मनुष्य बनो

        ईश्वर ने तो सबको मनुष्य के रूप में उत्पन्न किया था, और वेदों में यही उपदेश दिया था, कि - मनुर्भव। अर्थात मनुष्य बनो।  आप पूछेंगे, "क्या हम मनुष्य नहीं हैं? जब ईश्वर ने हमें मनुष्य के रूप में उत्पन्न किया है, तो हम मनुष्य ही तो हैं? फिर मनुष्य बनने के लिए क्यों कह रहे हैं?" 


       जी हाँ। यह ठीक है कि मोटे तौर पर हम मनुष्य कहलाते हैं। परंतु फिर भी हमें ईश्वर की ओर से यह कहा जा रहा है कि मनुष्य बनो। इसका अर्थ हुआ कि केवल आकृति डिजाइन मनुष्य का होने मात्र से कोई मनुष्य नहीं कहलाता। तो फिर कैसे कहलाता है?  मनुष्य वाले उत्तम आचरण से, वह व्यक्ति मनुष्य कहलाता है। इस प्रकार से ईश्वर का अभिप्राय है कि मनुष्य का शरीर तो धारण कर लिया, इसके बाद मनुष्य वाला उत्तम आचरण भी करो।


        तब यदि मनुष्य के बच्चे मनुष्य नहीं बनते, तो फिर क्या बनते हैं? वही बनते हैं, जो उनके माता पिता अपने बच्चों को बनाते हैं। माता-पिता क्या बनाते हैं? वे हिंदू बनाते हैं, मुस्लिम बनाते हैं, ईसाई बनाते हैं, सिख बनाते हैं, बौद्ध और जैन आदि बनाते हैं। जैसा विचार माता पिता का होता है वैसा ही वे अपने बच्चे को बनाते हैं। जबकि ऐसा करना ईश्वर के अभिप्राय से विरुद्ध है। माता पिता अपने बच्चों को मनुष्य क्यों नहीं बनाते? हिंदू मुस्लिम सिख इसाई आदि क्यों बनाते हैं? क्योंकि माता पिता स्वयं भटक गए हैं। उन्हें स्वयं ही नहीं मालूम कि हमें मनुष्य बनना चाहिए , और अपनी संतान को भी मनुष्य बनाना चाहिए।


      जब माता पिता स्वयं ही नहीं जानते कि हमें क्या बनना चाहिए और अपनी संतान को क्या बनाना चाहिए, तो वे अपनी संतान को क्या बना पाएंगे? वही बना पाएंगे, जैसा वे जानते मानते हैं। जब व्यक्ति स्वयं ही मनुष्य नहीं है, बल्कि हिंदू मुस्लिम सिक्ख ईसाई है, तो अपनी संतान को भी वैसा ही बनाता है। इसका परिणाम, आपस में संघर्ष उत्पन्न होता है। 


      कितना अच्छा होता, यदि सब लोग इस बात को जानने का प्रयास करते, कि हम हिंदू मुस्लिम सिक्ख ईसाई नहीं हैं, हम मनुष्य हैं। ईश्वर ने हमें मनुष्य बनने का आदेश दिया है, हिंदू मुस्लिम सिक्ख ईसाई आदि बनने का नहीं। 
तो मनुष्य कैसे बनेंगे? जब मनुष्यता को अपनाएँगे। मनुष्यता क्या है? 


      मनुष्यता के ये लक्षण हैं, जैसा व्यवहार हम दूसरों से अपने लिए चाहते हैं, वैसा ही दूसरों के साथ हम भी करें। बस यही मनुष्यता है।  मनुष्य बनें और सदा सुखी रहें। यदि सब लोग मनुष्यता के लक्षणों को अपनाते, तो सभी मनुष्य कहलाते। अपनी संतानों को भी मनुष्य ही बनाते। ऐसा यदि होता, तो मनुष्यों में परस्पर यह संघर्ष नहीं होता, जो कि दुर्भाग्यवश आज हो रहा है। अब भी समय है, कि हम मनुष्य बनें। ईश्वर के अभिप्राय के अनुकूल आचरण करें। मनुष्यता को अपनाएं। स्वयं भी मनुष्य बनें तथा अपनी संतान को भी मनुष्य बनाएँ।


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