वेदमंत्र(याभिः सिन्धुं मधुमन्तमसश्चतं)

 वेदमंत्र(याभिः सिन्धुं मधुमन्तमसश्चतं)


याभिः सिन्धुं मधुमन्तमसश्चतं वसिष्ठं याभिरजरावजिन्वतम्।
याभिः कुत्सं श्रुतर्यं नर्यमावतं ताभिरू षु ऊतिभिरश्विना गतम्॥ 


        हे जरावस्था रहित शिक्षकों और उपदेशकों  आप हमारे पास सुरक्षा और कृत्यों की उन शक्तियों के साथ आओ जिसके द्वारा आप एक मनुष्य को मधुर नदी के समान निरंतर गतिमान बनाते हैं। जिसके द्वारा आप एक देवत्व से  परिपूर्ण विद्वान और एक योद्धा को सुरक्षित और उन्नत करते हैं और जिसके द्वारा आप नायकों का नायक बनाते हैं।


      O unaging teachers and preachers, come to us with all protection and acts by which you cause a person to move relentlessly like the flow of sweet river; by which you protect and promote pious scholar of divinity and the warrior; by which you create the leader of leaders.


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