दमा (श्वास रोग)

दमा (श्वास रोग)


ASTHMA                                                                                         


परिचय :
         सांस लेने में दिक्कत कठिनाई महसूस होने को श्वास रोग कहते हैं। इस रोग की अवस्था में रोगी को सांस बाहर छोड़ते समय जोर लगाना पड़ता है। इस रोग में कभी-कभी श्वांस क्रिया चलते-चलते अचानक रुक जाती है जिसे श्वासावरोध या दम घुटना कहते हैं। श्वांस रोग और दमा रोग दोनों अलग-अलग होते हैं। फेफड़ों की नलियों की छोटी-छोटी तंतुओं (पेशियों) में जब अकड़नयुक्त संकोचन उत्पन्न होता है तो फेफड़ा सांस द्वारा लिए गए वायु(श्वास) को पूरी अन्दर पचा नहीं पाता है जिससे रोगी को पूरा श्वास खींचे बिना ही श्वास छोड़ने को मजबूर हो जाता है। इसी स्थिति को दमा या श्वास रोग कहते हैं।
         यह श्वसन संस्थान का एक भयंकर रोग है। इस रोग में सांस नली में सूजन या उसमें कफ जमा हो जाने के कारण सांस लेने में बहुत अधिक कठिनाई होती है। दमा का दौरा अधिकतर सुबह के समय ही पड़ता है। यह अत्यंत कष्टकारी है जो आसानी से ठीक नहीं होता है।
         आज के समय में दमा (अस्थमा) तेजी से स्त्री-पुरुष व बच्चों को अपना शिकार बना रहा है। यह रोग धुंआ, धूल, दूषित गैस आदि जब लोगों के शरीर में पहुंचती है तो यह शरीर के फेफड़ों को सबसे अधिक हानि पहुंचाती है। प्रदूषित वातावरण में अधिक रहने से श्वास रोग (अस्थमा) की उत्पत्ति होती है।
आयुर्वेद के अनुसार यह पांच प्रकार का होता है :
1. क्षुद्र श्वांस।
2. तमक श्वास।
3. श्वास।
4. ऊध्र्वश्वास
5. छिन्न श्वास
विभिन्न भाषाओं में नाम :
हिन्दी दमा।
अंग्रेजी डिसनिया, बोंयिल अस्थमा।
बंगाली श्वस।
गुजराती दम।
कन्नड़ गुरलू दम्मु।
मलयालम वलिवु।
मराठी दमा।
उड़िया श्वास, ढकी सिआसी।
तमिल इझाईप्पु।
तेलगू उब्बसमु।
अरबी श्वास


कारण :
• श्वास रोग एक एलर्जिक तथा जटिल बीमारी है जो ज्यादातर श्वांस नलिका में धूल के कण जम जाने के कारण या श्वास नली में ठंड़ लग जाने के कारण होती है। 
• दमा रोग जलन पैदा करने वाले पदार्थों का सेवन करने, देर से हजम होने वाले पदार्थों का सेवन करने, रसवाहिनी शिराओं को रोकने वाले तथादस्त रोकने वाले पदार्थों के सेवन करने के कारण होता है। यह रोग ठंड़े पदार्थों अथवा ठंड़ा पानी अधिक सेवन करने, अधिक हवा लगने, अधिक परिश्रम करने, भारी बोझ उठाने, मूत्र का वेग रोकने, अधिक उपश्वास तथा धूल, धुंआ आदि के मुंह में जाने के कारणों से श्वास रोग उत्पन्न होता है।
• अधिक दिनों से दूषित व बासी ठंड़े खाद्य पदार्थों का सेवन करने और प्रदूषित वातावरण में रहने से दमा (अस्थमा) रोग होता है। कुछ बच्चों में दमा रोग वंशानुगत भी होता है। माता-पिता में किसी एक को दमा (अस्थमा) होने पर उनकी संतान को भी (अस्थमा) रोग हो सकता है।
• वर्षा ऋतु में दमा रोग अधिक होता है क्योंकि इस मौसम में वातावरण में अधिक नमी (आर्द्रता) होती है। ऐसे वातावरण में दमा (अस्थमा) के रोगी को श्वास लेने में अधिक कठिनाई होती है और रोगी को दमा के दौरे पड़ने की संभावना रहती है। दमा के दौरे पड़ने पर रोगी को घुटन होने लगती है और कभी-कभी दौरे के कारण बेहोश भी होकर गिर पड़ता है।
