस, गन्ध, स्पर्श और शब्द तो गुण हैं, किन्तु जब इन्द्रियों का इन गुणों से सन्निकर्ष होता है, तब हम आत्मायुक्त मन से गुणी का प्रत्यक्ष करते हैं। विज्ञान की दृष्टि से पदार्थ उसको कहते हैं जिसमें भार हो और जो स्थान घेरे। इस व्याख्या के अनुसार जैसे रूप, रस आदि पदार्थों के गुण हैं; वैसे ही भार होना या स्थान घेरना भी गुण है; स्वयं पदार्थ नहीं। रूप, रस आदि का तो कोई भार भी नहीं होता, न ही वे स्थान घेरते हैं। समस्त संसार में जितने भी पदार्थ हैं उन सब के गुणों का ही सम्पर्क हमारी इन्द्रियों के साथ होता है और उनके गुणों के सम्पर्क से ही हम कहते हैं कि हमें अमुक पदार्थ अर्थात् गुणी का प्रत्यक्ष हो जाएगा। जिस प्रकार हम सामान्य व्यवहार में गुण से गुणी का प्रत्यक्ष करते हैं उसी प्रकार इस समग्र सृष्टि रचना-चातुरी को देखकर इसके रचयिता अर्थात् गुणी परमात्मा का प्रत्यक्ष होता है। यदि कहा जाए कि परमात्मा का इस प्रकार प्रत्यक्ष हम नहीं मानते तो लोक में भी किसी पदार्थ का प्रत्यक्ष सम्भव नहीं; यदि लोक में किसी भी पदार्थ का प्रत्यक्ष सम्भव है- जिससे न चार्वाक इनकार करते हैं, न विज्ञान को सर्वेसर्वा समझने वाले कम्युनिस्ट तथा अन्य नास्तिक- तो सृष्टि को देखकर सृष्टिकर्त्ता का भी प्रत्यक्ष मानना ही होगा। सृष्टि-रचना में कहीं चातुरी नहीं है, इस बात से कट्टर से कट्टर नास्तिक भी इनकार नहीं कर सकता। चातुरी गुण है और वही गुणी का प्रत्यक्ष करवाने में प्रमाण है।


एक अन्य युक्ति-
ईश्वर की सत्ता में एक और अकाट्य युक्ति है। नास्तिक लोग ईश्वर की सत्ता से भले ही इनकार करें, किन्तु जीवात्मा की सत्ता से इनकार करना उनके बस की भी बात नहीं। जीवात्मा की सत्ता का निषेध करना तो एक तरह से अपनी ही सत्ता का निषेध करना हुआ- और अहम्भाव से ओत-प्रोत वैज्ञानिकम्मन्य ऐसा कैसे कर सकता है? प्रश्न यह है कि जब मनुष्य परोपकार या भलाई का कोई काम करने लगता है, तब उसके मन में भलाई के लिए उत्साह और प्रेरणा कहाँ से पैदा होती है? और जब मनुष्य कोई अनाचार या बुराई का काम करने लगता है, तब उसके मन में भय, शंका और लज्जा की भावना कौन पैदा करता है? मनुष्य का मन तो सदा पानी की तरह नीचे की ओर, पतन की ओर, जाने के लिए उद्यत रहता है, उत्थान के पथ पर बढ़ने की उमंग उसमें कहां से पैदा होती है? कहना नहीं होगा कि यह काम परमात्मा की ओर से होता है। जीवात्मा तो इस विषय में सर्वथा तटस्थ है, बल्कि मन की गति के साथ ही चलने की ओर उसका झुकाव अधिक रहता है। अच्छाई की प्रेरणा और बुराई से संकोच ऐसी सार्वत्रिक भावना है कि पापी से पापी आदमी भी इसकी सच्चाई से मना नहीं कर सकता। परम दार्शनिक, परम वैयाकरण और साहित्यिक योगिराज भर्तृहरि ने इसीलिए ईश्वर की सिद्धि का एकमात्र प्रमाण 'स्वानुभूत्येकमानाय' कहकर दिया है- अर्थात् ईश्वर की सत्ता का एकमात्र प्रमाण अपनी अनुभूति है और जिसको एक बार अच्छाई के प्रेरक और बुराई के निवारक प्रभु की सत्ता की अनुभूति हो गई है, सारा संसार भी अपने तर्कजाल के अम्बार के बल पर उसे अनुभूति से विरत नहीं कर सकता। यही अनुभूति महापुरुषों को संघर्षों का और विपरत परिस्थितियों का मुकाबला करने की शक्ति प्रदान करती है।


ईश्वर सर्वव्यापक है-
अच्छा मान लिया कि ईश्वर है, किन्तु वह रहता कहाँ है? कोई कहता है कि वह गोलोक में रहता है, कोई कहता है कि क्षीरसागर में शयन करता है, कोई कहता है कि कैलाश पर निवास करता है, कुछ लोग चौथे आसमान पर और अन्य लोग सातवें आसमान पर उसका निवास बताते हैं। आखिर जब ईश्वर है, तो कहीं न कहीं रहता भी होगा ही?
रहता क्यों नहीं, रहता है, किन्तु कहीं या किसी एक स्थान पर नहीं रहता। ईश्वर सब स्थानों पर रहता है। कभी भी किसी ऐसे स्थान की कल्पना नहीं की जा सकती जहां ईश्वर न हो। वह सर्वव्यापक है। किसी स्थान-विशेष पर उसकी कल्पना करने से वह एकदेशी हो जाएगा। जो एकदेशी होगा, सर्वव्यापक नहीं हो सकता। दोनों परस्पर विरोधी बातें हैं। जिन लोगों ने परमात्मा को किसी एक स्थान पर प्रतिष्ठित माना है वे प्रकारान्तर से उसके सर्वव्यापक होने का खण्डन करते हैं। किसी एक स्थान पर होने का अर्थ ही यह है कि वह उससे भिन्न स्थान पर नहीं है। जो यहां है और वहां नहीं या वहां है और यहां नहीं, वह सर्वव्यापक कैसा?


क्या ईश्वर साकार है?-
इसके साथ प्रश्न जुड़ा हुआ है कि परमात्मा साकार है या निराकार?
ईश्वर को साकार मान लेना जितना आसान है उतना ही कठिन है उसे साकार सिद्ध करना। जो साकार है, वह सर्वव्यापक कैसे हो सकता है? जो व्यापक नहीं, वह सर्वज्ञ भी नहीं हो सकता, सर्वान्तर्यामी भी नहीं। जिसका आकार होगा, वह परिमित होगा और परिमित वस्तु के गुण, कर्म, स्वभाव भी परिमित होंगे। परिमित वस्तु को सर्दी, गर्मी, भूख, प्यास, रोग, शोक और छेदन-भेदन का भी शिकार होना पड़ेगा। इसलिए ईश्वर न परिमित है, न ही साकार। साकार हो तो उसका कुछ न कुछ आकार होगा। वह लम्बा, चौड़ा, गोल, चपटा- कुछ तो होगा ही, उसका आयतन और आयाम दोनों ही मानने होंगे और आयतन तथा आयाम दोनों मानते ही वह भगवान् और विस्तारवान् में भौतिक-पिण्ड मात्र रह जाएगा।
यदि लम्बाई-चौड़ाई वाला कोई ज्यामितिक और भौतिक पिण्ड नहीं, तो क्या वह मानवाकृतिवाला कोई पदार्थ है? "God made the man in His image"- परमात्मा ने मनुष्य को अपनी नकल पर बनाया- यह कहनेवाले समझते हैं कि असल भी नकल से मिलता-जुलता ही होना चाहिए- अर्थात् परमात्मा की भी आदमी जैसी ही शक्ल है। परमात्मा को अवतार लेने वाला बतानेवाले भी ईश्वर की आदमी जैसी ही शक्ल मानते हैं। वैसे ही आंख, कान, नाक आदि सभी अवयव। ईसा को परमेश्वर का पुत्र मानने वाले ईसाई, हजरत मुहम्मद साहब को खुदा का भेजा हुआ खास पैगम्बर माननेवाले मुसलमान या राम और कृष्ण आदि के रूप में परमात्मा का अवतार मानने वाले पौराणिक बन्धु- ये सब इस दृष्टि से समान हैं। सबके मन में परमात्मा मनुष्य आकृतिवाला है और वैसे ही हस्तपादादि अवयवों से संयुक्त है। वेद में भले ही "अज एकपात्" कहकर प्रभु को अजन्मा और "सपर्यगाच्छुक्रमकायमव्रणमस्नाविरम्" कहकर उसे शरीररहित और नस-नाड़ी से रहित बताया गया हो एवं भले ही उपनिषदों में उसे "अपाणिपादो जवनो ग्रहीता स पश्यत्यचक्षु: स शृणोत्यकर्ण:" कहकर उसे हस्तपादादि कर्मेन्द्रियों और चक्षु-श्रोत्रादि ज्ञानेन्द्रियों से रहित बताया गया हो, किन्तु एक अन्ध-परम्परा चल पड़ी है और उसी के अनुसार लाखों-करोड़ों लोग अवतारवाद के अभिशाप से ईश्वर के मानवाकृति होने के भ्रम से निकल नहीं पाते। अवतारवाद को सबसे अधिक प्रश्रय देने वाला गीता का यह श्लोक है-
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्।।४/७।।
-श्री कृष्ण जी कहते हैं कि जब-जब धर्म का ह्रास होता है और अधर्म का विकास होता है, तब-तब मैं अपने आपको पैदा करता हूँ (शरीर धारण करके अवतार ग्रहण करता हूँ।)


गीता का उचित स्थान-
यहां गीता के सम्बन्ध में केवल इतना कह देना पर्याप्त है कि वह स्वतन्त्र ग्रन्थ न होकर महाभारत का एक अंश मात्र है, इसलिए उसकी प्रामाणिकता भी उतनी ही है जितनी महाभारत की। इसी से यह बात भी स्पष्ट हो जानी चाहिए कि गीता के सम्बन्ध में जो यह प्रवाद प्रचलित उसमें श्रीकृष्ण के मुख से निकले हुए वचन हैं ("या स्वयं पद्मानाभस्य मुखपद्माद् विनिस्सृता")- उसमें कोई तथ्य नहीं है। जिस तरह शेष महाभारत, जिसका असली नाम 'जय' है और जिसमें मूलतः केवल बीस हजार श्लोक थे, महर्षि व्यास की कृति है वैसे ही गीता भी महर्षि व्यास की ही रचना है। पूछा जा सकता है कि फिर गीता की इतनी लोकप्रियता का रहस्य क्या है? इसका उत्तर हम यह देंगे कि जिस प्रकार महात्मा गांधी के सर्व-धर्म-समन्वयवाद ने सभी धर्मावलम्बियों को अविरोध भाव से एकत्र होने की प्रेरणा दी और इसीलिए लोकसंग्रह की दृष्टि से महात्मा गांधी सबसे अधिक सफल और लोकप्रिय नेता कहे जा सकते हैं, वैसे ही गीता में सभी दार्शनिक सम्प्रदायों का ऐसा अद्भुत समन्वय है कि सभी को उनमें अपने पक्ष का पोषण मिल जाता है। इसीलिए गीता अपने चारों और इतना लोकसंग्रह कर सकी। दार्शनिक विवेचना करनेवालों को गीता में परस्पर-विरोधी बातें भी मिल जाएंगी, पर एक ही साथ 'रामाय स्वस्ति' और 'रावणाय स्वस्ति' कहनेवाले के पीछे जैसे राम और रावण दोनों के अनुयायी चलने को तैयार हो जाएंगे, बहुत कुछ वही हाल गीता का भी है।


