आर्य

              


 


 


-आर्य आज अनार्य बन रहे


नहीं निज स्वरूप का ध्यान रहा,
हम क्या थे क्या हो रहे
कोई नहीं विचार रहा।


आर्य अनार्य सा आचरण कर रहे
अनाचार दुराचार सर्वत्र बढ़ रहा,
छल कपट मक्कारी सब सीख रहे
सच्चा ज्ञान कोई नहीं ले रहा।


सब भ्रष्टाचार बेइमानी कर रहे
कोई हरिश्चंद्र अब नहीं रहा,
सब अपनी ही झोली भर रहे
परोपकार कोई कोई ही कर रहा।


दूसरे को नीचा दिखा रहे
पीछे ढकेलने का चलन बढ़ रहा,
निज कर्तव्य निर्वहन कौन करे
आज आर्य स्वच्छंद विचर रहा।


देश सेवा, भक्ति भावना भूल रहे
हरेक मातृभूमि को लजा रहा,
अपने देश को नीचा दिखा रहे
जगह-जगह शाहिनबा़ग बन रहा।


सब मिल यही विचार रहे
स्वर्ग सा देश क्यों सिसक रहा,
कभी अच्छाईयों की मिसाल रहे
वो गौरव धूमिल क्यों हो रहा।


देर नहीं हुई अभी, क्यों बैठे रहें
नये सूर्योदय का प्रकाश कह रहा,
फिर से अच्छे कर्म करते रहें
बाँहें फैला अम्बर हमे अपना रहा।


               


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