सत्यार्थप्रकाश का प्रयोजन...

सत्यार्थप्रकाश का प्रयोजन...
(ले. पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय)
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ऋषि दयानन्द ने “सत्यार्थप्रकाश” को तीन प्रयोजनों से लिखा था।


१. वैदिक धर्म के प्राचीन मन्तव्यों का प्रचार.


२. वर्तमान समय के हिन्दुओं में जो नई-नई कुरीतियां, दोष आ गये है तथा जिनके कारण वैदिक धर्म में विकार से अनेक मत मतान्तर हो गये है उनको दूर किया जाये.


३. उन परकीय सम्प्रदाय व सभ्यताओं का सामना किया जावे जिन्होनें वैदिक आर्य सभ्यता संस्कृति पर आक्रमण करके भारत में अपना प्रभुत्व जमा रखा है. इस आक्रमण का सामना करते हुए विजय पाना व आक्रांन्ता को पराभूत करना इसका एक उद्देश्य है.


यदि इन तीनों बातों को ध्यान में रखकर "सत्यार्थप्रकाश" का अध्ययन किया जावे तो कहना पडता है कि "सत्यार्थप्रकाश" से बढकर इन तीनों रोगों की और कोई औषधि नहीं है.


वैदिक धर्म के प्रेमियों को स्वीकार करना पडेगा कि वैदिक धर्म की जो रूपरेखा स्वामी दयानन्द ने हमारे सम्मुख रखी है उससे उत्तम और इतने विस्तार से आज तक के किसी भी अन्य ग्रन्थ में नहीं पाई जाती है.


हिन्दू धर्म के वर्तमान रोगों तथा उनकी औषधि जिस उत्तमता से ऋषि दयानन्द ने इस ग्रन्थ में बतलाई है वह किसी अन्य ग्रन्थ में नहीं मिल सकती.


हिन्दुओं के विभिन्न सम्प्रदायों द्वारा ऋषि दयानन्द का अब तक जो विरोध होता रहा है वह केवल उन लोगों के द्वारा ही हुआ है जिनका जीवन ही सम्प्रदायवाद पर निर्भर करता है. जिन लोगों ने स्वयं को सम्प्रदायवाद के दोष से ऊपर उठा लिया उनको सत्यार्थप्रकाश में दोष दिखाई नहीं देता.


अब रही परकीय मतों द्वारा सत्यार्थप्रकाश के विरोध की बात. इसका कारण यह है कि यह ग्रन्थ उनके आक्रमण में बाधक बनता है. आर्यसमाज ने इन आक्रमणों का फिर से सामना किया. ये लोग चाहते है कि वे निरन्तर आक्रमण करते रहें तथा लोग चुपचाप कोई प्रतिकार किये बिना सिर झुकाते रहें. आर्यसमाज ऐसा करने के लिए कतई तैयार नहीं.


* साभार: “गंगा ज्ञान धारा” भाग-३, 
* सम्पादक-अनुवादक: प्रा. राजेन्द्र जिज्ञासु जी 
* संदर्भ: “सत्यार्थप्रकाश” की रक्षा के आन्दोलन के समय पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय का यह लेख साप्ताहिक “रिफार्मर” (उर्दू) के ११ फरवरी १९४५ के अंक में पृष्ठ ३५ पर प्रकाशित हुआ था।


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