श्लोक का अर्थ-
यदि समाजशास्त्र की दृष्टि से गीता के उक्त श्लोक की व्याख्या की जाए तो उसमें एक ऐसे ऐतिहासिक सत्य का उद्घाटन है जिससे इन्कार नहीं किया जा सकता। जब-जब धर्म की ग्लानि और अधर्म का अभ्युत्थान का अर्थ यह समझा जा सकता है कि जब-जब किसी जाति का सामाजिक और राजनीतिक दृष्टि से अध:पतन हो जाता है तब-तब उसमें ऐसे महापुरुष पैदा होते हैं जो उस जाति को पतन के गर्त से निकालकर उन्नति के शिखर पर ले जाने का प्रयत्न करते हैं। इतिहास की शिक्षा यही है कि कोई भी महापुरुष जन्म से महापुरुष नहीं होता, किन्तु अपने समय की परिस्थितियां ही उसे महापुरुष बनाती हैं। पराधीन भारत में दयानन्द, श्रद्धानन्द, तिलक, रवीन्द्र, सुभाष प्रभृति जैसे नररत्न पैदा हुए, क्या वैसे नररत्नों की कल्पना स्वाधीन भारत में की जा सकती है। जितनी तीव्र क्रिया होगी, उतनी ही तीव्र प्रतिक्रिया होगी- यह विज्ञान का सिद्धान्त है। भारत का जितना तीव्र अध:पतन हुआ था उसी का यह परिणाम था कि उसने अनेक ऐसी विभूतियों को जन्म दिया जो केवल भारत-वन्द्य नहीं प्रत्युत विश्ववन्द्य है। दुःख को इसीलिए रसायन कहा जाता है।
यदि मनोविज्ञानपरक अर्थ इस श्लोक का किया जाए तो उसे यों समझा जा सकता है कि अपने चारों ओर धर्म को घटता और अधर्म को बढ़ता देखकर किसी दृढ़ संकल्प धर्मात्मा व्यक्ति के मन में यह भाव या सकता है कि मैं अधर्म का नाश करके धर्म का राज्य स्थापित करूँगा। यह भी एक शाश्वत सामाजिक प्रवृत्ति है जो सभी धार्मिक महापुरुषों के जीवन में स्पष्ट दृष्टिगोचर होती है। इस प्रवृत्ति को हृदयंगम किये बिना विभिन्न देशों में पैदा हुए विभिन्न महापुरुषों के जीवन की व्याख्या की ही नहीं जा सकती। यही वैज्ञानिक दृष्टिकोण भी है। इसीलिए इस श्लोक से अवतारवाद सिद्ध करनेवालों को उत्तर देते हुए ऋषि ने लिखा है कि 'वेद-विरुद्ध होने से अवतार लेने की बात प्रमाण नहीं मानी जा सकती। किन्तु ऐसा हो सकता है कि श्रीकृष्ण धर्म की रक्षा करना चाहते थे कि मैं युग-युग में जन्म लेकर श्रेष्ठों की रक्षा और दुष्टों का नाश करूँ तो इसमें कुछ दोष नहीं।' "न त्वहं कामये राज्यं न स्वर्गं नापुनर्भवम् कामये। दुःखतप्तानां प्राणीनामार्तिनाशनम्।" मैं राज्य नहीं चाहता, स्वर्ग नहीं चाहता, मोक्ष भी नहीं, किन्तु दुःख से सन्तप्त नर-नारियों का दुःख-नाश करने के लिए इस लोक में जन्म ग्रहण करना चाहता हूं। यही तो महापुरुष की असली मनोभावना है और यह कितनी प्रबल होती है इसकी कल्पना इसी से की जा सकती है कि दुःखीजनों के दुःख-नाश के लिए वह राज्य, स्वर्ग, मोक्ष सभी को तिलाञ्जलि देने को तैयार है। मोक्ष न चाहने से ही यह अर्थ स्वयं निकल आता है कि मैं इस लोक में जन्म ग्रहण करना चाहता हूं।


जैसे वेद को समझने के लिए वेद स्वयं सहायक है, वैसे ही गीता ने भी बहुत बार अपनी गुत्थियां अपने आप खोल दी हैं। उक्त श्लोक में यही तो कहा है न- "तदात्मानं सृजाम्यहम्"- यहां 'आत्मानं' शब्द का क्या अभिप्राय है, यह गीता से ही पूछना चाहिए। जिस व्यक्ति ने गीता में 'तदात्मानं सृजाम्यहम्' लिखा, उसी ने लिखा है- 'योगी त्वात्मैव मे मतम्' अर्थात् योगी को तो मैं अपना आत्मा ही मानता हूं। अब 'तदात्मानं सृजाम्यहम्' में 'आत्मानं' शब्द के स्थान पर 'योगिनाम्' शब्द रखकर देखिए। 'तदा योगिनं सृजाम्यहम्' का अर्थ होगा- मैं योगी को पैदा करता हूँ। (वहां 'सृजामि' शब्द को लुप्तणिजन्त प्रयोग मानना होगा, अर्थात् 'सर्जयामि' के स्थान पर 'सृजामि' शब्द का प्रयोग हुआ है।) यदि 'सृजामि' को 'सर्जयामि' मानने में बाधा हो और उक्त श्लोक को श्रीकृष्ण के ही मुख का वचन मानना हो तो अर्थ यह हो जाएगा कि 'योगी के रूप में मैं जन्म लेता हूँ।'
अब जरा पूरे श्लोक का अर्थ देखिए 'जब-जब धर्म की ग्लानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब मैं किसी योगी (महापुरुष) को पैदा करता हूँ।'- यह अर्थ समाज-शास्त्र के दृष्टिकोण से सर्वथा सुसंगत है या दूसरा अर्थ यह होगा; जब-जब धर्म की ग्लानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब कोई योगी (मैं) पैदा होता है (हूँ)।' यह अर्थ मनोविज्ञान की दृष्टि से सुसंगत है। इससे अधिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण और क्या हो सकता है?


तर्क से अवतारवाद का खण्डन-
इस प्रकार किसी प्रमाण से अवतारवाद के सिद्ध होने की सम्भावना नहीं। रही तर्क की बात, क्या तर्क से अवतार सिद्ध किया जा सकता है? यह और भी कठिन है। जब एक बार ईश्वर को सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान, सर्वान्तर्यामी और निराकार मान लिया, तब तर्क से ईश्वर का अवतार कैसे सिद्ध किया जा सकता है? जो निराकार और सर्वव्यापी है वह आकर ग्रहण करने के लिए मां के पेट में एक स्थानबद्ध कैसे रहेगा। फिर जो जन्म लेगा वह मरेगा भी अवश्य। जो जन्म और मरण दोनों के चक्कर में पड़ा वह सामान्य मनुष्य ही होगा, ईश्वर नहीं। कहा जाता है कि राक्षसराज रावण और पापी कंस को मारने के लिए राम और कृष्ण के रूप में ईश्वर को अवतार लेना पड़ा। कैसी बचकानी-सी बात है। सोचिए किसी चीज को बनाना अधिक आसान होता है या बिगाड़ना। जिस इमारत को सैकड़ों मजदूर मिलकर महीनों तक परिश्रम करके बनाते हैं और उसी को चन्द मजदूर चन्द दिनों में गिराकर रख देंगे। मानना ही होगा कि बिगाड़ने की अपेक्षा बनाना कहीं अधिक कठिन कार्य है। सो रावण और कंस जैसे व्यक्तियों को, फिर वह कितने ही शक्तिशाली क्यों न हो, पैदा करने के लिए यदि अवतार लेने की आवश्यकता नहीं पड़ी तो उन्हें मारने के लिए अवतार लेने की आवश्यकता क्यों पड़ती? जो ईश्वर सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय जैसे महान् कार्यों को करता है उसको किसी एक व्यक्ति का नाश करने के लिए भी अवतार लेना पड़े, इससे तो ईश्वर का नहीं किन्तु रावण और कंस का ही गौरव बढ़ता है। तब तो सर्वशक्तिमान् ईश्वर नहीं, रावण ही हुआ।


[स्त्रोत- परोपकारी : महर्षि दयानन्द सरस्वती की उत्तराधिकारिणी परोपकारिणी सभा का मुख पत्र का मार्च २०२० का अंक; प्रस्तुति- प्रियांशु सेठ]


ईश्वर के स्वरूप का दार्शनिक और वैज्ञानिक विवेचन - वेद की नित्यता पर प्रकाश
(सत्यार्थ प्रकाश के सप्तम समुल्लास के आधार पर)


[भाग- १]


लेखक- पं० क्षितिश कुमार वेदालंकार


[परोपकारी पत्रिका अपने 'ऐतिहासिक कलम से' नामक शीर्षक के माध्यम से पाठकों को कुछ ऐसे लेखों से परिचित करा रही है, जो 'आर्योदय' (साप्ताहिक) के सत्यार्थप्रकाश विशेषांक से लिये गये हैं। यह विशेषांक दो भागों में छपा था। पूर्वार्द्ध के सम्पादक श्री प्रकाशजी थे तथा उत्तरार्द्ध के सम्पादक पं० भारतेन्द्रनाथजी तथा श्री रघुवीर सिंह शास्त्री थे। यह विशेषांक विक्रम संवत् २०२० में निकाला गया था। यहां यह स्मरण रखना जरूरी है कि इस विशेषांक में जो लेख प्रस्तुत किये गये हैं वे पं० भारतेन्द्रनाथ जी ने विद्वानों से आग्रहपूर्वक लिखवाये थे, जो कि पण्डित जी अक्सर किया करते थे। उसी विशेषांक के कुछ चयनित लेख पाठकों की सेवा में प्रस्तुत किये जा रहे हैं। जिनमें यह सप्तम लेख 'ईश्वर के स्वरूप का दार्शनिक और वैज्ञानिक विवेचन - वेद की नित्यता पर प्रकाश' आर्यजगत् के सुप्रसिद्ध विद्वान् पं० क्षितिश कुमार वेदालंकार द्वारा लिखा गया है। -डॉ० सुरेन्द्रकुमार, सम्पादक- परोपकारी]


