स्वामी दयानन्द सरस्वती की वेदविषयक कतिपय मान्यताएँ

स्वामी दयानन्द सरस्वती की वेदविषयक कतिपय मान्यताएँ


◼१- वेदसंज्ञा केवल चार मन्त्र-संहितामों की ही है । ब्राह्मणग्रन्थों की सार्वजनिक वेदसंज्ञा नहीं है । जिन ग्रन्थों में ब्राह्मणों की वेदसंज्ञा कही है, वह पाणिनीय वृद्धि गुण प्रभृति संज्ञाओं के समान पारिभाषिक होने से तत्तद् ग्रन्थों तक ही सीमित है।


◼२- वेद नित्य अपौरुषेय ईश्वरीय ज्ञान है ।


◼३- सृष्टि में ईश्वर ने जैसे अनेक पदार्थ उत्पन्न किये, उसी प्रकार सर्ग के प्रारम्भ में उन पदार्थों का ज्ञान भी अग्नि आदि ऋषियों के अन्तःकरण में प्रतिभासित किया।


◼४- मनुष्य में स्वाभाविक ज्ञान होने पर भी वह विना नैमित्तिक ज्ञान के ज्ञान की उन्नति नहीं कर सकता।


◼५- जैसे ईश्वर द्वारा निर्मित सम्पूर्ण पदार्थ मानवमात्र के लिये हैं, उसी प्रकार उसके द्वारा प्रदत्त वेदरूपी ज्ञान भी मानवमात्र के लिये है। उस पर किसी जाति वा वर्ग विशेष का न तो विशेष अधिकार है और न किसी को उससे वञ्चित रखा जा सकता है।


◼६- वेद में किसी जाति वा देश का कोई इतिहास नहीं है । वेद के समस्त शब्द यौगिक अथवा योगरूढ हैं, रूढ नहीं हैं।


◼७- वेद स्वत: प्रमाण है। अन्य शाखाएँ ब्राह्मण आदि समस्त वाङ्मय परतः प्रमाण है । अर्थात् वेद के विरुद्ध होने पर उनका प्रामाण्य मान्य नहीं है।


◼८- वेद सब सत्यविद्याओं का पुस्तक है अर्थात् उनमें सभी विद्याओं का मूलरूप से संकलन है। ['सब सत्य विद्याओं से तात्पर्य मनुष्य को जिन-जिन विद्याओं की अपेक्षा हो सकती है, तक सीमित है।]


◼९- वेद में प्रमुख रूप से आधिदैविक जगत् और अध्यात्म सम्बन्धी ज्ञान है । परन्तु आधिदैविक ज्ञान का भी अध्यात्म-विज्ञान में विलय हो जाता है अर्थात् वेद का चरम लक्ष्य अध्यात्म-विज्ञान है ।


◼१०- वेद की व्याख्या प्रधानरूप से आधिदैविक और आध्यात्मिक ही माना है। कर्मकाण्डीय याज्ञिक व्याख्या वहीं तक मान्य है, जहाँ तक यज्ञीय कर्म वा तद्गत विनियोग वेदानुकूल है।


◼११- उपमा आदि अलङ्कारों द्वारा लोकव्यावहारिक व्याख्या भी जनसाधारण के लिये उपयोगी होने से आवश्यक है।


◼१२- वेद की व्याख्या में ऋषि-मुनि प्रोक्त शाखाओं ब्राह्मणग्रन्थों एवं अन्य वेदाङ्गादि विद्याग्रन्थों का साहाय्य लिया जा सकता है।


◼१३ - वेद की रचना बुद्धिपूर्विका है।(बुद्धिपूर्वा वाक्य कृतिर्वेदे। वैशेषिक ६।१।१) अत: उसमें कोई असम्भव सृष्टिक्रम-विरुद्ध तथा सदाचारविपरीत  अश्लील) वर्णन नहीं है।


 


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