संध्या क्या ,क्यों ,कैसे



संध्या क्या ?,क्यों ?,कैसे 





        आर्य समाज की स्थापना से बहुत पूर्व जब से यह जगत् रचा गया है , तब से ही इस जगत् में संध्या करने की परम्परा अनवरत रूप से चल रही है | बीच में एक युग एसा आया जब वेद धर्म से विमुख हो कर कार्यों का प्रचलन आरम्भ हुआ तो संध्या को भी लोग भुलाने लगे किन्तु स्वामी दयानंद सरस्वती जी का हम पर महान् उपकार है , जो हम पुन: वेद धर्म के अनुगामी बने तथा संध्या से न केवल परिचित ही हुए अपितु संध्या करने भी लगे |


         संध्या क्या है ? सृष्टि क्रम में एक निर्धारित समय पर परम पिता परमात्मा का चिंतन करना ही संध्या कहलाता है | इससे स्पष्ट है कि दिन के एक निर्धारित काल में जब हम अपने प्रभु को याद करते हैं , उसका गुणगान करते हैं , उसके समीप बैठ कर उसका कुछ स्मरण करते हैं , बस इस का नाम ही संध्या है |


        संध्या कब करें ? ऊपर बताया गया है कि एक निश्चित समय पर प्रभु स्मरण करना ही संध्या है | यह निश्चित समय कौन सा है ? यह निश्चित समय कालक्रम से सृष्टि बनाते समय ही प्रभु ने निश्चित कर दिया था | यह समय है संधि काल| संधिकाल से अभिप्राय: है जिस समय दिन व रात का मिलन होता है तथा जिस समय रात और दिन का मिलन होता है , उस समय को संधि काल कहते हैं | इस से स्पष्ट होता है कि प्रात: के समय जब आकाश मे हल्के हल्के तारे दिखाई दे रहे हों, सूर्य निकलने की तैयारी में हो , इस समय को हम प्रात:कालीन संध्या काल कहते हैं | प्रात:काल का यह समय संध्या का समय माना गया है | इस समय ही संध्या का करना उपयोगी है |


        ठीक इस प्रकार ही सायं के समय जब दिन और रात्री का मिलन होने वाला होता है , सूर्य अस्ताचाल की और गमन कर रहा होता है किन्तु अभी तक आधा ही अस्त हुआ होता है | आकाश लालिमा से भर जाता है | इस समय को हम सायं कालीन संध्या समय के नाम से जानते हैं | सायं कालीन संध्या के लिए यह समय ही माना गया है | इस समय ही संध्या के आसन पर बैठ कर हमें संध्या करना चाहिए |


        गायत्री जप ही संध्या | वास्तव में गायत्री जप का ही दूसरा नाम संध्या है किन्तु इस गायत्री जप के लिए भी कुछ विधियां बनाई गई है ,जिन्हें करने के पश्चात् ही गायत्री का यह जप आरम्भ किया जाता है | गायत्री जप के लिए भी कुछ लोग यह मानते हैं कि यह जप करते हुए कभी उठना , कभी बैठना तथा कभी एक पाँव पर खडा होना , इस प्रकार के आसन बदलते हुए गायत्री का जप करने को कहा गया है | हम यह सब ठीक नहीं मानते | हमारा मानना है कि गायत्री जप के लिए हम एक स्थिर आसन पर बैठ कर गायत्री मन्त्र का जाप करें | यह विधि ही ठीक है अन्य सब विधियां व्यवस्थित न हो कर ध्यान को भंग करने वाली ही हैं |


       संध्या के प्रकार| कुछ लोग कहते हैं कि ब्राह्मण की संध्या भिन्न होती है जबकि ठाकुर लोग कुछ अलग प्रकार की संध्या करते है | इन लोगों ने ऋग्वेदियों की संध्या अलग बना ली है तो सामवेदियों की संध्या कुछ भिन्न ही बना ली है | यह सब विचारशून्य लोग ही कर सकते हैं | परमपिता परमात्मा सब के लिए एक ही उपदेश करता है , सब के लिए उसका आशीर्वाद भी एक ही प्रकार का है तो फिर संध्या अलग अलग कैसे हो सकती है ? अत: संध्या के सब मन्त्र सब समुदायों , सब वर्गों तथा सब जातियों के लिए एक ही हैं |


       जाप के पूर्व शुद्धि| ऊपर बताया गया है कि गायत्री जाप का नाम ही संध्या है किन्तु इस जाप से पूर्व शुद्धि का भी विधान दिया गया है | प्रभु उपदेश करते हैं कि हे जीव ! यदि तू मुझे मिलने के लिए संध्या के आसन पर आ रहा है तो यह ध्यान रख कि तूं शुद्ध पवित्र हो कर इस आसन पर बैठ | इस शुद्धि के लिए शरीर, इन्द्रियों, मन, बुद्धि, चित और अहंकार , यह छ: प्रकार की शुद्धि आवश्यक है | इस निमित आचमन से शरीर की शुद्धि , अंग स्पर्श से सब अंगों की शुद्धि, मार्जन से इन्द्रियों की शुद्धि, प्राणायाम से मन की शुद्धि, अघमर्षण से बुद्धि की शुद्धि ,मनसा परिक्रमा से चित की शुद्धि तथा उपस्थान से अहंकार की शुद्धि की जानी चाहिए |