दमा रोग के लक्षण :
क्षुद्रश्वांस : रूखे पदार्थों का सेवन करने तथा अधिक परिश्रम करने के कारण जब कुछ वायु ऊपर की और उठती है तो क्षुद्रश्वांस उत्पन्न होती है। क्षुद्रश्वांस में वायु कुपित होती है परन्तु अधिक कष्ट नहीं होता है। यह रोग कभी-कभी स्वत: ही ठीक हो जाता है।


तमस श्वांस (पीनस) : इस दमा रोग में वायु गले को जकड़ लेती है और गले में जमा कफ ऊपर की ओर उठकर श्वांस नली में विपरीत दिशा में चढ़ता है जिसे तमस (पीनस) रोग उत्पन्न होता है। पीनस होने पर गले में घड़घड़ाहट की आवाज के साथ सांस लेने व छोड़ने पर अधिक पीड़ा होती है। इस रोग मेंभय, भ्रम, खांसी, कष्ट के साथ कफ का निकलना, बोलने में कष्ट होना, अनिद्रा (नींद न आना) आदि लक्षण उत्पन्न होते हैं। सिर दर्द, मुख का सूख जानाऔर चेतना का कम होना इस रोग के लक्षण हैं। यह रोग वर्षा में भीगने या ठंड़ लगने से भी हो जाता है। पीनस रोग में लेटने पर कष्ट तथा बैठने में आराम का अनुभव होता है।


ऊध्र्वश्वास (सांस को जोर से ऊपर की ओर खिंचना) :
ऊपर की ओर जोर से सांस खींचना, नीचे को लौटते समय कठिनाई का होना, सांसनली में कफ का भर जाना, ऊपर की ओर दृष्टि का रहना, घबराहटमहसूस करना, हमेशा इधर-उधर देखते रहना तथा नीचे की ओर सांस रुकने के साथ बेहोशी उत्पन्न होना आदि लक्षण होते हैं। 
महाश्वांस : सांस ऊपर की ओर अटका महसूस होना, खांसने में अधिक कष्ट होना, उच्च श्वांस, स्मरणशक्ति का कम होना, मुंह व आंखों का खुला रहना,मल-मूत्र की रुकावट, बोलने में कठिनाई तथा सांस लेने व छोड़ते समय गले से घड़घड़ाहट की आवाज आना आदि इस रोग के लक्षण हैं। जोर-जोर से सांस लेना, आंखों का फट सा जाना और जीभ का तुतलाना-ये महाश्वास के लक्षण हैं।
छिन्न श्वांस :
• इस रोग में रोगी ठीक प्रकार से श्वांस नहीं ले पाता, सांस रुक-रुककर चलती है, पेट फूला रहता है, पेडू में जलन होती है, पसीना अधिक मात्रा मेंआता, आंखों में पानी रहता है तथा घूमना व श्वांस लेने में कष्ट होता है। इस रोग में मुंह व आंखे लाल हो जाती हैं, चेहरा सूख जाता है, मनउत्तेजित रहता है और बोलने में परेशानी होती है। रोगी की मूत्राशय में बहुत जलन होती है और रोगी हांफता हुआ बड़बड़ाता रहता है।
भोजन तथा परहेज :
• दमा से पीड़ित रोगी को एक बार में भरपेट भोजन नहीं करना चाहिए।
• दमा से पीड़ित रोगी को प्रतिदिन सुबह-शाम बकरी का दूध पीना चाहिए।
• रोगी को खुली धूप में कभी नहीं बैठना चाहिए।
• रोगी के लिए धूप के पास वाले छायादार स्थान में बैठना लाभकारी होता है।
• रोगी को मन शान्त रखना चाहिए और किसी भी प्रकार की चिन्ता, तनाव, क्रोध और उत्तेजना से बचना चाहिए।
• रोगी की छाती पर प्रतिदिन सुबह सूर्य की किरण डालनी चाहिए।
• रोगी को ठंड़ी या गर्म चीजों का सेवन नहीं करना चाहिए। रोगी को हल्का तथा पाचक भोजन लेना चाहिए।
