इस्लाम

बीसवीं सदी का बड़ा हिस्सा हमने ये सुन कर बिताया कि इस्लाम एक शांतिपूर्ण (Religion of Peace) और प्रगतिशील धर्म है।  इंटरनेट के बढ़ते प्रसार और सोशल मीडिया के आगमन के बाद यह भ्रांति सदा के लिए दूर हो गयी। कुछ दिन तक क़ुरान और हदीस के ग़लत तर्जुमे का बहाना लिया गया पर अंततः मुस्लिमों ने भी इस विषय पर बहस करने से किनारा कर लिया।


तो साहब अब समय था कथात्मक (narrative) बदलने का। हिंदूओं में आस्था तक को तर्क पर परखने की परंपरा रही है। और यही तार्किक संवाद हिन्दुओ की ताक़त के साथ हमारी Achilles Heel (कमज़ोर नस) भी रही है। इस तार्किकता ने हिन्दुओ के बीच से बौद्ध पंथ से लेकर आर्य समाज तक कितने मत निकाल दिए। तो इस बार फ़िर लिबरल, सेक्युलर वामपंथियों ने तर्क का सहारा लिया।


“कहाँ जा रहे हो तुम, क्या ‘उनके’ जैसा बनना चाहते हो ? देखो सेक्युलरिस्म के रास्ते हट कर पाकिस्तान की क्या दुर्गति हुई ! क्या तुम इसे एक “हिंदू पाकिस्तान” बनाना चाहते हो ?”


ये कुछ प्रश्न पहले से सशंकित लिबरल हिंदू मानसिकता को व्यथित कर देने के लिए पर्याप्त होते हैं। ज़ाहिर है, भला पाकिस्तान बनना कौन चाहेगा ? परंतु क्या ये प्रश्न अपने आप में सही हैं ? प्रश्न छोड़िए, क्या प्रश्न स्वयं तर्क की कसौटी पर खरे उतरते हैं ?


अंग्रेज़ी में एक मुहावरा है, apples & oranges, यानी सेब और संतरे। इसका इस्तेमाल यह बताने के लिए किया जाता है कि दो ऐसी चीज़ें की तुलना नहीं हो सकती जो कि मूलभूत स्वरूप में ही एकदम जुदा हों। कुछ ऐसा ही हिंदू धर्म और इस्लाम के बीच है। और यह मात्र रिटॉरिकल नहीं है। चौदह सौ वर्षों की तारीख गवाह है कि इस्लाम एक छोटे से क़बीले से उठ कर पूरी दुनिया में कैसे फैला। आठ सौ वर्षों में विश्व के सबसे बड़े नरसंहार (genocide) के गवाह हिंदुस्तान के परिप्रेक्ष्य में इस्लाम और हिन्दू धर्मों की बराबरी तो छुरी और खरबूजे की बराबरी करने जैसा है।


वर्तमान में एक जनसांख्यिक दृष्टि हिंदुस्तान पर दौड़ाये तो आप पायेंगे कि केवल नौ प्रदेशों में मुस्लिम जनसंख्या दहाई प्रतिशत में है, ज़्यादातर में बमुश्किल। बाक़ी जगहों पर ये कुल जनसंख्या के 1 से 5 प्रतिशत के बीच हैं। परंतु हर जगह अपने मज़हब, अपनी तथाकथित संस्कृति को मज़बूती से मानते और प्रैक्टिस करते हुए। हिन्दू-बाहुल्य इलाकों में, सड़कों के बीच और रेल की पटरियों से लेकर हवाई अड्डों से सटा कर बनी हुई ऊँची-ऊँची मीनारों वाली बड़ी-बड़ी मस्ज़िदें इसकी गवाह हैं।


सड़क और सरकारी ज़मीन घेर कर नमाज़ पढ़ने वालों में इज़ाफ़ा होता जा रहा है। अभी हाल में ही आगामी बकरीद पर मंच से खुलेआम गाय काटने की चुनौती देने वाले मौलाना जिस कर्नाटक में रहते हैं वहाँ मुस्लिमों की संख्या 13 प्रतिशत से भी कम है। शाहबानो केस निर्णय के बाद जिस तरह देश भर के मुस्लिमों ने एक होकर पार्लियामेंट को निर्णय पलटने पर मजबूर कर दिया, वो विश्व में कहीं भी अल्पसंख्यकों की सबसे बड़ी जीत है। और अभी ट्रिपल तलाक़ निर्णय की जो गत बन रही है वो सबके सामने है। भाजपा की सरकार केंद्र और राज्य में, परन्तु नए कानून के तहत पति के विरुद्ध मुक़दमा दर्ज़ कराने वाली निदा खान को सरेआम इस्लाम से खारिज कर दिया गया। इतना बेलौस मुसलमान तो किसी इस्लामी मुल्क में भी नहीं है।


अब इसकी तुलना देश के एकमात्र उस प्रदेश से करिए जहाँ मुस्लिम बहुसंख्यक हैं। काश्मीर से कुफ़्र और काफ़िर दोनों का सफ़ाया हो गया। कश्मीरी पंडितों के साथ अपने ही देश में हुए सुलूक की मिसाल विश्व में कहीं नहीं मिलती। पहले तो कुछ दिनों लिबरल-सेक्युलर मीडिया और कांग्रेसी-वामपंथी समूहों ने इसको कश्मीरियत कह कर क्षेत्रीय-सांस्कृतिक रंग देने की कोशिश की, परंतु गिलानी और मीरवाइज़ जैसे कट्टरपंथियों के चलते यह भ्रम बहुत दिन नहीं चला। और सिर्फ़ काश्मीर ही क्यों, दुनिया में एक भी इस्लामिक मुल्क में ग़ैर-इस्लामी लोगों के कोई अधिकार नहीं हैं।


विडम्बना देखिए कि देश के 28 प्रदेशों में अल्पसंख्यकों का अधिकार लड़ कर लेने वाले मुस्लिम उस एकलौते राज्य में हिन्दुओं को जीने का अधिकार भी देने को तैयार नहीं हैं जहाँ वो बहुसंख्यक हैं। अल्पसंख्यक बन कर मानवता की दुहाई देने वाले जिहादियों का बहुसंख्यक स्वरूप एकदम जुदा है।


अंतर साफ़ है। जहाँ हिंदू-बहुल क्षेत्रों में इस्लाम को पूरे अधिकार प्राप्त हैं (हिन्दुओं से भी अघिक), वहीं मुस्लिम-बहुल इलाक़ों में जातीय सफ़ाया/ संहार (ethnic cleansing) एक रूटीन बात है। और वे इसे कभी छुपाते भी नहीं। और न ही इसको लेकर वो कभी शर्मिंदा नज़र आएंगे। उनके लिए तो ये आसमानी फ़रमान है। नज़र तो उनकी उन इलाक़ों पर है जो अभी भी काफ़िर-बाहुल्य हैं। पर वो आश्वस्त हैं कि जनसांख्यिकी परिवर्तन को देखते हुए यह सिर्फ़ समय की बात है। (It’s just a matter of time).


तो अगली बार आपको “हिंदू पाकिस्तान” से डराया जाए तो याद रखिएगा इसकी कोई संभावना नहीं है। “हिंदू हिंदुस्तान” में दमघोंटू कट्टरता की कोई गुंजाइश नहीं है। क्योंकि हिंदू धर्म किसी एक किताब, एक रसूल और एक मत का ग़ुलाम कभी नहीं रहा। न रहेगा ।


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