       शुद्धि कैसे ? अब प्रश्न उठता है की यह शुद्धि कैसे की जावे ? इस के लिए बताया गया है कि हम प्रतिदिन दो काल स्नान करके अपने शरीर को शुद्ध करें | अपने अन्दर को शुद्ध करने के लिए राग, द्वेष, असत्य आदि दुरितों को त्याग दें | कुशा व हाथ से मार्जन करें | ओ३म् का उच्चारण करते हुए तीन बार लंबा श्वास लें तथा छोड़ें , यह प्राणायाम है | सब से अंत में गायत्री का गायन करते हुए शिखा को बांधें |


        इस प्रकार यह पांच क्रियाएं करके मन व आत्मा को शांत स्थिति में लाया जावे | यह शांत स्थिति बनाने के पश्चात् संध्या के लिए छ: अनुष्ठान किया जावें ,जो इस प्रकार हैं :


        संध्या के लिए छ: अनुष्ठान


१. शरीर को असत्य से दूर
शरीर को असत्य से दूर करने के लिए संध्या में बताये गए प्रथम मन्त्र ओ३म् शन्नो देवी रभिष्टये आपो भवन्तु पीतये शंयो राभिस्रवंतु न: का उच्चारण करने के पश्चात् तीन आचमन करें |



२. मार्जन पूर्वक इन्द्रियों की शुद्धि
ओ३म् वाक् वाक् ओ३म प्राण: प्राण: आदि मन्त्र से अंगों की शुद्धि करें | ओ३म भू: पुनातु शिरसि आदि मन्त्र से प्रभु के नामों का अर्थ करते हुए मार्जन पूर्वक इन्द्रियों की शुद्धि करें |



३. प्राणायाम से मन शांत
कम से कम तीन तथा अधिक से अधिक ग्यारह प्राणायाम कर अपने मन को शांत करें |



४. बुद्धि की शुद्धि तथा बोले मन्त्रों के अर्थ चिंतन
ओ३म् ऋतं च आदि इन तीन मन्त्रों से अपनी बुद्धि को समझाते हुए शुद्ध करें तथा पुन: शन्नो देवी मन्त्र को बोलते हुए अब तक जो मन्त्र हमने बोले हैं , उन सब के अर्थ को देखें तथा अर्थों पर चिंतन करें |



५. चित को सुव्यवस्थित करें
ओ३म् प्राची दिग अग्नि आदि इन छ: मन्त्रों का गायन करते हुए अपने चित को सुव्यवस्थित करें |



६. अहंकार तत्व
ओ३म् उद्वयं से ले कर ताच्च्क्शुर्देवहितं तक के मंत्रों का गायन करते हुए अहंकार तत्व से अपनी स्थिति का सम्पादन करें| 



       प्रधान ज  यह छ: अनुष्ठान करने के पश्चात् हम इस स्थिति में आ जाते हैं की अब हम प्रधान जप अर्थात गायत्री का जाप कर सकें | अत: अब हम गायत्री का जप करते हैं |


      समर्पण गायत्री का जप करते हुए हम स्वयं को उस पिता के पास पूरी तरह से समर्पित करने के लिए बोलते हैं , हे इश्वर दयानिधे भवत्क्रिप्यानेण जपोपास्नादि कर्मणा धर्मार्थ का मोक्षानाम सद्यसिद्धिर्भवेण | इस प्रकार हम समग्रतया उस प्रभु को समर्पित हो जाते हैं |


        अंत में हम उस परमात्मा को नमस्ते करते हुए अपने आज के कर्तव्य को पूर्ण करते हुए संध्या का यह अनुष्ठान पूर्ण करते हैं |


       जाप की विधि| गायत्री का जाप एक आसन पर बैठ कर ऊँचे उच्चारण से किया जावे |ध्यान के समय मौन जाप की प्रथा है किन्तु अकेले में जाप करते समय ऊँचे स्वर से किया जाता है | कुछ लोग मौन जाप का कहते है तो कुछ उच्च स्वर में जबकि कुछ का मानना है कि यह जाप इतनी मद्धम स्वर में किया जावे कि मुख से निकला शब्द केवल अपने कान तक ही जावे | इस सम्बन्ध में स्वामी जी ने संस्कार विधि में मौन जाप का विधान ही दिया है | हम संध्या करते समय यह सब ध्यान में रखते हुए ऊपर बताये अनुसार ही संध्या करें तो उपयोगी होगा |



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