• गले तथा छाती को ठंड़ से बचाना चाहिए। पेट में कब्ज हो जाए तो उसे दूर करने के लिए फलों का रस गर्म करके सेवन करना चाहिए। दस्त लाने वाले चूर्ण का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए क्योंकि दमा के रोगी की सहनशक्ति बहुत कम होती है। 
• भोजन में गेहूं की रोटी, तोरई, करेला, परवल, मेथी, बथुआ आदि चीजे लेनी चाहिए।
• पुराने सांठी चावल, लाल शालि चावल, जौ, गेहूं, पुराना घी, शहद, बैंगन, मूली, लहसुन, बथुआ, चौलाई, दाख, छुहारे, छोटी इलायची, गोमूत्र, मूंग वमसूर की दाल, नींबू, करेला, बकरी का दूध, अनार, आंवला तथा मिश्री आदि का सेवन करना दमा रोग में लाभकारी होता है।
• इस रोग में ठंडी चीजे, दूध, दही, केला, संतरा, सेब, नाशपाती, खट्टी चीजे आदि नहीं खानी चाहिए। शराब तथा बीड़ी-सिगरेट पीना भी हानिकारक होता है।
• दमा के रोगी को रूखा, भारी तथा शीतल पदार्थों का सेवन नहीं करना चाहिए। सरसों, भेड़ का घी, मछली, दही, खटाई, रात को जागना, लालमिर्च, अधिक परिश्रम, शोक, क्रोध, गरिष्ठ भोजन और दही आदि का सेवन नहीं करना चाहिए।
विभिन्न औषधियों से उपचार-
1. सुहागा :
• भुना हुआ सुहागा लगभग 75 ग्राम और शहद 100 ग्राम को मिलाकर रख लें और रात को सोते समय यह 1 चम्मच की मात्रा में चाटें। इससे श्वास रोग (दमा) में बहुत लाभ मिलता है।
• सुहागा का फूला और मुलहठी को अलग-अलग कूट-पीसकर बारीक चूर्ण बना लें और फिर इन दोनों औषधियों को बराबर मात्रा में मिलाकर किसी शीशी में सुरक्षित रख लें। यह चूर्ण आधा से 1 ग्राम की मात्रा में दिन में 2-3 बार शहद के साथ चाटने से या गर्म जल के साथ सेवन करने से दमा रोग ठीक होता है। इससे खांसी व जुकाम भी नष्ट होता है। बच्चों के दमा रोग में यह चूर्ण लगभग 1 ग्राम का चौथाई भाग की मात्रा में देना चाहिए। इस औषधि का सेवन करते समय दही, केला चावल तथा ठंड़े पदार्थों का सेवन नहीं करना चाहिए। 
2. गुलबनफसा अर्क या शुंठी का रस : गुलबनफसा अर्क या शुंठी का रस एक तिहाई कप पानी मिलाकर सुबह-शाम पीने से दमा रोग ठीक होता है।
3. अडूसा क्षार (अर्कक्षार, वासा) :
• अडूसा का रस लगभग आधा ग्राम और आधा ग्राम शहद के साथ सुबह-शाम भोजन के बाद सेवन करने से दमा रोग शान्त होता है।
• अडूसा के सूखे पत्ते व काले धतूरे के सूखे पत्ते को मिलाकर चूर्ण बना लें और इसका धूम्रपान करें। इससे जीर्णश्वांस (पुराना दमा रोग) को दूर होता है।
• अडूसा के सूखे पत्तों का चूर्ण चिलम में भरकर धूम्रपान करने से दमा रोग में बहुत आराम मिलता है।
• अडूसा लगभग आधा ग्राम, अडू़सा का रस 10 बूंद और लौंग का चूर्ण लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग की मात्रा में लेकर मिला लें और यह प्रतिदिन सुबह-शाम सेवन करें। इससे दमा का दौरा शान्त होता है।
• दमा से पीड़ित रोगी को अडू़सा, अंगूर व हर्रा को मिलाकर काढ़ा बना लें और इसमें शहद व चीनी मिलाकर सेवन करें। इसका प्रतिदिन सुबह-शाम सेवन करने से कफ निकलकर दमा शान्त होता है।
• वासा के रस में शहद मिलाकर पीने से अधिक खांसी युक्त श्वास में लाभ होता है। यह क्षय, पीलिया, बुखार और रक्तपित्त में लाभकारी होता है।
