हम भद्र सुनें

हम भद्र सुनें


    परमात्मा न्यायकारी है अतः वह हमारे कर्मों के आधार पर ही न्याय करता है। उसकी न्याय-व्यवस्था में जरा-सी भी भूल-चूक होने की कोई संभावना न और न ही परमात्मा किसी की सिफारिश आदि से हमार पाप-कर्मों को क्षमा करता है। अपने पुण्य कर्मों के आधार पर ही परमात्मा ने हमें यह मानव-शरीर प्रदान किया हैवेद में कहा गया है-


विभक्तारं हवामहे वसोश्चित्रस्य राधसः।


सवितारं नृक्षसम्॥ (यजु० 30-4


       परमात्मा ने हमें हमारे कर्मानुसार यह शरीर तो दिया ही मगर साथ में और क्या कुछ दिया यह भी चिन्तन करने की बात है। परमात्मा ने आत्मा को दो प्रकार के करण (उपकरण) दिए हैं। पांच कर्मेन्द्रियां और पांच ज्ञानेन्द्रियां ये वाह्यकरण तथा मन, बुद्धि, चित्त और अंहकार (स्व-स्मृति) ये अन्तःकरण दिए हैं। अब हमारा यह दायित्व है कि इन वाह्य एवं अन्त:करण का सदुपयोग करके अपने जीवन को भद्रता से परिपूर्ण करें। वेद हमें आदेश देता है-


भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्रः।


स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवांसस्तनूभिर्व्यशेमहि देवहितं यदायुः॥


       (देवाः) ज्ञान-ज्योति देने वाले विद्वानो ! आपकी उपदेश वाणियों से हम (कर्णेभिः) कानों से (भद्र) कल्याण व सुखकर शब्दों को ही (शृणुयाम्) सुनें। (यजत्राः) अपने संग व ज्ञानदान से हमारा त्राण करने वाले विद्वानो ! (अक्षभिः) हम प्रभु से दी गई इन आंखों से (भद्रम्) शुभ को ही (पश्येम्) देखें। हम कभी किसी की बुराई को न देखें। (स्थिरैः अंगैः) दृढ़ अंगों से तथा (तनूभिः) विस्तृत शक्ति वाले शरीरों से (तुष्टुवांसः) सदा प्रभु का स्तवन करते हुए, उस आयु को (व्यशेमहि) प्राप्त करें, (यत् आयुः) जो जीवन (देवहितम्) देव के उपासना के योग्य है अर्थात् जो अपने कर्तव्यों को करने के द्वारा प्रभु की अर्चना में बीतता है।


      छान्दो०उप० (3-18-2) में कहा गया है कि ब्रह्म कं चार चरण हैं-वाक्, प्राण, चक्षु और श्रोत्र। हम अपनी आंख, कान आदि ज्ञानेन्द्रियों का कैसे सदुपयोग करें इसके दिशानिर्देश उपरोक्त मन्त्र में दिए गए हैं। हम भद्र ही सुनें, भद्र ही देखें, भद्र ही बोलें और इस प्रकार अदीन होकर हम अपने जीवन को देवों के सदृश व्यतीत करें। हम स्वयं को प्रभु के उपासना के योग्य बनाएं। भद्रं कर्णेभिः श्रणयाम्-इस भद्रता प्राप्ति के लिए भी वेद ही सुनें। हम वेद को ही सुनें व सुनाएंउपरोक्त मन्त्र कर्णवेध संस्कार में भी आया है। अन्यत्र कहा गया है-सुश्रुतौ कर्णो-हम उत्तम श्रवण शक्ति से सम्पन्न हों। भद्र श्रुतौ कर्णो-हम भद्र बातों को ही सुनने वाले हों। भद्र श्लोक श्रूयासम्-कल्याणकर पद्यों व मन्त्रों को सुनने वाले होंअथर्ववेद में कामना की गई है-व्यं सर्वेषु यशसः स्याम। हम संसार में यशस्वी बनें एवं अपने कानों से अपने यश की बातें सुनें, अपयश की नहीं। सामवेद में बहुत ही सुन्दर मन्त्र आया है-यशो मा द्यावापृथिवी यशो मेन्द्रबृहस्पति। यशो भगस्य विन्दतु यशो प्रतिमुच्यताम्यशस्व्याउस्याः संसदोऽहप्रवदिता स्याम्॥ (611) मन्त्र का भाव है कि मेरे माता-पिता मुझे यशस्वी बनाएं तथा मैं अपने मां-बाप को यशस्वी बनाऊँ। मेरे गुरुजन मुझे यशस्वी बनाएं तथा मैं अपने गरुजनों को यशास्वी बनाऊँमेरा धन भी मुझे यशस्वी बनाए। मैं संसार से चला जाऊँ, मगर मेरा यश मुझे पीछे जीवित छोड़ जाए। यशस्वी बनकर ही मैं इस सभा का उत्कृष्ट वक्ता बनूं। अथर्ववेद में अन्यत्र भी कामना की गई है-


