आत्म निरीक्षण कीजिए,

                                                             
संसार में कुछ लोग पढ़े लिखे कहलाते हैं, उनको स्कूल कॉलेज गुरुकुल  आदि की शिक्षा प्राप्त करने का अवसर मिला है। उनके पास बड़ी-बड़ी डिग्रियां भी हैं। और बहुत से लोग ऐसे भी हैं, जिनको अनपढ़ कहा जाता है। क्योंकि वे स्कूल में नहीं जा सके।  उन्हें पढ़ने का अवसर नहीं मिला, या उन्हें पढ़ने के साधन सुविधाएं नहीं मिली। अथवा पढ़ने में उनकी बुद्धि नहीं चली। अर्थात किसी भी कारण से वे पढ़ नहीं पाए।
अब जो लोग पढ़े लिखे कहलाते हैं, उन्होंने तरह तरह की विद्याएँ पढ़ी, पढ़ाई करने में बहुत सा धन भी खर्च किया, बहुत परिश्रम भी किया, उसके बाद भी उनका व्यवहार, उन अनपढ़ लोगों से भी अनेक क्षेत्रों में घटिया स्तर का देखा जाता है। पढ़ने लिखने के कारण, उनकी बुद्धि चतुराई आदि तो बढ़ गई, परंतु आस्तिकता धार्मिकता आदि गुण उन्होंने प्राप्त नहीं किए। जो कि शिक्षा का महत्वपूर्ण अंग है। इसलिए वे तथाकथित "पढ़े लिखे" लोग अपनी बुद्धि और चतुराई से संसार को सुख कम तथा दुख अधिक दे रहे हैं। जबकि वे तथाकथित "अनपढ़" लोग बुद्धि एवं  चतुराई कम होने के कारण, तथा  आस्तिकता आदि गुणों के कारण संसार को सुख अधिक तथा दुख कम दे रहे हैं।
अब आप विचार कीजिए, कि वे पढ़े लिखे लोग अपने जीवन में अधिक सफल हैं अथवा वे तथाकथित अनपढ़ लोग। 
जब पढ़े लिखे लोग संसार को अधिक दुख दे रहे हैं, तो उन्हें कैसे सफल माना जाए? उन्हें कैसे पढ़ा लिखा माना जाए? 
यदि निष्पक्ष भाव से देखें, तो असली अनपढ़ तो यही लोग हैं, जो पढ़े लिखे कहलाते हैं। क्योंकि ये लोग पढ़ने लिखने के बाद भी, जानबूझकर लोगों को दुख अधिक देते हैं, और अच्छे गुणों को धारण करके संसार को सुख नहीं देते। जबकि वे तथाकथित अनपढ़ लोग संसार को सुख अधिक और दुख कम देते हैं। आप भी अपना आत्म निरीक्षण कीजिए, आप इन दोनों में से कौन से वर्ग में हैं? 


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