• अड़ू़सा (वासा) और अदरक का रस 5-5 मिलीलीटर की मात्रा में लेकर दिन में 3-3 घंटे के अन्तर पर सेवन करने से 40 दिनों में दमा ठीक हो जाता है।
4. अपामार्ग (चिरचिटा)  :
• लगभग आधा मिलीलीटर अपामार्ग का रस शहद में मिलाकर 4 चम्मच पानी के साथ भोजन के बाद सेवन करने से गले व फेफड़ों में जमा कफ निकल जाता है और दमा ठीक होता है।
• चिरचिटा की जड़ को सुखाकर चूर्ण बना लें। यह चूर्ण लगभग आधा ग्राम की मात्रा में शहद के साथ खाने से श्वांस रोग दूर होता है। (ध्यान रखें कि चिरचिटा की जड़ को निकालते समय इसकी जड़ में लोहा न छूने पाए)।
• अपामार्ग 1 किलो, बेरी की छाल 1 किलो, अरूस के पत्ते 1 किलो, गुड़ 2 किलो, जवाखार 50 ग्राम, सज्जीखार लगभग 50 ग्राम और नौसादर लगभग 125 ग्राम। इन सभी को पीसकर 1 लीटर पानी में पकाएं। जब यह पकते-पकते 5 किलो बच जाए तो इसे उतारकर डिब्बे में भरकर मुख बन्द करके 15 दिनों के लिए रख दें। 15 दिनों बाद इसे छानकर 7 से 10 ग्राम की मात्रा में प्रतिदिन सुबह-शाम सेवन करने से श्वास और दमा रोग नष्ट हो जाता है।
• अपामार्ग के बीजों को जलाकर धूम्रपान की तरह चिलम में भरकर पीने से श्वांस रोग में आराम मिलता है।
• अपामार्ग का रस लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग पान में रखकर खाने अथवा 1 ग्राम शहद में मिलाकर चाटने से छाती पर जमा कफ निकलकर श्वांस रोग नष्ट होता है।
5. अदरक :
• लगभग 1 ग्राम अदरक के रस को 1 चम्मच पानी के साथ सुबह-शाम लेने से दमा व श्वांस रोग ठीक होता है।
• अदरक के रस में शहद मिलाकर खाने से सभी प्रकार के श्वांस रोग, खांसी, जुकाम तथा अरुचि आदि ठीक होते हैं।
• अदरक के रस में कस्तूरी मिलाकर सेवन करने से श्वांस रोग ठीक होता है।
• पिप्पली तथा सैंधानमक को पीसकर चूर्ण बना लें और इसमें अदरक का रस मिलाकर रात को सोते समय सेवन करें। इससे दमा, खांसी व कफ नष्ट होता है।
• लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग जस्ता के भस्म में 6 ग्राम अदरक का रस व 6 ग्राम शहद मिलाकर रोगी को देने से दमा व खांसी दूर होती है।
• अदरक का रस शहद के साथ सेवन करने से बुढ़ापे में उत्पन्न दमा ठीक होता है।
• अदरक की चासनी में तेजपात व पीपल का चूर्ण मिलाकर चाटने से श्वांसनली में जमा कफ निकल जाता है और दमा के दौरे शान्त होते हैं।
• छिलका उतारकर अदरक को खूब महीन पीस लें और छुहारे के गूदे को बारीक पीस लें। अब इन दोनों को शहद में मिलाकर किसी साफ बड़े बर्तन में अच्छी तरह से मिला लें। अब इसे मिट्टी के बर्तन में भरकर आटे से बर्तन के मुंह को बन्द कर दें और इसे गड्ढ़े में रखकर मिट्टी से ढक दें। 36 घंटे बाद सावधानी से मिट्टी हटाकार बर्तन को बाहर निकल लें और मुंह के ऊपर से आटे को हटाकर रख लें। यह प्रतिदिन सुबह नाश्ते के समय तथा रात में सोने से पहले 1 चम्मच की मात्रा में सेवन करें और ऊपर से 1 गिलास मीठा गुनगुना दूध पीएं। इससे श्वास व दमा रोग ठीक होता है।
