हकीकतराय की धर्मरक्षा

हकीकतराय की धर्मरक्षा


        सन् 1719 को स्यालकोट, लाहौर में जन्म लेने वाले एक बालक ने 1734 में मात्र 14-15 वर्ष की आयु में धर्मरक्षा के लिये प्राण देकर अहिंसा, धैर्य, क्षमा, चचरित्र, तन-मन-धन की शुद्धि ,परोपकार जैसे कल्याणकारी सिद्धान्तों पर आधारित मनुष्य समाज के निर्माण के पथ की रक्षा की'वसन्त पंचमी' के पर्व पर इस वीर वालक ने अपने प्राण देकर चिन्तकों को पीड़ा से भरा यह चिन्तन करने के लिए प्रेरित किया कि धर्म के नाम पर बलिदान देने वाला ही बड़ा होता है, सच्चा होता है और धर्म के नाम पर हत्या करने वाला सदा क्रूर, मायावी, झूठा होता है। इस आधार पर देखा जाये तो इस्लाम का इतिहास हत्याओं पर टिका हुआ है। इन निर्मम हत्याओं में बालकों के साथ-साथ महिलाओं की हत्या व बलात्कार का भी दिल हिला देने वाला इतिहास है। इस पर भी महा आडम्बरी धर्मभीरू बुद्धिजीवी ऐसे भी हैं, जो सभी धर्म समान होने का नारा देते हैं । जब इस्लाम के नाम पर बेकसूरों का रक्त बहाया जाता है तो ऐसे लोग कहते हैं कि यह सच्चा इस्लाम नहीं है? वाह रे! इस्लाम के व्याख्याकारो। क्या औरंगजेब को पता नहीं था कि सच्चा इस्लाम क्या है? क्या इस्लामिक स्टेट का नारा देने वाले इस्लाम नहीं जानते? इस्लाम के नाम पर अलग बना पाकिस्तान जो निरन्तर आतंकवाद परोसकर बेकसूरों की हत्या करवा रहा है, क्या वह इस्लाम नहीं जानता?


     19 जनवरी को कश्मीरी पण्डितों पर जो भयंकर अत्याचार हुए, उनका नरसंहार व कश्मीर से महापलायन हुआ, उस दर्दनाक घटना के तीस वर्ष पूरे हुए। क्या इन तथाकथित उदारवादियों को इस्लाम की सही व्याख्या नहीं मिलती? क्या यह सब इस्लाम की 'वाजिबुलकत्ल' की शिक्षा का पालन नहीं था? इस्लाम के उन्माद के प्रति आत्मरक्षा की प्रतिक्रिया इन बुद्धिजीवियों को 'धार्मिक असहिष्णुता' दिखाई देती है। अपने धर्म, दर्शन के कारण भारत विश्वगुरु कहलाया, क्या हम यह कहना छोड देंभारतीय जीवन मूल्य विश्व को सुख-शान्ति का संदेश देते थ, क्या हम उन्हें अपने ही देश में सर्वोच्च स्थान न दें?इन्हीं जीवन मूल्यों की रक्षा के लिए बालक हकीकत ने अपने प्राण दे दिए। इस संदर्भ में वीर हकीकत के भावों को आर्य उपदेशक श्री यशवन्तसिंह वर्मा ने इस प्रकार व्यक्त किया है-


पाठ गीता का भला जिसने कर लिया,


किस तरह वह तलावत (पाठ) करानी करें।


वेद उपनिषद् के ज्ञान को छोड़कर,


याद क्योंकर वह किस्से कहानी करें।


         छद्मरूप में स्वार्थ के लिए अपनाया गया उदारवाद सदा ही जाति एकता के लिए घातक होता है। अभी मायावती जी ने CAA को राष्ट्र की अखण्डता के लिए हानिकर बताया। मायावती जी ने पूछते हैं कि 'तिलक, तराजू और तलवार, इनको मारे जूते चार', यह नारा कहाँ से आया था? एक वर्ग विशेष में मनु महाराज के प्रति विष भरने का काम कहाँ से हुआ? किस शिक्षा के आधार पर हमारे राष्ट्र का एक वर्ग विशेष अपने को इस देश के मूल निवासी व दूसरे अपने ही भाइयों को बाहर से आया मानने लगा? क्या इस सबसे राष्ट्र की अखण्डता बनी रहती है?


