स्वर्ग कहाँ

स्वर्ग कहाँ


       स्वर्ग और नरक क्या है? यह अवधारणा सभी मनुष्यों, सभी धर्मों में देखने को मिलती है। सभी धर्म अपने-अपने मतानुसार स्वर्गव नरक की परिभाषा करते हैं। बाइविल में ईश्वर के राज को स्वर्ग कहा गया है, जहाँ हीरे माणिक रत्नों की दीवारों से निर्मित भवन, सोने की सड़कें ऐशो-आराम के सभी साधन विद्यमान हैं, स्वर्ग में परमेश्वर का सिंहासन है, जिसे चार फरिश्ते उठाए हैं। इस प्रकार अपने तरीके से वाइविल में स्वर्ग की परिभाषा भिन्न-भिन्न प्रकार से की गई है। इसी प्रकार कुरान में स्वर्ग को वहिश्त कहा है। जहाँ शहद की नदियाँ बहती हैं, सदा युवा रहने वाले लड़के-लड़कियाँ तथा सभी आमोद-प्रमोद के साधन हैं। उनके लिए स्वर्ग किसी स्थान विशेष के ऊपर है। स्वर्ग की स्त्रियों को हर और अप्सरा कहा जाता है । स्वर्गद्वार स्वर्ग के दरवाजे को कहते हैं। कुछ ऐसी ही कल्पना पुराणों में भी की गई है। जहाँ कामधेन गाय और कल्पवृक्ष सभी कामनाओं को पूर्ण करते हैं और सभी प्रकार के सुख उपलब्ध हैं। इस स्थान को वे एक स्वर्गलोक और स्थान विशेष की ओर संकेत करते हैं। इन सभी मतावलम्बियों की धर्मपुस्तकों में स्वर्ग पृथ्वी से दूर कहीं आसमान में स्थान विशेष का नाम है, जहाँ पुण्यात्मा जाकर स्वर्ग भोगती हैं। इसके अतिरिक्त पापकर्म करने वालों को नरक की अग्नि में जलना पड़ता है । नरक में भी कहीं अंधकार पूर्ण निम्न और सुविधा रहित स्थान की कल्पना की गई है और पाप कर्म करने वाले व्यक्ति को नाना प्रकार के कष्ट दिए जाते हैं। वह व्यक्ति वहाँ पर अनेक कष्ट भोगता है। इस प्रकार बौद्ध धर्म के मानने वाले इस शरीर के अन्दर स्वर्ग का वास मानते हैं। परन्तु वेद आदि शास्त्रों में स्वर्ग का वर्णन अन्य प्रकार से किया है जिसके अनुसार स्वर्ग व नरक किसी दूसर आकाश, पाताल या स्थान विशेष का नाम न होकर इसी पृथ्वी पर विराजमान है और इसी जीवन में प्राप्त किया जा सकता है।


     'सुवर्गच्छतीति स्वर्गः अस्वर्गमयतीति स्वर्गः' जो सुख विशेष की प्राप्ति कराये उसे स्वर्ग कहते हैं अथवा जहाँ सुखविशेष के साधन उपलब्ध हों, उसे स्वर्ग कहा जाता है। स्वामी दयानन्द जी ने स्वमन्तव्यामन्तव्य में स्वर्ग का लक्षण बताते हुए कहा है-स्वर्ग नाम विशेष भोग और उसकी सामग्री की प्राप्ति का है तथा नरक इसके विपरीत दुःखविशेष भोग और उसकी सामग्री का प्राप्त होना है। नरक का कारण पाप कर्म होते हैं, पाप स्वयं नरक की अग्नि है। अनृत कथन करने वालों तथा असत्यवादियों ने इस गहरे स्थान को बनाया है। फिर भी यदि कोई नरक को स्थान विशेष पर माने तो यह उसकी अविद्या है। वेदों में कहा है कि पापी अपने पतन का गट्टा स्वयं खोदता है। उस पर धरती आकाश क्रोधक वर्षा करते हैं। वह चुपचाप पतन के गड्ढे में गिरता है। पापी को मारने के लिए पाप महावली है। उसका अपना शरीर तथा संतान तक साथ नहीं देतेवह स्वयं उनका शत्रु बनता है। उस दया करना पाप को बढ़ावा देना है । अत्याचारी एवं पापी ईश्वर के तेज में अचेत सोते हैं।