6. जातिफल : लगभग 1 ग्राम की मात्रा में जातिफलादि के चूर्ण को 1 ग्राम पानी के साथ सुबह-शाम लेने से दमा ठीक हो जाता है।
7. सोंठ :
• सोंठ, सेंधानमक, जीरा, भुनी हुई हींग और तुलसी के पत्ते इन सभी को बराबर मात्रा में लेकर कूट-पीसकर चूर्ण बना लें। इनमें से 10 ग्राम चूर्ण 300 मिलीलीटर पानी में उबालकर पीने से अस्थमा रोग ठीक होता है।
• सोंठ, कालानमक, भुनी हुई हींग, अनारदाना एवं अम्लबेंत बराबर मात्रा में लेकर चूर्ण बना लें। इस चूर्ण से दुगना गुड़ लेकर मिला लें और इसकी गोलियां बना लें। यह 1-1 गोली मुंह में रखकर चूसने से गले की खुश्की दूर होती और खांसी व दमा में लाभ मिलता है।
• सोंठ, हरड़ और नागरमोथा बराबर मात्रा में लेकर चूर्ण बना लें और इसे छानकर दुगने गुड़ में मिलाकर गोलियां बना लें। यह 1-1 गोली चूसने से दमा के दौरे व खांसी में आराम मिलता है।
• हरड़ तथा सोंठ को पानी के साथ पीस लें और यह लगभग 6 ग्राम की मात्रा में गर्म दूध के साथ सेवन करें। इससे हिचकी दूर होती है और दमा में आराम मिलता है।
• लगभग 25 ग्राम सोंठ को 400 मिलीलीटर पानी में उबालें और जब पानी 100 मिलीलीटर बच जाए तो इसे छानकर ठंड़ा करके 6 ग्राम शहद मिलाकर पीएं। इसका कुछ दिनों तक सेवन करने से सर्दी, जुकाम, खांसी और दमा रोग ठीक होता है।
8. दूध : अस्थमा के रोगी को प्रतिदिन दूध का सेवन करना चाहिए। दूध से कफ का बनना रुकता है। रोगी को प्रतिदिन दूध में 2 पीपल डालकर गर्म करें और फिर दूध को छानकर मिश्री मिलाकर सेवन करें। इससे दमा रोग समाप्त होता है।
9. सैंधवादि तेल : दमा रोग से पीड़ित रोगी की छाती पर प्रतिदिन सैंधवादि तेल की मालिश करने से छाती में जमा कफ ढीला होकर निकल जाता है और दमा ठीक होता है।
10. तेजपात :
• तेजपात और पीपल 2-2 ग्राम की मात्रा में अदरक के मुरब्बे की चाशनी में बुरककर चटाने से दमा और श्वासनली का रोग ठीक होता है।
• सूखे तेजपात के पत्तों का चूर्ण 1 चम्मच की मात्रा में 1 कप गर्म दूध के साथ सुबह-शाम प्रतिदिन पीने से श्वांस व दमा रोग शान्त होता है।
11. ग्वारपाठा :
• ग्वारपाठा के पत्ते 250 ग्राम और सेंधानमक 25 ग्राम को मिलाकर चूर्ण बना लें और इसे एक मिट्टी के बर्तन में रखकर भस्म बना लें। यह भस्म 2 ग्राम की मात्रा में 10 ग्राम मुनक्का के साथ खाने से दमा रोग समाप्त होता है।
• ग्वारपाठा का एक किलो गूदा लेकर छान लें और इसे किसी कलईदार बर्तन में रखकर धीमी आंच पर पकाएं। जब यह लुबावदार हो जाए तो इसमें 36 ग्राम लाहौरी नमक खूब महीन पीसकर डाल दें और स्टील के चम्मच से खूब हिलाते रहें। जब सब पानी जलकर केवल चूर्ण शेष रह जाए तो इसे उतार लें और ठंड़ा होने पर इसे खूब बारीक चूर्ण बनाकर साफ बोतलों में रख लें। फिर इसे लगभग आधा ग्राम की मात्रा में शहद के साथ मिलाकर खाने से पुरानी खांसी, काली खांसी और दमा रोग समाप्त होता है।
12. कूठ : कूठ के 5 ग्राम चूर्ण को घी, शहद व निम्ब के साथ मिलाकर काढ़ा बना ले और इसका सेवन प्रतिदिन सुबह-शाम करने से अस्थमा रोग ठीक होता है।
13. नींबू :