यशसं मेन्द्रो मघवान्कृणोतु यशसं द्यावापृथिवी उभे इमे।


यशसं मा देवः सविता कृणोतु प्रियो दातुर्दक्षिणाया इह स्याम्॥


यथेन्द्रो द्यावापृथिव्योर्यस्वान्यथाप ओषधीषु यशस्वतीः।


एवा विश्वेषु देवेषु वयं सर्वेषु यशसः स्याम्॥


यशा इन्द्रो यशा अग्निर्यशाः सोमो अजायत।


यशा विश्वस्य भूतस्याहमस्मि यशस्तमः॥


      इन मन्त्रों के भाव अतीव सार्थक हैं कि हम धन, शक्ति, ज्ञान व शरीर की दृढ़ता को धारण करते हुए यशस्वी बनें। प्रभु प्रेरणा को सुमते हुए दिव्य गुणों को धारण करें और उस सर्वप्रद प्रभु के प्रिय बनें। सूर्य की भान्ति हम गुणों का आदान करके उन गुणों को सर्वत्रचला चला चला फैलाने वाले बनें। जलों की भान्ति रस का संचार करने वाले हों। सब दिव्य गुणों के कारण हम यशस्वी बनें। हम सूर्य के समान तेजोदीप्त बनें। अग्नि के समान ऊर्ध्व गति वाले हों, चन्द्र के समान आह्लादक ज्योति को धारण करें। इस प्रकार यशस्वी जीवन वाले हों। 


       महर्षि दयानन्द सरस्वती जी ने आर्यसमाज के नियमों में एक नियम बनाया- 'वेद सब सत्य विद्याओं का पुस्तक है। वेद का पढ़ना-पढ़ाना और सुनना-सुनाना सब आर्यों का परम धर्म है।' मनु आदि मनीषियों ने भी वेद को पढ़ने-पढ़ाने की बात कही है मगर महर्षि जी ने वेद के सुनने को भी परम-धर्म बताया है। इसी से वेद श्रवण का महत्त्व हमें जान लेना चाहिए। वेद में ही कहा गया है-सं श्रुतेन गमेमहि मा श्रुतेन विराधीषि० (अ० 1-1-4) अर्थात् हम सुने हुए वा पढ़े हुए वेदानुसार अपने जीवन को चलाएं उसके विपरीत नहीं। विद्यार्थी आचार्य से प्रार्थना करते हुए कहता है-मय्येवास्तु मयि श्रुतम् (अ० 1-1-2) आचार्य मुख से सुना हुआ ज्ञान मुझमें और मुझमें ही हो, श्रुतात् हि प्रज्ञा उपजायते (कौ०अर्थ०) सुनने से प्रज्ञा उद्बुद्ध होती है। वेदों की श्रुति संज्ञा इसलिए पड़ी कि सर्वप्रथम यह ज्ञान श्रवण का विषय बना। महाभारत के सभापर्व (5-99) में नारद व धर्मराज युधिष्ठिर जी का संवाद 'कच्चित्' अध्याय के नाम से प्रसिद्ध है जिसमें बहुत से प्रश्नोत्तर हैं। एक प्रश्न पूछा गया-'कच्चिते सफलं श्रूतम्? अर्थात् हे राजन् ! यह बताओ कि क्या तुम्हारा श्रुत् (सुनना) सफल है ? तुम्हारा सुनना भी कोई फल देता है या नहीं? फिर स्वयं महर्षि नारदजी सुनने का फल बताते हैं-शील-वृत्त-फलं श्रुतम्। अर्थात् सुनना तभी सफल माना जाएगा यदि उससे शील और वृत्त की उपलब्धि प्राप्त हो। महाभारत के ही प्रह्लाद-इन्द्र उपाख्यान में विस्तार से शील व वृत्त की चर्चा की गई है। वस्तुतः शील वह सम्पदा है जिससे व्यक्ति धर्म, सत्य, वृत्त, बल और श्री से सुसज्जित रहता हैयही वृत्त है तथा अकेले शील के चले जाने से सब समाप्त हो जाता है। (महाभारत में लम्बी कथा दी गई है)


      महर्षि दयानन्द सरस्वती जी ने अपने ग्रन्थ सत्यार्थप्रकाश के नौवें समुल्लास में मुक्ति के उपायों में 'श्रवण चतुष्ट्य' की चर्चा की है। इस सम्बन्ध में वे लिखते हैं-'जब कोई विद्वान् उपदेश करे तब शान्त, ध्यान देकर सुनना, विशेष ब्रह्मविद्या के सुनने में अत्यन्त ध्यान देना चाहिए कि यह सब विद्याओं में सूक्ष्म विद्या है। सनका दूसरा-'मनन' एकान्त देश में बैठके सुने हुए का विचार करना, जिस बात में शंका हो पुनः पूछना और सुनते समय भी वक्ता और श्रोता उचित समझें तो पूछना और समाधान करना। तीसरा-'निदिध्यासन' जब सुनने और मनन करने से नि:सन्देह हो जाए तब समाधिस्थ होकर उस बात को देखना-समझना कि वह जैसा सुना था विचारा था वैसा ही है वा नहीं, ध्यान-योग से देखना। चौथा-'साक्षात्कार' अर्थात् जैसा पदार्थ का स्वरूप, गुण और स्वभाव हो, वैसा यथातथ्य जान लेना, श्रवण चतुष्ट्य कहाता है।' ऐसा करने से ही हम प्रभु का स्तवन करते हुए, उस आयु को प्राप्त कर सकेंगे जो देव के उपासना के योग्य है अर्थात जो अपने कर्तव्यों को करने के द्वारा प्रभु की अर्चना में बीतता है।


 


 


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