      जब स्वर्ग इस पृथ्वी पर है तो वह किसी स्थान विशेष तीर्थस्थल या किसी महापुरुष के जन्मस्थान या किसी विशेष लोक अथवा कहीं अन्यत्र स्थित है। इसका अन्वेषण करने पर ज्ञात होगा कि स्थान विशेष में यदि स्वर्ग विद्यमान हो तो उस स्थान पर रहने वाले सभी सुखी देखे जाते। परन्तु व्यवहार में ऐसा नहीं देखा जाता । वस्तुतः स्वर्ग कहाँ है? हमें यह देखना होगा। इसके लिए ऋषियों ने वैदिक धर्म में वर्णित इन चार आश्रमों का विधान किया है। संसार के अन्य किसी भी मत-मतान्तर में जीवन का यह वैज्ञानिक वर्गीकरण नहीं पाया जाता। यह वैदिक विचारधारा की महान् विशेषता है। तो वस्तुत: चार वर्ण और चार आश्रम ही स्वर्ग के सोपान हैं। चार वर्णों की जहाँ तक बात है यह प्राचीन गुरुकुलों में विद्यार्थी की योग्यता अनुसार दी जाने वाली उपाधियाँ या वर्ण हैं । आश्रमों में ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास चार आश्रम हैं । ब्रह्मचर्य आश्रम में ब्रह्मचारी वीर्य का संचय करता है वह शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक और आत्मिक शक्तियों को इकट्ठा करता है। यह मानो उसका संग्रहकाल है। ब्रह्मचारी गृहस्थ आश्रम में प्रवेश करके इन इकट्ठी की गई शक्तियों को घटाता है । वह अपनी इन संग्रहित शक्तियों को गृहस्थ के विभिन्न कामों में खर्च करता है। पच्चीस वर्ष तक निरन्तर अपनी शक्तियों को आजीविका, पत्नी, सन्तान सम्बन्धी जन और गृहस्थ के अन्य कार्यों में खर्च करने के पश्चात् वह गृहस्थ वानप्रस्थ आश्रम में प्रवेश करता है। तब वह अपनी खर्च की हुई शक्तियों को ब्रह्मचर्य, स्वाध्याय, जप एवं तप के द्वारा गुणीभूत करता है। इन शक्तियों को गुणीभूत करते हुए मानो वह एक महान् उद्देश्य की तैयारी करता है। जब तैयारी पूरी होती है तब वह अपने संग्रहित ज्ञान-विज्ञान एवं अनुभव को समाज में बांटने के लिए कृतसंकल्प हो जाता है। यही उसके संन्यास आश्रम की दीक्षा हैआश्रमों में ब्रह्मचर्य, वानप्रस्थ और संन्यास तीनों तप व आत्मानुशासन के आश्रम हैं। ये तीनों गृहस्थ आश्रम पर निर्भर हैं। अब केवल गृहस्थ आश्रम ही अवशिष्ट रह गया है जिसमें स्वर्ग की तलाश करनी होगी। मनुस्मृति कहती है-


यथा नदि नदाः सर्वे सागरे यान्ति संस्थितिम्।


तथैवाश्रमिणः सर्वे गृहस्थे यान्ति संस्थितिम्॥


      अर्थात् जैसे सब बड़ी और छोटी नदियाँ सागर में जाकर स्थिर होते हैं, वैसे ही सब आश्रमों का गृहस्थ ही आधार है। सुखी गृहस्थ का वर्णन करते हुए वेद ने कहा है-जो कुल के विस्तार का यज्ञ करते हैं, समय उनकी ' शक्ति को क्षीण नहीं होने देता। ऐसा व्यक्ति गृहस्थ होकर अपनी आश्रमों के कर्तव्यों को भलीभांति पूर्ण करता हुआ अपनी उड़ान से प्रकाश लोक की सैर करता है। गृहस्थी यज्ञों में यह विस्तृत तथा महान् यज्ञ है। कुल के विस्तार का यज्ञ करके मनुष्य स्वर्ग में प्रविष्ट होता हैइस कुल के विस्तार के यज्ञ को संसार में प्राप्त स्वर्ग पर आधारित करता हूँ। मेरा यह यज्ञ नष्ट न हो। आत्मनिर्भरता की शक्ति से हरा-भरा रहे। यह यज्ञ मेरी सब रूप धारण करने वाली कामधेनु बनी रहे। ऋषियों ने गृहस्थ आश्रम को सबसे बड़ा यज्ञ कहा है, क्योंकि उस पर कुल का आधार है। वैसे तो प्रत्येक यज्ञ के पुरोहित ब्राह्मण होते हैं, परन्तु गृहस्थ का कोई कर्त्तव्य देवों की सहायता तथा पथ-प्रदर्शन के बिना पूरा नहीं होता । यदि गृहस्थ आश्रम में संयम का अर्थ समझा जाये तो कुल बढ़ता है और सभी इच्छाओं की पूर्ति होती है। गृहस्थ में संयम से रहना बहुत बड़ा तप है। जिस तप से शारीरिक, आत्मिक तथा बौद्धिक उन्नति के प्रयास को सफलता मिलती है। गृहस्थी ही अपनी कमाई से दान कर सकता है। क्योंकि दानी लोग ऊँचे प्रकाश के लोकों को प्राप्त होते हैं, वे भाग्यशाली हैं। रोटी देने वालों की आयु दीर्घ होती है। ब्राह्मण आत्मिक ज्ञान का दाता है। क्षत्रिय घोड़े इत्यादि जो वीरता का चिह्न है, अन्य लोग रोटी कपड़ा दे सकते हैं, दान देना सबसे बड़ा सुख का कार्य है। जो स्त्री-पुरुष दान का आरम्भ कर अच्छी प्रकार से इसे निभाते हैं वे मानो अग्नि में डाली हुई आहुति के समान है। 