• नींबू का रस 10 मिलीलीटर और अदरक का रस 5 मिलीलीटर मिलाकर हल्के गर्म पानी के साथ पीने से अस्थमा का रोग नष्ट होता है।
• एक नींबू का रस, 2 चम्मच शहद व 1 चम्मच अदरक का रस लेकर 1 कप गर्म पानी में डालकर पीएं। इसका सेवन प्रतिदिन सुबह करने से दमा रोग में लाभ मिलता है।
• दमा का दौरा पड़ने पर गर्म पानी में 1 नींबू निचोड़कर पीने से लाभ मिलता है। यह हृदय रोग, ब्लड प्रेशर तथा पाचन संस्थान के लिए लाभकारी होता है।
14. लहसुन :
• 10 ग्राम लहसुन के रस को हल्के गर्म पानी के साथ प्रतिदिन सेवन करने से अस्थमा में सांस लेने में होने वाली परेशानी दूर होती है।
• लगभग 2 बूंद लहसुन का रस और 10 बूंदे कुठार का रस को शुद्ध शहद के साथ दिन में 4 बार दमा के रोगी को सेवन कराएं। इससे दमा व श्वास की बीमारी ठीक होती है।
• लहसुन को आग में भूनकर चूर्ण बना लें और इसमें सोमलता, कूट, बहेड़ा, मुलेहठी व अर्जुन की छाल का चूर्ण बनाकर मिला लें। यह चूर्ण एक चम्मच की मात्रा में शहद के साथ दिन में 3 बार चाटने से दमा और श्वास की बीमारी ठीक होती है।
• लगभग 15-20 बूंद लहसुन के रस को हल्के गर्म पानी के साथ सुबह, दोपहर और शाम को खाने से दमा और श्वास की बीमारी दूर होती है। 
• लहसुन को कुचलकर उसका रस निकालकर गुनगुना करके पीने से श्वास रोग में लाभ मिलता है।
• दमा के रोग से पीड़ित रोगी को प्रतिदिन लहुसन, तुलसी के पत्ते व गुड़ को चटनी बनाकर सेवन करना चाहिए।
• लहसुन की पूती को भूनकर सेंधानमक के साथ चबाकर खाने से खांसी व दमा के दौरे में आराम मिलता है।
• 10 बूंद लहसुन के रस को 1 चम्मच शहद के साथ सेवन करने से लाभ मिलता है।
• लहसुन की 20 कलियां और 20 ग्राम गुड़ को 250 मिलीलीटर पानी में उबालें। जब पानी आधा रह जाए तो इसे छानकर लहसुन की कलियां खाकर पानी को हल्का ठंड़ा करके पीएं। इसका उपयोग प्रतिदिन एक बार करने से श्वास व दमा रोग में आराम मिलता है।
• लहसुन के तेल से छाती व पीठ की मालिश करनी चाहिए।
15. प्याज :
• प्याज का रस, अदरक का रस, तुलसी के पत्तों का रस व शहद 3-3 ग्राम की मात्रा में लेकर सुबह-शाम खाने से अस्थमा रोग नष्ट होता है।
• सफेद प्याज का रस और शहद बराबर मात्रा में मिलाकर चाटने से दमा ठीक होता है।
• प्याज को कूटकर सूंघने से खांसी, गले की खराश, टांसिल, फेफड़ों के रोग आदि में आराम मिलता है।
• प्याज के रस में शहद मिलाकर चाटने से भी लाभ मिलता है।
• प्याज का काढ़ा 40-60 मिलीलीटर प्रतिदिन सुबह-शाम सेवन करने से दमा रोग में लाभ मिलता है।
• सफेद प्याज के रस में थोड़ा सा शहद मिलाकर चाटने से श्वास रोग दूर होता है।
16. हल्दी :
• हल्दी को पीसकर चूर्ण बना लें और इस चूर्ण को भूनकर शीशी में बन्द करके रखें। यह चूर्ण 5 ग्राम की मात्रा में हल्के गर्म पानी के साथ प्रतिदिन सेवन करने से अस्थमा रोग से पीड़ित रोगी को  बहुत लाभ मिलता है।
• हल्दी, कालीमिर्च, मुनक्का, रास्ना, छोटी पीपल, कचूर और पुराना गुड़ इन सभी को एक साथ पीसकर सरसों के तेल में मिला लें और यह एक ग्राम की मात्रा का सेवन करने से तेज श्वास रोग व दमा ठीक होता है।