अनेक विद्वानों की यह धारणा है कि वेद में अनेक ईश्वरों का वर्णन है। पौराणिकों के विभिन्न सम्प्रदाय और उनमें पृथक्-पृथक् आराध्यदेवों का प्रचलन देखकर ही शायद उन्होंने यह धारणा बनाई हो। पौराणिकों के आचरण को देखकर उसे वेद पर आरोपित करने की भूल करनेवालों में सबसे आगे हैं वे पाश्चात्य विद्वान् जिनके वेद सम्बन्धी प्रभूत परिश्रम के आगे नत-मस्तक होकर भी हमें यह कहने में तनिक भी संकोच नहीं कि वेद में अनेकेश्वरवाद (Polytheism) सिद्ध करने की उनकी चेष्टा दुश्चेष्टा मात्र है।
वेद में अनेक ईश्वरों के वर्णन की कल्पना एक और भ्रम पर ही आधारित है। आजकल विज्ञान की प्रत्येक शाखा में प्रचलित विकासवाद के आधार पर सोचनेवाले लोग यह समझते हैं कि ईश्वर की कल्पना बौद्धिक ज्ञान की पराकाष्ठा की द्योतक है, और वेद क्योंकि आदिम रचना है, इसलिए आदिकाल के लोगों की बुद्धि का विकास इतना नहीं हो सकता कि वे ईश्वर के एकत्व की कल्पना कर सकें। वे तो नदी-नालों, वृक्ष-वनस्पतियों, भूधरों, वर्षा, बादल, बिजली आदि प्राकृतिक विपर्ययों और भौतिक घटना-विलासों को ही देव समझकर पूजने लगे या उन्हीं में ईश्वरत्व की बुद्धि रखने लगे। विकासवाद-जनित इसी कपोल-कल्पना के आधार पर इस्लाम के मतानुयायी यहां तक कहने लगे कि संसार के बड़े धर्मों में हमारा धर्म सबसे अर्वाचीन है, इसलिए यह परिपूर्ण धर्म है और इस परिपूर्णता की कसौटी यह है कि इस्लाम में एकेश्वरवाद पर सबसे अधिक बल दिया गया है। 'तौहीद की अमानत सीने में है हमारे'- कहकर इसी एकेश्वरवाद को इस्लाम का सबसे बड़ा वरदान स्वीकार किया गया है। इस्लाम के इस एकेश्वरवाद की चकाचौंध से कुछ लोग इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने यहां तक कहने में संकोच नहीं किया कि मध्यकाल में शंकराचार्य ने अद्वैतवाद के दार्शनिक आधार पर ईश्वर के एकत्व का जो प्रचार किया वह इस्लाम के और मुसलमान सूफियों के एकेश्वरवाद से ही प्रेरित होकर किया। ऐसा कहने वाले भारतीय विद्वानों में पं० सुन्दरलाल, डॉ० ताराचन्द और केन्द्रीय शिक्षमन्त्री डॉ० हुमायूँ कबीर प्रभृति का नाम लिया जा सकता है।


ईश्वर एक है-
जहां तक वेद का सम्बन्ध है, उसकी बात वेद के ही आधार पर कही जाए तो अच्छा है, क्योंकि अन्य ग्रन्थों के आधार पर कही हुई बात परत:प्रमाण होगी और उसके विवाद का विषय बन जाने की भी सम्भावना है। इसके अलावा वेद स्वयं इतना समर्थ है कि उसे अपनी बात की पुष्टि के लिए किसी अन्य ग्रन्थ की सहायता की आवश्यकता नहीं।
वेद ने स्वयं ही उक्त गुत्थी सुलझा दी है। ऋग्वेद का एक मन्त्र है-


इन्द्र मित्रं वरुणमग्निमाहुरथो दिव्य: स सुपर्णो गुरुत्मान्।
एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्त्यग्निं यमं मातरिश्वानमाहु:।। -ऋक् १/१६४/४६
ज्ञानी लोग एक ही ईश्वर को अनेक नामों से पुकारते हैं- अग्नि, यम, मातरिश्वा, इन्द्र, मित्र, वरुण सुपर्ण, गरुत्मान्- सब उसी एक ईश्वर के नाम हैं। [देखिए सत्यार्थप्रकाश प्रथम समुल्लास- उसमें परमात्मा के इस प्रकार के १०८ नामों की व्याख्या की गई है।]


इसी प्रकार "य एकश्चर्षणीनां वसूनामिरज्यति" (ऋक् १/७/९), "य एक इद्विदयते वसु मर्त्ताय दाशुषे" (ऋक् १/८४/७), "ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्" (यजु० ४०/१), "भुवनस्य यस्पतिरेक एव नमस्य:" (अथर्व० २/२/१)- इत्यादि अनेक मन्त्र चारों वेदों से उद्धृत किये जा सकते हैं, जिनसे ईश्वर का एकत्व प्रतिपादित होता है। विशेष बात यह है कि जहां ईश्वर की एकता के प्रतिपादक सैकड़ों मन्त्र हैं, वहां ईश्वर की अनेकता को सिद्ध करनेवाला एक मन्त्र भी प्रस्तुत करना कठिन है। इसी प्रसङ्ग में अथर्ववेद (१३/४/२) के १६ से १८ तक के मन्त्र ध्यान देने योग्य है-


"न द्वितीयो न तृतीयश्चतुर्थो नाप्युच्यते।
न पञ्चमो न षष्ठ: सप्तमो नाप्युच्यते।
नाष्टमो न नवमो दशमो नाप्युच्यते।
स एष एक एकवृदेक एव।।"
-उसे दूसरा, तीसरा और चौथा नहीं कह सकते। पांचवां, छठा, सातवां भी नहीं कह सकते। आठवां, नवां, और दसवां भी नहीं कह सकते। वह एक ही है, अकेला ही जगत् की उत्पत्ति-स्थिति-प्रलय करने वाला है। वह एक ही है।


अनेकेश्वरवाद का खण्डन करनेवाला और ईश्वर की एकता का प्रतिपादन करनेवाला इससे अधिक स्पष्ट और प्राञ्जल वर्णन संसार के अन्य किसी धर्मग्रन्थ में नहीं मिल सकता- यह बात चुनौती देकर कही जा सकती है। न सही अनेक ईश्वर, परन्तु वेद में अनेक देवताओं का तो वर्णन है? इसे कोई अस्वीकार नहीं करता। वेद में अनेक देवताओं का तो वर्णन अवश्य है, किन्तु उपासना के योग्य ईश्वर सर्वत्र एक ही बताया गया है। जहां तक देव या देवता शब्द की बात है, वहां सर्वत्र समझना यह है कि 'देव' शब्द 'दिवु' धातु से बनता है। उस 'दिवु' धातु का व्याकरणसम्मत अर्थ है- क्रीड़ा, विजिगीषा, व्यवहार, द्युति, स्तुति, मोद, मद, स्वप्न, कान्ति और गति। अर्थात् जिस किसी पदार्थ में इनमें से किसी भी गुण-विशेष का आधिक्य हो, वही देव कहलाएगा। संक्षेप में कह सकते हैं कि दिव्य गुण को धारण करनेवाली प्रत्येक वस्तु देवकोटि में आती है। पृथिवी, अग्नि, वायु, जल, चन्द्र, सूर्य आदि सब देव हैं, क्योंकि विशिष्ट गुणों को धारण करनेवाले हैं। विद्वानों को भी देव कहते हैं, क्योंकि वे अपनी विद्या के बल पर चमकते हैं। देववाची प्रत्येक शब्द प्रकारान्तर से परमात्मा का भी वाची होता है, क्योंकि आखिर सब देवों का अधिष्ठाता तो वही है। कौन-सा देववाची शब्द किस स्थान पर परमात्मा का वाचक है और किस स्थान पर अन्य पदार्थ का, इसका निर्णय प्रकरण के अनुसार करना होगा। देवता अनेक होने और भी आराध्यदेव केवल ईश्वर है और वह सब देवों का अधिष्ठाता है- वेद का यही सिद्धान्त है और इसमें कहीं शंका का स्थान नहीं है।


तैंतीस देवता-
यजुर्वेद में जो तैंतीस देवताओं का वर्णन आता है, उसकी व्याख्या शतपथ के अनुसार इस प्रकार है- आठ वसु, ग्यारह रुद्र, बारह आदित्य, एक इन्द्र और एक प्रजापति (८+११+१२+१+१=३३) ये तैंतीस देवता हैं। पृथिवी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, चन्द्र, सूर्य और नक्षत्र- ये आठ वसु हैं, क्योंकि ये समस्त सृष्टि के वास-हेतु हैं; इनके बिना सृष्टि की कल्पना नहीं की जा सकती। प्राण, अपान, व्यान, उदान, समान, नाग, कूर्म, कृकल, देवदत्त, धनञ्जय और जीवात्मा ये ग्यारह रुद्र हैं, क्योंकि जब ये शरीर को छोड़कर जाने लगते हैं तो सबको रुलाते हैं। संवत्सर के बारह मास चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद, आश्विन, कार्तिक, मार्गशीर्ष, पौष, माघ, फाल्गुन ये बारह आदित्य हैं, क्योंकि ये सबकी आयु को लेते जाते हैं। इन्द्र है बिजली- अन्तरिक्ष में यह वृष्टि की जनक है और भूलोक में वैज्ञानिक क्रान्ति की जनक है- इसलिए ऋषि ने इसे परमैश्वर्य का हेतु बताया है। बिना उद्योगों के राष्ट्र समृद्ध नहीं हो सकता और बिना बिजली के उद्योगों का विस्तार नहीं हो सकता। उद्योगीकरण से राष्ट्र को ऐश्वर्यशाली बनाने के लिए ही बिजली की अधिकाधिक आवश्यकता है और इसीलिए इस दिशा में इतना प्रयत्न किया जाता है। प्रजापति है यज्ञ। यज्ञ को प्रजापति इसलिए कहा है कि यज्ञ के द्वारा ही वायुमण्डल की शुद्धि, वृष्टि, जल और औषधि की शुद्धि होती है तथा विद्वानों के संगतिकरण से अनेक शिल्पविद्याओं का विकास होता है और ये ही सब प्रजापालन में सहायक है।


क्या ईश्वर का प्रत्यक्ष ज्ञान सम्भव है?-
आप देवताओं की व्याख्या के चक्कर में पड़े हैं, परन्तु हम तो सब देवों के देव- ईश्वर की सत्ता को ही स्वीकार करते हैं। क्या ईश्वर का अस्तित्व किसी तरह सिद्ध किया जा सकता है?
यों तो ईश्वर की सत्ता को सिद्ध करने के लिए अन्य अनेक प्रकार की युक्तियां दी जा सकती हैं; किन्तु इस समुल्लास में ऋषि ने अद्भुत ढंग से ईश्वर की सत्ता सिद्ध की है। जितने वैज्ञानिकम्मन्य लोग हैं, वे यह कहते हैं कि हम तो केवल प्रत्यक्ष को ही प्रमाण मानते हैं, अप्रत्यक्ष वस्तु तत्त्व में हमारी आस्था नहीं। प्रयोगशाला में बैठकर अपनी इच्छानुसार जिस पदार्थ को तोड़ने-फोड़ने, घटाने-बढ़ाने और उसकी क्रिया-प्रतिक्रिया को जांचने की सुविधा वैज्ञानिक को न मिले उस पदार्थ की सत्ता में वह विश्वास करे भी कैसे? न्यूट्रोन, प्रोटोन, और इलेक्ट्रोन जैसे सूक्ष्म तत्त्वों तक पहुंचकर तो उसका 'अहम्' और भी फूल गया। वैज्ञानिक यह समझने लगा कि अणुबम बनाकर सृष्टि का संहार करने की कुञ्जी मैंने अपनी मुट्ठी में बन्द कर ली, इसलिए इस सृष्टि का कर्त्ता-धर्त्ता-संहर्त्ता मेरे सिवाय और कौन हो सकता है?
ऋषि ने कहा कि ईश्वर का भी प्रत्यक्ष होता है। ईश्वर प्रत्यक्ष न होने की जिस युक्ति के भरोसे नास्तिकों के सब सम्प्रदाय और आधुनिक वैज्ञानिकगण मन में फूले नहीं समा रहे थे, ऋषि ने उसकी जड़ ही काट दी।