      विवाह के समय पति-पत्नी यज्ञ करते हैं। यह जैसे गृहस्थ के कर्त्तव्यों की पूर्ति का प्रण होता है। गृहस्थ के कर्त्तव्य पालन के लिए उदारता की आवश्यकता होती है, आपसी प्रेम तथा संगठन की आवश्यकता होती है। इस गृहस्थ आश्रम को ही स्वर्ग कहा गया है, परन्तु वह है यहीं। मनु ने भी कहा है-


सः संधार्यः प्रयत्नेन स्वर्गमक्षयमिच्छता।


सुखं चेहेच्छता नित्यं योऽधार्यो दुर्बलेन्द्रियैः॥


      अर्थात् अक्षय सुख अर्थात् मोक्ष की कामना करने वाले स्त्री-पुरुषों को प्रयत्न पूर्वक गृहस्थ आश्रम को धारण करना चाहिए। परन्तु जो दुर्बल इन्द्रियाँ और निर्बुद्धि हैं उन्हें गृहस्थ आश्रम धारण नहीं करना चाहिए। क्योंकि गृहस्थ आश्रम सुख का मूल है। इस विषय में अथर्ववेद कहता है-


यत्रा सुहार्दः सुकृतो मदन्ति विहाय रोगतन्वः स्वायाः।


अश्लोणा अंगा अछुताः स्वर्गे तत्र पश्येम पितरौ च पुत्रान्॥


      अर्थात् जहाँ सहृदय जन शुभकर्मों को करने हारे अपने शरीर का रोग त्याग कर आनन्द भोगते हैं, जिस परिवार में कोई हीन अंग या अधिक अंगों वाला नहीं हो वहाँ मातापिता और पुत्रों को देखें। मन्त्र में यह सुखी परिवार का चित्र प्रस्तुत किया है। जिस परिवार में कोई रोगी या विकलांग न हो, जहाँ वृद्ध माता-पिता और पुत्र-पुत्रियाँ हों और सर्वविद् आनन्द प्रसन्नता हो, उसे स्वर्ग कहते हैं। इसी प्रकार परमात्मा में ध्यानमग्न होने से भी सुख की प्राप्ति होती है। अतः अथर्ववेद पुनः कहता है-


अष्टा चक्रा नव द्वारा देवानां पूरयोद्धा।


तस्यां हिरण्यये कोशे स्वर्गो ज्योतिषावृतः॥


       अर्थात् आठ चक्रों और नौ द्वारों वाली इन्द्रिय रूप देवों की नगरी अयोध्या नाम वाली है। ब्रह्मचर्य आदि के पालन से सुरक्षित यह नगरी कामादि शत्रुओं से अपराजित है। इस नगरी में एक ज्योतिर्मय कोष (हृदय) है जो ब्रह्म के प्रकाश से प्रकाशित है जिसमें ध्यान करने से साधक स्वर्ग की प्राप्ति होती है।


      वेद के उपरोक्त मन्त्रों की विशेषता तो इसी में है कि कर्त्तव्य की इस विविधता में भी स्वर्गद्वार सबके लिए समान रूप से खुला है। स्वर्ग के लिए हृदय की पवित्रता की शर्त है। स्वर्ग-नरक की यह श्रृंखला बहुत विस्तृत हैलेख के विस्तारभय से हमें इतना तो अवश्य ही जान लेना चाहिए कि गृहस्थ आश्रम ही स्वर्ग का स्थान है। इसलिए इसको समझदारी से चलाना सुख का हेतु है अन्यथा महान् दुःखों का कारण भी बन जाता है। 


 


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