• हल्दी को पीसकर तवे पर भूनकर शहद के साथ चाटने से श्वास रोग में आराम मिलता है।
• हल्दी किशमिश, कालीमिर्च पीपल, रास्ना और कचूर 10-10 ग्राम की मात्रा में लेकर बारीक पीस लें और इसमें थोड़ा सा गुड़ मिलाकर छोटी-छोटी गोलियां बना लें। यह 2-2 गोली प्रतिदिन सुबह-शाम सेवन करने से दमा की शिकायते खत्म होती हैं।
• हल्दी की 2 गांठे, अड़ूसा (वासा) के 1 किलो सूखे पत्ते, 10 ग्राम कालीमिर्च, 50 ग्राम सेंधानमक और 5 ग्राम बबूल के गोंद को मिलाकर पीस लें और इसकी छोटी-छोटी गोलियां बनाकर रख लें। यह 5-6 गोलियां प्रतिदिन चूसते रहने से खुश्की दूर होती है, कफ निकल जाता है और दमा ठीक होता है।
• हल्दी को रेत में सेंककर पीस लें और 1 चम्मच की मात्रा में दिन में 2 बार गर्म पानी के साथ सेवन करें। इससे दमा नष्ट होता है।
17. सरसों का तेल :
• यदि अधिक खांसने पर भी कफ न निकलता हो तो छाती पर सरसों के 20 मिलीलीटर तेल में 5 ग्राम सेंधानमक मिलाकर मालिश करें। इससे छाती में जमा कफ ढीला होकर निकल जाता है और दमा में आराम मिलता है। दमा के दौरे पड़ने पर भी इसका उपयोग लाभकारी होता है।
• पुराना गुड़ और सरसों का तेल 10-10 ग्राम की मात्रा में मिलाकर प्रतिदिन 1 ग्राम की मात्रा में सेवन करने से 3 सप्ताह में ही सभी प्रकार के श्वांस रोग जड़ सहित नष्ट होते हैं।
• बच्चे को खांसी आती हो तो उसके छाती पर सरसों के तेल की मालिश करें। इससे खांसी ठीक होती है और कफ की गांठ निकल जाती है।
• श्वास रोग तथा खांसी में इसकी जड़ का चूर्ण आधे से एक ग्राम गर्म पानी या दूध के साथ सुबह-शाम पीने से कफ (बलगम) बाहर निकल जाता है।
18. कॉफी :
• अस्थमा से पीड़ित रोगी को यदि सांस में रुकावट महसूस हो तो उसे कॉफी पीना चाहिए।
• दमा का दौरा पड़ने पर गर्म-गर्म कॉफी बिना दूध व चीनी के पीने से आराम मिलता है।
19. चौलाई : चौलाई की सब्जी बनाकर अस्थमा के रोगी को खिलाने से अस्थमा में बहुत लाभ मिलता है। चौलाई के पत्तों का 5 ग्राम रस को शहद के साथ मिलाकर चटाने से श्वास की पीड़ा नष्ट होती है।
20. अंजीर :
• अंजीर के 4 दाने को रात को सोते समय पानी में डालकर रख दें और सुबह अंजीर को उसी पानी में थोड़ा सा मसलकर पानी पी लें। इसका प्रतिदिन सेवन करने से अस्थमा में बहुत लाभ मिलता है और कब्ज भी नष्ट होती है।
• यदि कफ अधिक मात्रा में आता हो तो खाली पेट अंजीर प्रतिदिन खाना चाहिए।
• 2 से 4 सूखे अंजीर को दूध में गर्म करके खाने से कफ की मात्रा घटती है और दमा (अस्थमा) रोग ठीक होता है।
• अंजीर, बेल, अंगूर, आंवला, लहसुन, संतरा या पुदीना, अदरक, नारियल, पालक, सुहजना व शहद आदि को मिलाकर दमा के रोग में पी सकते हैं।
21. खजूर :
• 2 खजूर की गुठली निकालकर उसके गूदे में 3 ग्राम सौंफ का चूर्ण मिलाकर पान के साथ सेवन करने से अस्थमा के कारण होने वाली सांस की रुकावट दूर होती है।
• खजूर और सोंठ का चूर्ण बराबर मात्रा में लेकर पान में रखकर खाने से दमा रोग ठीक होता है।
• दमा रोग से पीड़ित रोगी को प्रतिदिन खजूर का सेवन करना चाहिए।