ईश्वर का प्रत्यक्ष कैसे होता है, अब यह देखिए।
न्यायदर्शन के अनुसार, इन्द्रिय और अर्थ के सन्निकर्ष से उत्पन्न जो निर्भ्रान्त और निश्चयात्मक ज्ञान है, वही प्रत्यक्ष कहलाता है। इन्द्रियां हैं- आंख, नाक, कान, जिह्वा, और त्वचा तथा मन। आंख से रूप का अनुभव होगा, नाक से गन्ध का, कान से शब्द का, जिह्वा से रस का और त्वचा से स्पर्श का। अब रूप, रस, गन्ध, स्पर्श और शब्द तो गुण हैं, किन्तु जब इन्द्रियों का इन गुणों से सन्निकर्ष होता है, तब हम आत्मायुक्त मन से गुणी का प्रत्यक्ष करते हैं। विज्ञान की दृष्टि से पदार्थ उसको कहते हैं जिसमें भार हो और जो स्थान घेरे। इस व्याख्या के अनुसार जैसे रूप, रस आदि पदार्थों के गुण हैं; वैसे ही भार होना या स्थान घेरना भी गुण है; स्वयं पदार्थ नहीं। रूप, रस आदि का तो कोई भार भी नहीं होता, न ही वे स्थान घेरते हैं। समस्त संसार में जितने भी पदार्थ हैं उन सब के गुणों का ही सम्पर्क हमारी इन्द्रियों के साथ होता है और उनके गुणों के सम्पर्क से ही हम कहते हैं कि हमें अमुक पदार्थ अर्थात् गुणी का प्रत्यक्ष हो जाएगा। जिस प्रकार हम सामान्य व्यवहार में गुण से गुणी का प्रत्यक्ष करते हैं उसी प्रकार इस समग्र सृष्टि रचना-चातुरी को देखकर इसके रचयिता अर्थात् गुणी परमात्मा का प्रत्यक्ष होता है। यदि कहा जाए कि परमात्मा का इस प्रकार प्रत्यक्ष हम नहीं मानते तो लोक में भी किसी पदार्थ का प्रत्यक्ष सम्भव नहीं; यदि लोक में किसी भी पदार्थ का प्रत्यक्ष सम्भव है- जिससे न चार्वाक इनकार करते हैं, न विज्ञान को सर्वेसर्वा समझने वाले कम्युनिस्ट तथा अन्य नास्तिक- तो सृष्टि को देखकर सृष्टिकर्त्ता का भी प्रत्यक्ष मानना ही होगा। सृष्टि-रचना में कहीं चातुरी नहीं है, इस बात से कट्टर से कट्टर नास्तिक भी इनकार नहीं कर सकता। चातुरी गुण है और वही गुणी का प्रत्यक्ष करवाने में प्रमाण है।


एक अन्य युक्ति-
ईश्वर की सत्ता में एक और अकाट्य युक्ति है। नास्तिक लोग ईश्वर की सत्ता से भले ही इनकार करें, किन्तु जीवात्मा की सत्ता से इनकार करना उनके बस की भी बात नहीं। जीवात्मा की सत्ता का निषेध करना तो एक तरह से अपनी ही सत्ता का निषेध करना हुआ- और अहम्भाव से ओत-प्रोत वैज्ञानिकम्मन्य ऐसा कैसे कर सकता है? प्रश्न यह है कि जब मनुष्य परोपकार या भलाई का कोई काम करने लगता है, तब उसके मन में भलाई के लिए उत्साह और प्रेरणा कहाँ से पैदा होती है? और जब मनुष्य कोई अनाचार या बुराई का काम करने लगता है, तब उसके मन में भय, शंका और लज्जा की भावना कौन पैदा करता है? मनुष्य का मन तो सदा पानी की तरह नीचे की ओर, पतन की ओर, जाने के लिए उद्यत रहता है, उत्थान के पथ पर बढ़ने की उमंग उसमें कहां से पैदा होती है? कहना नहीं होगा कि यह काम परमात्मा की ओर से होता है। जीवात्मा तो इस विषय में सर्वथा तटस्थ है, बल्कि मन की गति के साथ ही चलने की ओर उसका झुकाव अधिक रहता है। अच्छाई की प्रेरणा और बुराई से संकोच ऐसी सार्वत्रिक भावना है कि पापी से पापी आदमी भी इसकी सच्चाई से मना नहीं कर सकता। परम दार्शनिक, परम वैयाकरण और साहित्यिक योगिराज भर्तृहरि ने इसीलिए ईश्वर की सिद्धि का एकमात्र प्रमाण 'स्वानुभूत्येकमानाय' कहकर दिया है- अर्थात् ईश्वर की सत्ता का एकमात्र प्रमाण अपनी अनुभूति है और जिसको एक बार अच्छाई के प्रेरक और बुराई के निवारक प्रभु की सत्ता की अनुभूति हो गई है, सारा संसार भी अपने तर्कजाल के अम्बार के बल पर उसे अनुभूति से विरत नहीं कर सकता। यही अनुभूति महापुरुषों को संघर्षों का और विपरत परिस्थितियों का मुकाबला करने की शक्ति प्रदान करती है।


ईश्वर सर्वव्यापक है-
अच्छा मान लिया कि ईश्वर है, किन्तु वह रहता कहाँ है? कोई कहता है कि वह गोलोक में रहता है, कोई कहता है कि क्षीरसागर में शयन करता है, कोई कहता है कि कैलाश पर निवास करता है, कुछ लोग चौथे आसमान पर और अन्य लोग सातवें आसमान पर उसका निवास बताते हैं। आखिर जब ईश्वर है, तो कहीं न कहीं रहता भी होगा ही?
रहता क्यों नहीं, रहता है, किन्तु कहीं या किसी एक स्थान पर नहीं रहता। ईश्वर सब स्थानों पर रहता है। कभी भी किसी ऐसे स्थान की कल्पना नहीं की जा सकती जहां ईश्वर न हो। वह सर्वव्यापक है। किसी स्थान-विशेष पर उसकी कल्पना करने से वह एकदेशी हो जाएगा। जो एकदेशी होगा, सर्वव्यापक नहीं हो सकता। दोनों परस्पर विरोधी बातें हैं। जिन लोगों ने परमात्मा को किसी एक स्थान पर प्रतिष्ठित माना है वे प्रकारान्तर से उसके सर्वव्यापक होने का खण्डन करते हैं। किसी एक स्थान पर होने का अर्थ ही यह है कि वह उससे भिन्न स्थान पर नहीं है। जो यहां है और वहां नहीं या वहां है और यहां नहीं, वह सर्वव्यापक कैसा?


क्या ईश्वर साकार है?-
इसके साथ प्रश्न जुड़ा हुआ है कि परमात्मा साकार है या निराकार?
ईश्वर को साकार मान लेना जितना आसान है उतना ही कठिन है उसे साकार सिद्ध करना। जो साकार है, वह सर्वव्यापक कैसे हो सकता है? जो व्यापक नहीं, वह सर्वज्ञ भी नहीं हो सकता, सर्वान्तर्यामी भी नहीं। जिसका आकार होगा, वह परिमित होगा और परिमित वस्तु के गुण, कर्म, स्वभाव भी परिमित होंगे। परिमित वस्तु को सर्दी, गर्मी, भूख, प्यास, रोग, शोक और छेदन-भेदन का भी शिकार होना पड़ेगा। इसलिए ईश्वर न परिमित है, न ही साकार। साकार हो तो उसका कुछ न कुछ आकार होगा। वह लम्बा, चौड़ा, गोल, चपटा- कुछ तो होगा ही, उसका आयतन और आयाम दोनों ही मानने होंगे और आयतन तथा आयाम दोनों मानते ही वह भगवान् और विस्तारवान् में भौतिक-पिण्ड मात्र रह जाएगा।
यदि लम्बाई-चौड़ाई वाला कोई ज्यामितिक और भौतिक पिण्ड नहीं, तो क्या वह मानवाकृतिवाला कोई पदार्थ है? "God made the man in His image"- परमात्मा ने मनुष्य को अपनी नकल पर बनाया- यह कहनेवाले समझते हैं कि असल भी नकल से मिलता-जुलता ही होना चाहिए- अर्थात् परमात्मा की भी आदमी जैसी ही शक्ल है। परमात्मा को अवतार लेने वाला बतानेवाले भी ईश्वर की आदमी जैसी ही शक्ल मानते हैं। वैसे ही आंख, कान, नाक आदि सभी अवयव। ईसा को परमेश्वर का पुत्र मानने वाले ईसाई, हजरत मुहम्मद साहब को खुदा का भेजा हुआ खास पैगम्बर माननेवाले मुसलमान या राम और कृष्ण आदि के रूप में परमात्मा का अवतार मानने वाले पौराणिक बन्धु- ये सब इस दृष्टि से समान हैं। सबके मन में परमात्मा मनुष्य आकृतिवाला है और वैसे ही हस्तपादादि अवयवों से संयुक्त है। वेद में भले ही "अज एकपात्" कहकर प्रभु को अजन्मा और "सपर्यगाच्छुक्रमकायमव्रणमस्नाविरम्" कहकर उसे शरीररहित और नस-नाड़ी से रहित बताया गया हो एवं भले ही उपनिषदों में उसे "अपाणिपादो जवनो ग्रहीता स पश्यत्यचक्षु: स शृणोत्यकर्ण:" कहकर उसे हस्तपादादि कर्मेन्द्रियों और चक्षु-श्रोत्रादि ज्ञानेन्द्रियों से रहित बताया गया हो, किन्तु एक अन्ध-परम्परा चल पड़ी है और उसी के अनुसार लाखों-करोड़ों लोग अवतारवाद के अभिशाप से ईश्वर के मानवाकृति होने के भ्रम से निकल नहीं पाते। अवतारवाद को सबसे अधिक प्रश्रय देने वाला गीता का यह श्लोक है-
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्।।४/७।।
-श्री कृष्ण जी कहते हैं कि जब-जब धर्म का ह्रास होता है और अधर्म का विकास होता है, तब-तब मैं अपने आपको पैदा करता हूँ (शरीर धारण करके अवतार ग्रहण करता हूँ।)


