क्या-क्या नहीं झेला प्यारे ऋषि ने

क्या-क्या नहीं झेला प्यारे ऋषि ने



        उन्होंने मुझसे पूछा कि तुम्हारा नाम क्या है ? मैंने कहा - मेरा नाम दयानंद है । यह बात उन दिनों की है जब मैं अकेला घूमता था ।  जंगल से गुजरते हुए एक बार मेरा ऐसे स्थान पर जाना हुआ जहाँ सभी शाक्त ( कोई जाति ) बसते थे । उन्होंने मेरी बड़ी सेवा की । कई दिन उनके पास रहने के बाद जब मैं जाने लगा तो उन्होंने बड़ी विनती करके मुझे जाने नहीं दिया । मैं सोचता रहा कि यह लोग मुझे भक्ति भाव से ठहराना चाहते हैं । वे मेरी बड़ी सेवा करते थे ।  फिर कुछ दिनों बाद उनका कोई पर्व होता है वह आ गया । वे उस दिन मुझे बोले कि आज सब देवी मंदिर में जाकर गीत गाएंगे । आप भी चलना । मैं बोला कि देखो ! मेरा देवी के दर्शन में विशवास नहीं है पर वे न माने ,  उन्होंने मेरे पैर पकड़ लिए और बोले - यदि आप नहीं गए तो हमारा उत्साह भंग हो जाएगा । आप मूर्ति को नमस्कार न करना पर हमारी ख़ुशी के लिए ही सही आप चलिए ।


      उनकी देवी का मंदिर दूर एक उजाड़ स्थान में था ।  जब वो बिलकुल नहीं माने तो मुझे भी उनके साथ देवी मंदिर जाना पड़ा । वहां उनका कोई यज्ञ हो रहा था और वे गा बजा कर उत्सव मना रहे थे । मुझे वे दुर्गा की मूर्ति दिखाने के बहाने भीतर ले गए । मैं सहज स्वभाव से दुर्गा की प्रतिमा के सम्मुख जा खड़ा हुआ । मूर्ति के पास एक बलिष्ठ पहलवान व्यक्ति नंगी तलवार लिए खड़ा था ।  


     वहां वे लोग मुझे भी कहने लगे - महात्मा जी ! माता के आगे झुककर नमस्कार अवश्य कीजिये । मैंने उन्हें स्पष्ट शब्दों में कह दिया कि मुझसे ऐसी आशा करना एकदम व्यर्थ है । मेरे वचनों से पुजारी चिढ गया और पास आकर मेरी ग्रीवा ( गर्दन ) को पकड़कर मेरे सिर को नीचा करने लगा । उनके इस बर्त्ताव से मैं चकित हो गया परंतु जैसे ही मैंने नजरें घुमाई तो मेरे आश्चर्य का ठिकाना न रहा ।  मैंने देखा कि वह जो बलिष्ठ व्यक्ति नंगी तलवार लिए खड़ा था वह मेरे समीप आकर मेरी गर्दन पर तलवार चलाने के लिए निशाना साध रहा है । 


      इस दृश्य को देखकर मैं सावधान हो गया । मैंने झपटकर उसके हाथ से तलवार छीन ली । पुजारी तो मेरे बाएं हाथ के एक ही धक्के से मंदिर की दीवार से जा टकराया । मैं तलवार लिए मंदिर के आँगन में आ गया । उस समय आंगन के सभी लोग कुल्हाड़ा , छूरी आदि शस्त्र लेकर मुझ पर टूट पड़े ।  द्वार की और देखा तो उसको ताला लगा हुआ था । अपने-आपको बलिदान से बचाने के लिए , मैं उछलकर दीवार पर चढ़ गया और परले पार उतरकर भाग निकला । दिनभर तो मैं वहीं छिपा बैठा रहा , परन्तु जब रात का राज्य विस्तृत हो गया तो रातों-रात ग्रामान्तर में जा पहुंचा । उस दिन से मैंने शाक्त लोगों का कभी भी विशवास नहीं किया ।


( दयानंद प्रकाश में लिखा है कि चांदापुर में ही स्वामी जी ने आपबीती यह संस्मरण  म० बख्शीराम और मुंशी इंद्रमणि जी को सुनाई थी ) 


 


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