• 4 खजूर, 2 इलायची और 2 चम्मच शहद को मिलाकर खरल में घोटकर सेवन करने से दमा नष्ट होता है।
22. कत्था (खादिर, खैर) :
• कत्था, हल्दी और मिश्री 2-2 ग्राम की मात्रा में लेकर शहद के साथ सुबह-शाम सेवन करने से अस्थमा में बहुत लाभ मिलता है।
• कत्था, हल्दी और शहद बराबर मात्रा में मिलाकर 1-1 चम्मच की मात्रा में दिन में 2 से 4 बार सेवन करने से दमा व सांस की रुकावट दूर होती है।
• खैरसार की लकड़ी का चूर्ण डेढ़ ग्राम की मात्रा में दमा से पीड़ित रोगी को सेवन करना चाहिए। इससे दमा व खासीं में आराम मिलता है।
23. अकरकरा :
• लगभग 20 ग्राम अकरकरा को 200 मिलीलीटर पानी में उबालें और जब पानी केवल 50 मिलीलीटर की मात्रा में शेष रह जाए तो इसमें शहद मिलाकर उतार लें। यह काढ़ा अस्थमा के रोगी को सेवन कराने से अस्थमा रोग ठीक होता है।
• अकरकरा की जड़ का काढ़ा बना लें और इसमें शहद मिलाकर सेवन करें। इससे कफ निकल जाता है और दमा में आराम मिलता है।
24. अंकोल :
• अंकोल की जड़ को नींबू के रस में घिसकर आधा चम्मच की मात्रा में प्रतिदिन सुबह-शाम भोजन करने से 2 घंटे पहले खाने से दमा में अत्यंत लाभ मिलता है। इससे गले की घड़घड़ाहट भी दूर होती है और गले का दर्द भी ठीक होता है।
• अंकोल की छाल, राई व लहसुन 6-6 ग्राम लेकर बारीक चूर्ण बना लें और इसमें 15 ग्राम 3 वर्ष पुराना गुड़ मिलाकर गोलियां बना लें। यह 1-1 गोली प्रतिदिन सेवन करने से गले की खुश्की दूर होती है और दमा के दौरे में आराम मिलता है।
25. अनार :
• अनार के दानों को पीसकर चूर्ण बना लें और 3 ग्राम चूर्ण को शहद के साथ मिलाकर दिन में 2 बार खाएं। यह अस्थमा रोग के लिए अत्यंत गुणकारी औषधि है।
• अनार के फूल 10 ग्राम, कत्था 10 ग्राम, कपूर 2 ग्राम और लौंग 4 पीसकर पान के रस में घोटकर चने के आकार की गोलियां बनाकर रखें। यह 2-2 गोली प्रतिदिन सुबह-शाम सेवन करने से दमा में लाभ होता है।
26. अग्निमथ : 25 ग्राम की मात्रा में अग्निमथ लेकर 200 मिलीलीटर पानी में उबालकर काढ़ा बनाएं और जब केवल 50 मिलीलीटर काढ़ा बच जाए तो इसमें थोड़ा सा यवक्षार और सेंधानमक मिलाकर सेवन करें। इससे खांसी और दमा की पीड़ा नष्ट होती है।
27. पुष्करमूल :
• पुष्कर की जड़ को पीसकर इसमें 2 ग्राम अतीस चूर्ण व शहद मिलाकर चाटें। इसका उपयोग करने से अस्थमा में बहुत लाभ मिलता है।
• पुष्कर चूर्ण को गाय के घी के साथ सेवन करने से श्वांस रोग में आराम मिलता है।
• पुष्कर की जड़, पीपल, हरड़ की छाल, सोंठ, कपूर और कमलगट्टा बराबर-बराबर मात्रा में लेकर चूर्ण बना लें और यह चूर्ण 2 चुटकी की मात्रा में पानी के साथ सेवन करें। यह दमा रोग के लिए बेहद लाभकारी औषधि है।
28. लौंग :
• 2 लौंग को 150 मिलीलीटर पानी में उबालकर पीने से अस्थमा और सांस का रुकना दूर होता है।


Popular posts from this blog

वैदिक धर्म की विशेषताएं 

ब्रह्मचर्य और दिनचर्या

अंधविश्वास : किसी भी जीव की हत्या करना पाप है, किन्तु मक्खी, मच्छर, कीड़े मकोड़े को मारने में कोई पाप नही होता ।