गीता का उचित स्थान-
यहां गीता के सम्बन्ध में केवल इतना कह देना पर्याप्त है कि वह स्वतन्त्र ग्रन्थ न होकर महाभारत का एक अंश मात्र है, इसलिए उसकी प्रामाणिकता भी उतनी ही है जितनी महाभारत की। इसी से यह बात भी स्पष्ट हो जानी चाहिए कि गीता के सम्बन्ध में जो यह प्रवाद प्रचलित उसमें श्रीकृष्ण के मुख से निकले हुए वचन हैं ("या स्वयं पद्मानाभस्य मुखपद्माद् विनिस्सृता")- उसमें कोई तथ्य नहीं है। जिस तरह शेष महाभारत, जिसका असली नाम 'जय' है और जिसमें मूलतः केवल बीस हजार श्लोक थे, महर्षि व्यास की कृति है वैसे ही गीता भी महर्षि व्यास की ही रचना है। पूछा जा सकता है कि फिर गीता की इतनी लोकप्रियता का रहस्य क्या है? इसका उत्तर हम यह देंगे कि जिस प्रकार महात्मा गांधी के सर्व-धर्म-समन्वयवाद ने सभी धर्मावलम्बियों को अविरोध भाव से एकत्र होने की प्रेरणा दी और इसीलिए लोकसंग्रह की दृष्टि से महात्मा गांधी सबसे अधिक सफल और लोकप्रिय नेता कहे जा सकते हैं, वैसे ही गीता में सभी दार्शनिक सम्प्रदायों का ऐसा अद्भुत समन्वय है कि सभी को उनमें अपने पक्ष का पोषण मिल जाता है। इसीलिए गीता अपने चारों और इतना लोकसंग्रह कर सकी। दार्शनिक विवेचना करनेवालों को गीता में परस्पर-विरोधी बातें भी मिल जाएंगी, पर एक ही साथ 'रामाय स्वस्ति' और 'रावणाय स्वस्ति' कहनेवाले के पीछे जैसे राम और रावण दोनों के अनुयायी चलने को तैयार हो जाएंगे, बहुत कुछ वही हाल गीता का भी है।


श्लोक का अर्थ-
यदि समाजशास्त्र की दृष्टि से गीता के उक्त श्लोक की व्याख्या की जाए तो उसमें एक ऐसे ऐतिहासिक सत्य का उद्घाटन है जिससे इन्कार नहीं किया जा सकता। जब-जब धर्म की ग्लानि और अधर्म का अभ्युत्थान का अर्थ यह समझा जा सकता है कि जब-जब किसी जाति का सामाजिक और राजनीतिक दृष्टि से अध:पतन हो जाता है तब-तब उसमें ऐसे महापुरुष पैदा होते हैं जो उस जाति को पतन के गर्त से निकालकर उन्नति के शिखर पर ले जाने का प्रयत्न करते हैं। इतिहास की शिक्षा यही है कि कोई भी महापुरुष जन्म से महापुरुष नहीं होता, किन्तु अपने समय की परिस्थितियां ही उसे महापुरुष बनाती हैं। पराधीन भारत में दयानन्द, श्रद्धानन्द, तिलक, रवीन्द्र, सुभाष प्रभृति जैसे नररत्न पैदा हुए, क्या वैसे नररत्नों की कल्पना स्वाधीन भारत में की जा सकती है। जितनी तीव्र क्रिया होगी, उतनी ही तीव्र प्रतिक्रिया होगी- यह विज्ञान का सिद्धान्त है। भारत का जितना तीव्र अध:पतन हुआ था उसी का यह परिणाम था कि उसने अनेक ऐसी विभूतियों को जन्म दिया जो केवल भारत-वन्द्य नहीं प्रत्युत विश्ववन्द्य है। दुःख को इसीलिए रसायन कहा जाता है।
यदि मनोविज्ञानपरक अर्थ इस श्लोक का किया जाए तो उसे यों समझा जा सकता है कि अपने चारों ओर धर्म को घटता और अधर्म को बढ़ता देखकर किसी दृढ़ संकल्प धर्मात्मा व्यक्ति के मन में यह भाव या सकता है कि मैं अधर्म का नाश करके धर्म का राज्य स्थापित करूँगा। यह भी एक शाश्वत सामाजिक प्रवृत्ति है जो सभी धार्मिक महापुरुषों के जीवन में स्पष्ट दृष्टिगोचर होती है। इस प्रवृत्ति को हृदयंगम किये बिना विभिन्न देशों में पैदा हुए विभिन्न महापुरुषों के जीवन की व्याख्या की ही नहीं जा सकती। यही वैज्ञानिक दृष्टिकोण भी है। इसीलिए इस श्लोक से अवतारवाद सिद्ध करनेवालों को उत्तर देते हुए ऋषि ने लिखा है कि 'वेद-विरुद्ध होने से अवतार लेने की बात प्रमाण नहीं मानी जा सकती। किन्तु ऐसा हो सकता है कि श्रीकृष्ण धर्म की रक्षा करना चाहते थे कि मैं युग-युग में जन्म लेकर श्रेष्ठों की रक्षा और दुष्टों का नाश करूँ तो इसमें कुछ दोष नहीं।' "न त्वहं कामये राज्यं न स्वर्गं नापुनर्भवम् कामये। दुःखतप्तानां प्राणीनामार्तिनाशनम्।" मैं राज्य नहीं चाहता, स्वर्ग नहीं चाहता, मोक्ष भी नहीं, किन्तु दुःख से सन्तप्त नर-नारियों का दुःख-नाश करने के लिए इस लोक में जन्म ग्रहण करना चाहता हूं। यही तो महापुरुष की असली मनोभावना है और यह कितनी प्रबल होती है इसकी कल्पना इसी से की जा सकती है कि दुःखीजनों के दुःख-नाश के लिए वह राज्य, स्वर्ग, मोक्ष सभी को तिलाञ्जलि देने को तैयार है। मोक्ष न चाहने से ही यह अर्थ स्वयं निकल आता है कि मैं इस लोक में जन्म ग्रहण करना चाहता हूं।


जैसे वेद को समझने के लिए वेद स्वयं सहायक है, वैसे ही गीता ने भी बहुत बार अपनी गुत्थियां अपने आप खोल दी हैं। उक्त श्लोक में यही तो कहा है न- "तदात्मानं सृजाम्यहम्"- यहां 'आत्मानं' शब्द का क्या अभिप्राय है, यह गीता से ही पूछना चाहिए। जिस व्यक्ति ने गीता में 'तदात्मानं सृजाम्यहम्' लिखा, उसी ने लिखा है- 'योगी त्वात्मैव मे मतम्' अर्थात् योगी को तो मैं अपना आत्मा ही मानता हूं। अब 'तदात्मानं सृजाम्यहम्' में 'आत्मानं' शब्द के स्थान पर 'योगिनाम्' शब्द रखकर देखिए। 'तदा योगिनं सृजाम्यहम्' का अर्थ होगा- मैं योगी को पैदा करता हूँ। (वहां 'सृजामि' शब्द को लुप्तणिजन्त प्रयोग मानना होगा, अर्थात् 'सर्जयामि' के स्थान पर 'सृजामि' शब्द का प्रयोग हुआ है।) यदि 'सृजामि' को 'सर्जयामि' मानने में बाधा हो और उक्त श्लोक को श्रीकृष्ण के ही मुख का वचन मानना हो तो अर्थ यह हो जाएगा कि 'योगी के रूप में मैं जन्म लेता हूँ।'
अब जरा पूरे श्लोक का अर्थ देखिए 'जब-जब धर्म की ग्लानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब मैं किसी योगी (महापुरुष) को पैदा करता हूँ।'- यह अर्थ समाज-शास्त्र के दृष्टिकोण से सर्वथा सुसंगत है या दूसरा अर्थ यह होगा; जब-जब धर्म की ग्लानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब कोई योगी (मैं) पैदा होता है (हूँ)।' यह अर्थ मनोविज्ञान की दृष्टि से सुसंगत है। इससे अधिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण और क्या हो सकता है?


तर्क से अवतारवाद का खण्डन-
इस प्रकार किसी प्रमाण से अवतारवाद के सिद्ध होने की सम्भावना नहीं। रही तर्क की बात, क्या तर्क से अवतार सिद्ध किया जा सकता है? यह और भी कठिन है। जब एक बार ईश्वर को सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान, सर्वान्तर्यामी और निराकार मान लिया, तब तर्क से ईश्वर का अवतार कैसे सिद्ध किया जा सकता है? जो निराकार और सर्वव्यापी है वह आकर ग्रहण करने के लिए मां के पेट में एक स्थानबद्ध कैसे रहेगा। फिर जो जन्म लेगा वह मरेगा भी अवश्य। जो जन्म और मरण दोनों के चक्कर में पड़ा वह सामान्य मनुष्य ही होगा, ईश्वर नहीं। कहा जाता है कि राक्षसराज रावण और पापी कंस को मारने के लिए राम और कृष्ण के रूप में ईश्वर को अवतार लेना पड़ा। कैसी बचकानी-सी बात है। सोचिए किसी चीज को बनाना अधिक आसान होता है या बिगाड़ना। जिस इमारत को सैकड़ों मजदूर मिलकर महीनों तक परिश्रम करके बनाते हैं और उसी को चन्द मजदूर चन्द दिनों में गिराकर रख देंगे। मानना ही होगा कि बिगाड़ने की अपेक्षा बनाना कहीं अधिक कठिन कार्य है। सो रावण और कंस जैसे व्यक्तियों को, फिर वह कितने ही शक्तिशाली क्यों न हो, पैदा करने के लिए यदि अवतार लेने की आवश्यकता नहीं पड़ी तो उन्हें मारने के लिए अवतार लेने की आवश्यकता क्यों पड़ती? जो ईश्वर सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय जैसे महान् कार्यों को करता है उसको किसी एक व्यक्ति का नाश करने के लिए भी अवतार लेना पड़े, इससे तो ईश्वर का नहीं किन्तु रावण और कंस का ही गौरव बढ़ता है। तब तो सर्वशक्तिमान् ईश्वर नहीं, रावण ही हुआ।


[स्त्रोत- परोपकारी : महर्षि दयानन्द सरस्वती की उत्तराधिकारिणी परोपकारिणी सभा का मुख पत्र का मार्च २०२० का अंक; प्रस्तुति- प्रियांशु सेठ]


ईश्वर के स्वरूप का दार्शनिक और वैज्ञानिक विवेचन - वेद की नित्यता पर प्रकाश
(सत्यार्थ प्रकाश के सप्तम समुल्लास के आधार पर)


[भाग- १]


लेखक- पं० क्षितिश कुमार वेदालंकार


[परोपकारी पत्रिका अपने 'ऐतिहासिक कलम से' नामक शीर्षक के माध्यम से पाठकों को कुछ ऐसे लेखों से परिचित करा रही है, जो 'आर्योदय' (साप्ताहिक) के सत्यार्थप्रकाश विशेषांक से लिये गये हैं। यह विशेषांक दो भागों में छपा था। पूर्वार्द्ध के सम्पादक श्री प्रकाशजी थे तथा उत्तरार्द्ध के सम्पादक पं० भारतेन्द्रनाथजी तथा श्री रघुवीर सिंह शास्त्री थे। यह विशेषांक विक्रम संवत् २०२० में निकाला गया था। यहां यह स्मरण रखना जरूरी है कि इस विशेषांक में जो लेख प्रस्तुत किये गये हैं वे पं० भारतेन्द्रनाथ जी ने विद्वानों से आग्रहपूर्वक लिखवाये थे, जो कि पण्डित जी अक्सर किया करते थे। उसी विशेषांक के कुछ चयनित लेख पाठकों की सेवा में प्रस्तुत किये जा रहे हैं। जिनमें यह सप्तम लेख 'ईश्वर के स्वरूप का दार्शनिक और वैज्ञानिक विवेचन - वेद की नित्यता पर प्रकाश' आर्यजगत् के सुप्रसिद्ध विद्वान् पं० क्षितिश कुमार वेदालंकार द्वारा लिखा गया है। -डॉ० सुरेन्द्रकुमार, सम्पादक- परोपकारी]