        जब किसी विश्वविद्यालय में अफजल गुरु के समर्थन में नारे लगते हैं, भारत के टुकड़े करने की बात की जाती है तो न मिस्टर राहुल ही कुछ बोलते हैं और न ही मैडम सोनिया, दूसरी ओर यहीं पर CAA के विरोध को दोनों खूब हवा देते हैं। राष्ट्र ऐसे आत्मघाती प्रहारों को कैसे सहन करेगा? कश्मीरी पण्डितों के नरसंहार के बारे में ये कभी मुँह क्यों नहीं खोलते? मैडम सोनिया जी! अब समय आ गया है कि ऋषि-मुनियों की सन्तानों ने अपनी ही मातृभूमि पर अपनों की भूल के कारण मतान्ध उन्मादियों के हाथों जो अमानवीय पीड़ा सहन की हैं, उनकी वर्तमान पीढ़ी को न्याय मिले और अपनों की भूलों का हम प्रायश्चित्त करें।ये दोनों कार्य कश्मीरी पण्डितों को सम्मान, समृद्धि व सुरक्षापूर्वक कश्मीर में बसाना व पाकिस्तान से आए अपने शरणार्थी भाइयों के रोजगार, आवास व उनके बालकों की शिक्षा व्यवस्था करना। नेहरू के समय की भूल इस समय न हो पाए। नेहरू-लियाकत समझौते के समय नेहरू जी ने समझौते का फल यह बताया कि हजारों शरणार्थी अपने घरों को. लौट गए हैं। उस समय इसी बात को जानने आर्य सांसद श्री प्रकाशवीर शास्त्री व स्वामी अभेदानन्द जी डॉ० श्यामा प्रसाद मुखर्जी से मिलने गए। उस समय आँखों में आँस भरकर डॉ० मुखर्जी ने कहा कि ये वे हिन्दू लौट गए हैं जो भूखे मर रहे थे। कलकत्ता के फुटपाथों पर भूखे मरते उन लोगों ने सोचा कि जब मरना ही है तो पूर्वजों के घर जाकर मरेंडॉ० मुखर्जी ने कहा कि हमने इन्हें अपने घर नहीं भेजा, अपितु इस्लाम की भट्ठी में झोंक दिया है। यह कहकर डॉ० मुखर्जी रुमाल से आँस पूछने लगे और शास्त्री जी व स्वामी जी की आँखें भी डबडबा गई।


      अब तो पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों पर इतने अत्याचार बढ़ गए हैं कि शरणार्थी किसी हाल में जाने को तैयार नहीं हए। अभी हम दिल्ली में उनके मध्य में 'यज्ञ' करके उनकी दयनीय दशा देखकर आए। कुछ मदद भी की। वे किसी तरह हरिद्वार दर्शन के बहाने बीजा लगवाकर अपनी इज्जत, धर्म व जान बचाकर वहाँ से निकले। इस्लाम के नाम पर बसा पाकिस्तान भला अल्पसंख्यकों को क्यों बर्दाश्त करेगा? कभी पाकिस्तान के प्रधानमन्त्री मुहम्मद अली ने कहा था, "नेहरू जी का यह कहना भारत और पाकिस्तान की एक संस्कृति हैयह भ्रम पर आधारित हैपृथक संस्कृति के कारण ही पाकिस्तान बना है।''


      अरविंद केजरीवाल कहते हैं कि CAA से शरणार्थियों को नागरिकता मिलने से बेरोजगारी बढ़ेगी। क्या अनेक बच्चे पैदा करने से बेरोजगारी नहीं बढ़ती? वाह रे, भारत के भाग्य विधाता केजरीवाल ! काश, आपके अन्दर डॉ० मुखर्जी जैसा जज्बा होता तो इनके हिस्से की जमीन पाकिस्तान से लेने की बात करते। तुम्हारे जैसे नेताओं के बयान यदि अन्तर्विरोध उत्पन्न न करें तो POK भी शीघ्र हमारा हो जाए। धर्म की महत्ता देश के नेता अवश्य समझें। जो धर्म विश्व को सही दशा व दिशा में ले जा सकता है, उसी धर्म की रक्षा के लिए वीर बालक ने बलिदान दिया। शरीर के सुन्दर, कोमल लेकिन मन के दृढ़ उस बालक ने अपनी माँ के कहने पर भी धर्म त्याग नहीं किया। लाहौर के नाज़िम ने अपनी पुत्री से विवाह का लालच दिया, बालक ने ठुकरा दिया। सात्त्विक बालक को देखकर जल्लाद की तलवार 'हाथ से छूट गई । भारत माँ के शेर बालक ने अपने हाथों से तलवार उठाकर जल्लाद को दी। काजी के फतवे से वीर की गर्दन काट दी गई। फतवे ने इस्लाम के इतिहास में निर्दोष, पवित्र बालक की हत्या का अमिट काला अध्याय लिख दियाहे वीर हुतात्मा बालक! तेरा बलिदान देश के नेताओं में धर्म का मर्म भर देतेरा बलिदान इन्हें स्मरण करा दे कि शिवा, राणा, गुरु गोविन्दसिंह, गोकुला का संघर्ष किसलिए था?


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