अनेक विद्वानों की यह धारणा है कि वेद में अनेक ईश्वरों का वर्णन है। पौराणिकों के विभिन्न सम्प्रदाय और उनमें पृथक्-पृथक् आराध्यदेवों का प्रचलन देखकर ही शायद उन्होंने यह धारणा बनाई हो। पौराणिकों के आचरण को देखकर उसे वेद पर आरोपित करने की भूल करनेवालों में सबसे आगे हैं वे पाश्चात्य विद्वान् जिनके वेद सम्बन्धी प्रभूत परिश्रम के आगे नत-मस्तक होकर भी हमें यह कहने में तनिक भी संकोच नहीं कि वेद में अनेकेश्वरवाद (Polytheism) सिद्ध करने की उनकी चेष्टा दुश्चेष्टा मात्र है।
वेद में अनेक ईश्वरों के वर्णन की कल्पना एक और भ्रम पर ही आधारित है। आजकल विज्ञान की प्रत्येक शाखा में प्रचलित विकासवाद के आधार पर सोचनेवाले लोग यह समझते हैं कि ईश्वर की कल्पना बौद्धिक ज्ञान की पराकाष्ठा की द्योतक है, और वेद क्योंकि आदिम रचना है, इसलिए आदिकाल के लोगों की बुद्धि का विकास इतना नहीं हो सकता कि वे ईश्वर के एकत्व की कल्पना कर सकें। वे तो नदी-नालों, वृक्ष-वनस्पतियों, भूधरों, वर्षा, बादल, बिजली आदि प्राकृतिक विपर्ययों और भौतिक घटना-विलासों को ही देव समझकर पूजने लगे या उन्हीं में ईश्वरत्व की बुद्धि रखने लगे। विकासवाद-जनित इसी कपोल-कल्पना के आधार पर इस्लाम के मतानुयायी यहां तक कहने लगे कि संसार के बड़े धर्मों में हमारा धर्म सबसे अर्वाचीन है, इसलिए यह परिपूर्ण धर्म है और इस परिपूर्णता की कसौटी यह है कि इस्लाम में एकेश्वरवाद पर सबसे अधिक बल दिया गया है। 'तौहीद की अमानत सीने में है हमारे'- कहकर इसी एकेश्वरवाद को इस्लाम का सबसे बड़ा वरदान स्वीकार किया गया है। इस्लाम के इस एकेश्वरवाद की चकाचौंध से कुछ लोग इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने यहां तक कहने में संकोच नहीं किया कि मध्यकाल में शंकराचार्य ने अद्वैतवाद के दार्शनिक आधार पर ईश्वर के एकत्व का जो प्रचार किया वह इस्लाम के और मुसलमान सूफियों के एकेश्वरवाद से ही प्रेरित होकर किया। ऐसा कहने वाले भारतीय विद्वानों में पं० सुन्दरलाल, डॉ० ताराचन्द और केन्द्रीय शिक्षमन्त्री डॉ० हुमायूँ कबीर प्रभृति का नाम लिया जा सकता है।


ईश्वर एक है-
जहां तक वेद का सम्बन्ध है, उसकी बात वेद के ही आधार पर कही जाए तो अच्छा है, क्योंकि अन्य ग्रन्थों के आधार पर कही हुई बात परत:प्रमाण होगी और उसके विवाद का विषय बन जाने की भी सम्भावना है। इसके अलावा वेद स्वयं इतना समर्थ है कि उसे अपनी बात की पुष्टि के लिए किसी अन्य ग्रन्थ की सहायता की आवश्यकता नहीं।
वेद ने स्वयं ही उक्त गुत्थी सुलझा दी है। ऋग्वेद का एक मन्त्र है-


इन्द्र मित्रं वरुणमग्निमाहुरथो दिव्य: स सुपर्णो गुरुत्मान्।
एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्त्यग्निं यमं मातरिश्वानमाहु:।। -ऋक् १/१६४/४६
ज्ञानी लोग एक ही ईश्वर को अनेक नामों से पुकारते हैं- अग्नि, यम, मातरिश्वा, इन्द्र, मित्र, वरुण सुपर्ण, गरुत्मान्- सब उसी एक ईश्वर के नाम हैं। [देखिए सत्यार्थप्रकाश प्रथम समुल्लास- उसमें परमात्मा के इस प्रकार के १०८ नामों की व्याख्या की गई है।]


इसी प्रकार "य एकश्चर्षणीनां वसूनामिरज्यति" (ऋक् १/७/९), "य एक इद्विदयते वसु मर्त्ताय दाशुषे" (ऋक् १/८४/७), "ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्" (यजु० ४०/१), "भुवनस्य यस्पतिरेक एव नमस्य:" (अथर्व० २/२/१)- इत्यादि अनेक मन्त्र चारों वेदों से उद्धृत किये जा सकते हैं, जिनसे ईश्वर का एकत्व प्रतिपादित होता है। विशेष बात यह है कि जहां ईश्वर की एकता के प्रतिपादक सैकड़ों मन्त्र हैं, वहां ईश्वर की अनेकता को सिद्ध करनेवाला एक मन्त्र भी प्रस्तुत करना कठिन है। इसी प्रसङ्ग में अथर्ववेद (१३/४/२) के १६ से १८ तक के मन्त्र ध्यान देने योग्य है-


"न द्वितीयो न तृतीयश्चतुर्थो नाप्युच्यते।
न पञ्चमो न षष्ठ: सप्तमो नाप्युच्यते।
नाष्टमो न नवमो दशमो नाप्युच्यते।
स एष एक एकवृदेक एव।।"
-उसे दूसरा, तीसरा और चौथा नहीं कह सकते। पांचवां, छठा, सातवां भी नहीं कह सकते। आठवां, नवां, और दसवां भी नहीं कह सकते। वह एक ही है, अकेला ही जगत् की उत्पत्ति-स्थिति-प्रलय करने वाला है। वह एक ही है।


अनेकेश्वरवाद का खण्डन करनेवाला और ईश्वर की एकता का प्रतिपादन करनेवाला इससे अधिक स्पष्ट और प्राञ्जल वर्णन संसार के अन्य किसी धर्मग्रन्थ में नहीं मिल सकता- यह बात चुनौती देकर कही जा सकती है। न सही अनेक ईश्वर, परन्तु वेद में अनेक देवताओं का तो वर्णन है? इसे कोई अस्वीकार नहीं करता। वेद में अनेक देवताओं का तो वर्णन अवश्य है, किन्तु उपासना के योग्य ईश्वर सर्वत्र एक ही बताया गया है। जहां तक देव या देवता शब्द की बात है, वहां सर्वत्र समझना यह है कि 'देव' शब्द 'दिवु' धातु से बनता है। उस 'दिवु' धातु का व्याकरणसम्मत अर्थ है- क्रीड़ा, विजिगीषा, व्यवहार, द्युति, स्तुति, मोद, मद, स्वप्न, कान्ति और गति। अर्थात् जिस किसी पदार्थ में इनमें से किसी भी गुण-विशेष का आधिक्य हो, वही देव कहलाएगा। संक्षेप में कह सकते हैं कि दिव्य गुण को धारण करनेवाली प्रत्येक वस्तु देवकोटि में आती है। पृथिवी, अग्नि, वायु, जल, चन्द्र, सूर्य आदि सब देव हैं, क्योंकि विशिष्ट गुणों को धारण करनेवाले हैं। विद्वानों को भी देव कहते हैं, क्योंकि वे अपनी विद्या के बल पर चमकते हैं। देववाची प्रत्येक शब्द प्रकारान्तर से परमात्मा का भी वाची होता है, क्योंकि आखिर सब देवों का अधिष्ठाता तो वही है। कौन-सा देववाची शब्द किस स्थान पर परमात्मा का वाचक है और किस स्थान पर अन्य पदार्थ का, इसका निर्णय प्रकरण के अनुसार करना होगा। देवता अनेक होने और भी आराध्यदेव केवल ईश्वर है और वह सब देवों का अधिष्ठाता है- वेद का यही सिद्धान्त है और इसमें कहीं शंका का स्थान नहीं है।


तैंतीस देवता-
यजुर्वेद में जो तैंतीस देवताओं का वर्णन आता है, उसकी व्याख्या शतपथ के अनुसार इस प्रकार है- आठ वसु, ग्यारह रुद्र, बारह आदित्य, एक इन्द्र और एक प्रजापति (८+११+१२+१+१=३३) ये तैंतीस देवता हैं। पृथिवी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, चन्द्र, सूर्य और नक्षत्र- ये आठ वसु हैं, क्योंकि ये समस्त सृष्टि के वास-हेतु हैं; इनके बिना सृष्टि की कल्पना नहीं की जा सकती। प्राण, अपान, व्यान, उदान, समान, नाग, कूर्म, कृकल, देवदत्त, धनञ्जय और जीवात्मा ये ग्यारह रुद्र हैं, क्योंकि जब ये शरीर को छोड़कर जाने लगते हैं तो सबको रुलाते हैं। संवत्सर के बारह मास चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद, आश्विन, कार्तिक, मार्गशीर्ष, पौष, माघ, फाल्गुन ये बारह आदित्य हैं, क्योंकि ये सबकी आयु को लेते जाते हैं। इन्द्र है बिजली- अन्तरिक्ष में यह वृष्टि की जनक है और भूलोक में वैज्ञानिक क्रान्ति की जनक है- इसलिए ऋषि ने इसे परमैश्वर्य का हेतु बताया है। बिना उद्योगों के राष्ट्र समृद्ध नहीं हो सकता और बिना बिजली के उद्योगों का विस्तार नहीं हो सकता। उद्योगीकरण से राष्ट्र को ऐश्वर्यशाली बनाने के लिए ही बिजली की अधिकाधिक आवश्यकता है और इसीलिए इस दिशा में इतना प्रयत्न किया जाता है। प्रजापति है यज्ञ। यज्ञ को प्रजापति इसलिए कहा है कि यज्ञ के द्वारा ही वायुमण्डल की शुद्धि, वृष्टि, जल और औषधि की शुद्धि होती है तथा विद्वानों के संगतिकरण से अनेक शिल्पविद्याओं का विकास होता है और ये ही सब प्रजापालन में सहायक है।


क्या ईश्वर का प्रत्यक्ष ज्ञान सम्भव है?-
आप देवताओं की व्याख्या के चक्कर में पड़े हैं, परन्तु हम तो सब देवों के देव- ईश्वर की सत्ता को ही स्वीकार करते हैं। क्या ईश्वर का अस्तित्व किसी तरह सिद्ध किया जा सकता है?
यों तो ईश्वर की सत्ता को सिद्ध करने के लिए अन्य अनेक प्रकार की युक्तियां दी जा सकती हैं; किन्तु इस समुल्लास में ऋषि ने अद्भुत ढंग से ईश्वर की सत्ता सिद्ध की है। जितने वैज्ञानिकम्मन्य लोग हैं, वे यह कहते हैं कि हम तो केवल प्रत्यक्ष को ही प्रमाण मानते हैं, अप्रत्यक्ष वस्तु तत्त्व में हमारी आस्था नहीं। प्रयोगशाला में बैठकर अपनी इच्छानुसार जिस पदार्थ को तोड़ने-फोड़ने, घटाने-बढ़ाने और उसकी क्रिया-प्रतिक्रिया को जांचने की सुविधा वैज्ञानिक को न मिले उस पदार्थ की सत्ता में वह विश्वास करे भी कैसे? न्यूट्रोन, प्रोटोन, और इलेक्ट्रोन जैसे सूक्ष्म तत्त्वों तक पहुंचकर तो उसका 'अहम्' और भी फूल गया। वैज्ञानिक यह समझने लगा कि अणुबम बनाकर सृष्टि का संहार करने की कुञ्जी मैंने अपनी मुट्ठी में बन्द कर ली, इसलिए इस सृष्टि का कर्त्ता-धर्त्ता-संहर्त्ता मेरे सिवाय और कौन हो सकता है?
ऋषि ने कहा कि ईश्वर का भी प्रत्यक्ष होता है। ईश्वर प्रत्यक्ष न होने की जिस युक्ति के भरोसे नास्तिकों के सब सम्प्रदाय और आधुनिक वैज्ञानिकगण मन में फूले नहीं समा रहे थे, ऋषि ने उसकी जड़ ही काट दी।


ईश्वर का प्रत्यक्ष कैसे होता है, अब यह देखिए।
न्यायदर्शन के अनुसार, इन्द्रिय और अर्थ के सन्निकर्ष से उत्पन्न जो निर्भ्रान्त और निश्चयात्मक ज्ञान है, वही प्रत्यक्ष कहलाता है। इन्द्रियां हैं- आंख, नाक, कान, जिह्वा, और त्वचा तथा मन। आंख से रूप का अनुभव होगा, नाक से गन्ध का, कान से शब्द का, जिह्वा से रस का और त्वचा से स्पर्श का। अब रूप, रस, गन्ध, स्पर्श और शब्द तो गुण हैं, किन्तु जब इन्द्रियों का इन गुणों से सन्निकर्ष होता है, तब हम आत्मायुक्त मन से गुणी का प्रत्यक्ष करते हैं। विज्ञान की दृष्टि से पदार्थ उसको कहते हैं जिसमें भार हो और जो स्थान घेरे। इस व्याख्या के अनुसार जैसे रूप, रस आदि पदार्थों के गुण हैं; वैसे ही भार होना या स्थान घेरना भी गुण है; स्वयं पदार्थ नहीं। रूप, रस आदि का तो कोई भार भी नहीं होता, न ही वे स्थान घेरते हैं। समस्त संसार में जितने भी पदार्थ हैं उन सब के गुणों का ही सम्पर्क हमारी इन्द्रियों के साथ होता है और उनके गुणों के सम्पर्क से ही हम कहते हैं कि हमें अमुक पदार्थ अर्थात् गुणी का प्रत्यक्ष हो जाएगा। जिस प्रकार हम सामान्य व्यवहार में गुण से गुणी का प्रत्यक्ष करते हैं उसी प्रकार इस समग्र सृष्टि रचना-चातुरी को देखकर इसके रचयिता अर्थात् गुणी परमात्मा का प्रत्यक्ष होता है। यदि कहा जाए कि परमात्मा का इस प्रकार प्रत्यक्ष हम नहीं मानते तो लोक में भी किसी पदार्थ का प्रत्यक्ष सम्भव नहीं; यदि लोक में किसी भी पदार्थ का प्रत्यक्ष सम्भव है- जिससे न चार्वाक इनकार करते हैं, न विज्ञान को सर्वेसर्वा समझने वाले कम्युनिस्ट तथा अन्य नास्तिक- तो सृष्टि को देखकर सृष्टिकर्त्ता का भी प्रत्यक्ष मानना ही होगा। सृष्टि-रचना में कहीं चातुरी नहीं है, इस बात से कट्टर से कट्टर नास्तिक भी इनकार नहीं कर सकता। चातुरी गुण है और वही गुणी का प्रत्यक्ष करवाने में प्रमाण है।


एक अन्य युक्ति-
ईश्वर की सत्ता में एक और अकाट्य युक्ति है। नास्तिक लोग ईश्वर की सत्ता से भले ही इनकार करें, किन्तु जीवात्मा की सत्ता से इनकार करना उनके बस की भी बात नहीं। जीवात्मा की सत्ता का निषेध करना तो एक तरह से अपनी ही सत्ता का निषेध करना हुआ- और अहम्भाव से ओत-प्रोत वैज्ञानिकम्मन्य ऐसा कैसे कर सकता है? प्रश्न यह है कि जब मनुष्य परोपकार या भलाई का कोई काम करने लगता है, तब उसके मन में भलाई के लिए उत्साह और प्रेरणा कहाँ से पैदा होती है? और जब मनुष्य कोई अनाचार या बुराई का काम करने लगता है, तब उसके मन में भय, शंका और लज्जा की भावना कौन पैदा करता है? मनुष्य का मन तो सदा पानी की तरह नीचे की ओर, पतन की ओर, जाने के लिए उद्यत रहता है, उत्थान के पथ पर बढ़ने की उमंग उसमें कहां से पैदा होती है? कहना नहीं होगा कि यह काम परमात्मा की ओर से होता है। जीवात्मा तो इस विषय में सर्वथा तटस्थ है, बल्कि मन की गति के साथ ही चलने की ओर उसका झुकाव अधिक रहता है। अच्छाई की प्रेरणा और बुराई से संकोच ऐसी सार्वत्रिक भावना है कि पापी से पापी आदमी भी इसकी सच्चाई से मना नहीं कर सकता। परम दार्शनिक, परम वैयाकरण और साहित्यिक योगिराज भर्तृहरि ने इसीलिए ईश्वर की सिद्धि का एकमात्र प्रमाण 'स्वानुभूत्येकमानाय' कहकर दिया है- अर्थात् ईश्वर की सत्ता का एकमात्र प्रमाण अपनी अनुभूति है और जिसको एक बार अच्छाई के प्रेरक और बुराई के निवारक प्रभु की सत्ता की अनुभूति हो गई है, सारा संसार भी अपने तर्कजाल के अम्बार के बल पर उसे अनुभूति से विरत नहीं कर सकता। यही अनुभूति महापुरुषों को संघर्षों का और विपरत परिस्थितियों का मुकाबला करने की शक्ति प्रदान करती है।


ईश्वर सर्वव्यापक है-
अच्छा मान लिया कि ईश्वर है, किन्तु वह रहता कहाँ है? कोई कहता है कि वह गोलोक में रहता है, कोई कहता है कि क्षीरसागर में शयन करता है, कोई कहता है कि कैलाश पर निवास करता है, कुछ लोग चौथे आसमान पर और अन्य लोग सातवें आसमान पर उसका निवास बताते हैं। आखिर जब ईश्वर है, तो कहीं न कहीं रहता भी होगा ही?
रहता क्यों नहीं, रहता है, किन्तु कहीं या किसी एक स्थान पर नहीं रहता। ईश्वर सब स्थानों पर रहता है। कभी भी किसी ऐसे स्थान की कल्पना नहीं की जा सकती जहां ईश्वर न हो। वह सर्वव्यापक है। किसी स्थान-विशेष पर उसकी कल्पना करने से वह एकदेशी हो जाएगा। जो एकदेशी होगा, सर्वव्यापक नहीं हो सकता। दोनों परस्पर विरोधी बातें हैं। जिन लोगों ने परमात्मा को किसी एक स्थान पर प्रतिष्ठित माना है वे प्रकारान्तर से उसके सर्वव्यापक होने का खण्डन करते हैं। किसी एक स्थान पर होने का अर्थ ही यह है कि वह उससे भिन्न स्थान पर नहीं है। जो यहां है और वहां नहीं या वहां है और यहां नहीं, वह सर्वव्यापक कैसा?


क्या ईश्वर साकार है?-
इसके साथ प्रश्न जुड़ा हुआ है कि परमात्मा साकार है या निराकार?
ईश्वर को साकार मान लेना जितना आसान है उतना ही कठिन है उसे साकार सिद्ध करना। जो साकार है, वह सर्वव्यापक कैसे हो सकता है? जो व्यापक नहीं, वह सर्वज्ञ भी नहीं हो सकता, सर्वान्तर्यामी भी नहीं। जिसका आकार होगा, वह परिमित होगा और परिमित वस्तु के गुण, कर्म, स्वभाव भी परिमित होंगे। परिमित वस्तु को सर्दी, गर्मी, भूख, प्यास, रोग, शोक और छेदन-भेदन का भी शिकार होना पड़ेगा। इसलिए ईश्वर न परिमित है, न ही साकार। साकार हो तो उसका कुछ न कुछ आकार होगा। वह लम्बा, चौड़ा, गोल, चपटा- कुछ तो होगा ही, उसका आयतन और आयाम दोनों ही मानने होंगे और आयतन तथा आयाम दोनों मानते ही वह भगवान् और विस्तारवान् में भौतिक-पिण्ड मात्र रह जाएगा।
यदि लम्बाई-चौड़ाई वाला कोई ज्यामितिक और भौतिक पिण्ड नहीं, तो क्या वह मानवाकृतिवाला कोई पदार्थ है? "God made the man in His image"- परमात्मा ने मनुष्य को अपनी नकल पर बनाया- यह कहनेवाले समझते हैं कि असल भी नकल से मिलता-जुलता ही होना चाहिए- अर्थात् परमात्मा की भी आदमी जैसी ही शक्ल है। परमात्मा को अवतार लेने वाला बतानेवाले भी ईश्वर की आदमी जैसी ही शक्ल मानते हैं। वैसे ही आंख, कान, नाक आदि सभी अवयव। ईसा को परमेश्वर का पुत्र मानने वाले ईसाई, हजरत मुहम्मद साहब को खुदा का भेजा हुआ खास पैगम्बर माननेवाले मुसलमान या राम और कृष्ण आदि के रूप में परमात्मा का अवतार मानने वाले पौराणिक बन्धु- ये सब इस दृष्टि से समान हैं। सबके मन में परमात्मा मनुष्य आकृतिवाला है और वैसे ही हस्तपादादि अवयवों से संयुक्त है। वेद में भले ही "अज एकपात्" कहकर प्रभु को अजन्मा और "सपर्यगाच्छुक्रमकायमव्रणमस्नाविरम्" कहकर उसे शरीररहित और नस-नाड़ी से रहित बताया गया हो एवं भले ही उपनिषदों में उसे "अपाणिपादो जवनो ग्रहीता स पश्यत्यचक्षु: स शृणोत्यकर्ण:" कहकर उसे हस्तपादादि कर्मेन्द्रियों और चक्षु-श्रोत्रादि ज्ञानेन्द्रियों से रहित बताया गया हो, किन्तु एक अन्ध-परम्परा चल पड़ी है और उसी के अनुसार लाखों-करोड़ों लोग अवतारवाद के अभिशाप से ईश्वर के मानवाकृति होने के भ्रम से निकल नहीं पाते। अवतारवाद को सबसे अधिक प्रश्रय देने वाला गीता का यह श्लोक है-
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्।।४/७।।
-श्री कृष्ण जी कहते हैं कि जब-जब धर्म का ह्रास होता है और अधर्म का विकास होता है, तब-तब मैं अपने आपको पैदा करता हूँ (शरीर धारण करके अवतार ग्रहण करता हूँ।)


गीता का उचित स्थान-
यहां गीता के सम्बन्ध में केवल इतना कह देना पर्याप्त है कि वह स्वतन्त्र ग्रन्थ न होकर महाभारत का एक अंश मात्र है, इसलिए उसकी प्रामाणिकता भी उतनी ही है जितनी महाभारत की। इसी से यह बात भी स्पष्ट हो जानी चाहिए कि गीता के सम्बन्ध में जो यह प्रवाद प्रचलित उसमें श्रीकृष्ण के मुख से निकले हुए वचन हैं ("या स्वयं पद्मानाभस्य मुखपद्माद् विनिस्सृता")- उसमें कोई तथ्य नहीं है। जिस तरह शेष महाभारत, जिसका असली नाम 'जय' है और जिसमें मूलतः केवल बीस हजार श्लोक थे, महर्षि व्यास की कृति है वैसे ही गीता भी महर्षि व्यास की ही रचना है। पूछा जा सकता है कि फिर गीता की इतनी लोकप्रियता का रहस्य क्या है? इसका उत्तर हम यह देंगे कि जिस प्रकार महात्मा गांधी के सर्व-धर्म-समन्वयवाद ने सभी धर्मावलम्बियों को अविरोध भाव से एकत्र होने की प्रेरणा दी और इसीलिए लोकसंग्रह की दृष्टि से महात्मा गांधी सबसे अधिक सफल और लोकप्रिय नेता कहे जा सकते हैं, वैसे ही गीता में सभी दार्शनिक सम्प्रदायों का ऐसा अद्भुत समन्वय है कि सभी को उनमें अपने पक्ष का पोषण मिल जाता है। इसीलिए गीता अपने चारों और इतना लोकसंग्रह कर सकी। दार्शनिक विवेचना करनेवालों को गीता में परस्पर-विरोधी बातें भी मिल जाएंगी, पर एक ही साथ 'रामाय स्वस्ति' और 'रावणाय स्वस्ति' कहनेवाले के पीछे जैसे राम और रावण दोनों के अनुयायी चलने को तैयार हो जाएंगे, बहुत कुछ वही हाल गीता का भी है।


श्लोक का अर्थ-
यदि समाजशास्त्र की दृष्टि से गीता के उक्त श्लोक की व्याख्या की जाए तो उसमें एक ऐसे ऐतिहासिक सत्य का उद्घाटन है जिससे इन्कार नहीं किया जा सकता। जब-जब धर्म की ग्लानि और अधर्म का अभ्युत्थान का अर्थ यह समझा जा सकता है कि जब-जब किसी जाति का सामाजिक और राजनीतिक दृष्टि से अध:पतन हो जाता है तब-तब उसमें ऐसे महापुरुष पैदा होते हैं जो उस जाति को पतन के गर्त से निकालकर उन्नति के शिखर पर ले जाने का प्रयत्न करते हैं। इतिहास की शिक्षा यही है कि कोई भी महापुरुष जन्म से महापुरुष नहीं होता, किन्तु अपने समय की परिस्थितियां ही उसे महापुरुष बनाती हैं। पराधीन भारत में दयानन्द, श्रद्धानन्द, तिलक, रवीन्द्र, सुभाष प्रभृति जैसे नररत्न पैदा हुए, क्या वैसे नररत्नों की कल्पना स्वाधीन भारत में की जा सकती है। जितनी तीव्र क्रिया होगी, उतनी ही तीव्र प्रतिक्रिया होगी- यह विज्ञान का सिद्धान्त है। भारत का जितना तीव्र अध:पतन हुआ था उसी का यह परिणाम था कि उसने अनेक ऐसी विभूतियों को जन्म दिया जो केवल भारत-वन्द्य नहीं प्रत्युत विश्ववन्द्य है। दुःख को इसीलिए रसायन कहा जाता है।
यदि मनोविज्ञानपरक अर्थ इस श्लोक का किया जाए तो उसे यों समझा जा सकता है कि अपने चारों ओर धर्म को घटता और अधर्म को बढ़ता देखकर किसी दृढ़ संकल्प धर्मात्मा व्यक्ति के मन में यह भाव या सकता है कि मैं अधर्म का नाश करके धर्म का राज्य स्थापित करूँगा। यह भी एक शाश्वत सामाजिक प्रवृत्ति है जो सभी धार्मिक महापुरुषों के जीवन में स्पष्ट दृष्टिगोचर होती है। इस प्रवृत्ति को हृदयंगम किये बिना विभिन्न देशों में पैदा हुए विभिन्न महापुरुषों के जीवन की व्याख्या की ही नहीं जा सकती। यही वैज्ञानिक दृष्टिकोण भी है। इसीलिए इस श्लोक से अवतारवाद सिद्ध करनेवालों को उत्तर देते हुए ऋषि ने लिखा है कि 'वेद-विरुद्ध होने से अवतार लेने की बात प्रमाण नहीं मानी जा सकती। किन्तु ऐसा हो सकता है कि श्रीकृष्ण धर्म की रक्षा करना चाहते थे कि मैं युग-युग में जन्म लेकर श्रेष्ठों की रक्षा और दुष्टों का नाश करूँ तो इसमें कुछ दोष नहीं।' "न त्वहं कामये राज्यं न स्वर्गं नापुनर्भवम् कामये। दुःखतप्तानां प्राणीनामार्तिनाशनम्।" मैं राज्य नहीं चाहता, स्वर्ग नहीं चाहता, मोक्ष भी नहीं, किन्तु दुःख से सन्तप्त नर-नारियों का दुःख-नाश करने के लिए इस लोक में जन्म ग्रहण करना चाहता हूं। यही तो महापुरुष की असली मनोभावना है और यह कितनी प्रबल होती है इसकी कल्पना इसी से की जा सकती है कि दुःखीजनों के दुःख-नाश के लिए वह राज्य, स्वर्ग, मोक्ष सभी को तिलाञ्जलि देने को तैयार है। मोक्ष न चाहने से ही यह अर्थ स्वयं निकल आता है कि मैं इस लोक में जन्म ग्रहण करना चाहता हूं।


जैसे वेद को समझने के लिए वेद स्वयं सहायक है, वैसे ही गीता ने भी बहुत बार अपनी गुत्थियां अपने आप खोल दी हैं। उक्त श्लोक में यही तो कहा है न- "तदात्मानं सृजाम्यहम्"- यहां 'आत्मानं' शब्द का क्या अभिप्राय है, यह गीता से ही पूछना चाहिए। जिस व्यक्ति ने गीता में 'तदात्मानं सृजाम्यहम्' लिखा, उसी ने लिखा है- 'योगी त्वात्मैव मे मतम्' अर्थात् योगी को तो मैं अपना आत्मा ही मानता हूं। अब 'तदात्मानं सृजाम्यहम्' में 'आत्मानं' शब्द के स्थान पर 'योगिनाम्' शब्द रखकर देखिए। 'तदा योगिनं सृजाम्यहम्' का अर्थ होगा- मैं योगी को पैदा करता हूँ। (वहां 'सृजामि' शब्द को लुप्तणिजन्त प्रयोग मानना होगा, अर्थात् 'सर्जयामि' के स्थान पर 'सृजामि' शब्द का प्रयोग हुआ है।) यदि 'सृजामि' को 'सर्जयामि' मानने में बाधा हो और उक्त श्लोक को श्रीकृष्ण के ही मुख का वचन मानना हो तो अर्थ यह हो जाएगा कि 'योगी के रूप में मैं जन्म लेता हूँ।'
अब जरा पूरे श्लोक का अर्थ देखिए 'जब-जब धर्म की ग्लानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब मैं किसी योगी (महापुरुष) को पैदा करता हूँ।'- यह अर्थ समाज-शास्त्र के दृष्टिकोण से सर्वथा सुसंगत है या दूसरा अर्थ यह होगा; जब-जब धर्म की ग्लानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब कोई योगी (मैं) पैदा होता है (हूँ)।' यह अर्थ मनोविज्ञान की दृष्टि से सुसंगत है। इससे अधिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण और क्या हो सकता है?


तर्क से अवतारवाद का खण्डन-
इस प्रकार किसी प्रमाण से अवतारवाद के सिद्ध होने की सम्भावना नहीं। रही तर्क की बात, क्या तर्क से अवतार सिद्ध किया जा सकता है? यह और भी कठिन है। जब एक बार ईश्वर को सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान, सर्वान्तर्यामी और निराकार मान लिया, तब तर्क से ईश्वर का अवतार कैसे सिद्ध किया जा सकता है? जो निराकार और सर्वव्यापी है वह आकर ग्रहण करने के लिए मां के पेट में एक स्थानबद्ध कैसे रहेगा। फिर जो जन्म लेगा वह मरेगा भी अवश्य। जो जन्म और मरण दोनों के चक्कर में पड़ा वह सामान्य मनुष्य ही होगा, ईश्वर नहीं। कहा जाता है कि राक्षसराज रावण और पापी कंस को मारने के लिए राम और कृष्ण के रूप में ईश्वर को अवतार लेना पड़ा। कैसी बचकानी-सी बात है। सोचिए किसी चीज को बनाना अधिक आसान होता है या बिगाड़ना। जिस इमारत को सैकड़ों मजदूर मिलकर महीनों तक परिश्रम करके बनाते हैं और उसी को चन्द मजदूर चन्द दिनों में गिराकर रख देंगे। मानना ही होगा कि बिगाड़ने की अपेक्षा बनाना कहीं अधिक कठिन कार्य है। सो रावण और कंस जैसे व्यक्तियों को, फिर वह कितने ही शक्तिशाली क्यों न हो, पैदा करने के लिए यदि अवतार लेने की आवश्यकता नहीं पड़ी तो उन्हें मारने के लिए अवतार लेने की आवश्यकता क्यों पड़ती? जो ईश्वर सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय जैसे महान् कार्यों को करता है उसको किसी एक व्यक्ति का नाश करने के लिए भी अवतार लेना पड़े, इससे तो ईश्वर का नहीं किन्तु रावण और कंस का ही गौरव बढ़ता है। तब तो सर्वशक्तिमान् ईश्वर नहीं, रावण ही हुआ।


[स्त्रोत- परोपकारी : महर्षि दयानन्द सरस्वती की उत्तराधिकारिणी परोपकारिणी सभा का मुख पत्र का मार्च २०२० का अंक; प्रस्तुति- प्रियांशु सेठ]


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