स्वामी आत्मानन्द सरस्वती

स्वामी आत्मानन्द सरस्वती



      स्वामी आत्मानन्द जी सरस्वती आर्य समाज के महान विचारक तथा प्रचारक थे । आप का जन्म गांव अंछाड जिला मेरट उतर प्रदेश में संवत १९३६ विक्रमी तदानुसार सन १८७९ इस्वी को हुआ । आअपका नाम मुक्ति राम रखा गया । आपके पिता जी का नाम पं. दीनदयालु जी था । आपकी आरम्भिक शिक्शा मेरट में हुई तत्पश्चात उतम व उच्च शिक्शा के लिए आप को काशी भेजा गया ।


      आप बडे ही मेहनती प्रव्रति के थे । अत: आप ने काशी में बडी लग्न , बडी श्रद्धा व पुरुषार्थ से विद्याध्ययन किया । यहां रहते हुए आप ने व्याकरण व साहित्य के अध्ययन के साथ ही साथ वेदान्तिक दर्शनों का भी अध्ययन किया । यहां शिक्शा काल में ही आप आर्य समाज के सम्पर्क में आये । आप ने आर्य समाज के सम्पर्क में आने के पश्चात आर्य समाज के सिद्धान्तों का बडी बारिकी से चिन्तन मनन व अनुशीलन कर , इन सिद्दन्तों को आत्मसात किया ।


     काशी से अपनी शिक्शा पूर्ण कर आप रावल पिण्डी ( अब पाकिस्तान में ) आ गये तथा रावलपिण्डी के गांव चोहा भक्तां में उन दिनों जो गुरुकुल चल रहा था , उस में अध्यापन का कार्य करने लगे । इस गुरुकुल की आपने लम,बेर समय तक सेवा की तथा यहाम पर सन १९१६ से४ सन १९४७ अर्थात देश के विभाजन काल तक आप इस गुरुकुल के आचार्यत्व को सुशोभित करते रहे ।


      आप को सब लोग पण्डित मुक्ति राम के नाम से ही अब तक जानते थे किन्तु शीघ्र ही आप ने संन्यास लेने का मन बनाया तथा इसे कार्य रुप देते हुए संन्यास ले कर अपना नाम स्वामी आत्मा राम रख लिया ।


       देश के विभाजन के पश्चात जब पाकिस्तान का हिन्दु , सिक्ख तथा आर्य समुदाय भारत आने लगा तो आप भी रावलपिण्डी से भारत आ गये तथा यमुनानगर (हरियाणा) को आपने अपना केन्द्र बना लिया । आप आरम्भ से ही पुरुषार्थी व मेहनती थे । यह आप के पुरुषार्थ का ही परिणाम था कि रावल पिण्डी का गुरुकुल बडे ही उतम व्यवस्था के साथ चलता रहा तथा भारत आने पर भी आप के मन में एक उतम गुरुकुल चलाने की उत्कट इच्छा शक्ति बनी हुई थी । अत: इस विचार पर कार्य करते हुए आप ने यमुना नगर में वैदिक साधना आश्रम की स्थापना की  तथा इस आश्रम के अन्तर्गत उपदेशक विद्यालय आरम्भ किया ।


     आप के अथक प्रयत्न का ही परिणम था कि यमुना नगर का उपदेशक विद्यालय कुछ काल में ही आर्य समाज की श्रोमणी संस्थाओं में गिना जाने लगा तथा इससे पटकर निकलने वाले उच्चकोटि के विद्वानों की एक लम्बी पंक्ति दिखाई देने लगी । गुरुकुल कांगडी महाविद्यालय के वेद विभाग के पूर्व अध्यक्श आचार्य स्वर्गीय सत्यव्रत जी राजेश भी इस विद्यालय की ही देन थे ।


     आप की लगन , आपके रिषि मिशन से लगाव को तथा आप की आर्य समाज के प्रचार व प्रसार की लगन को देखते हुए आप को आर्य प्रतिनिधि सभा पंजाब का प्रधान भी नियुक्त किया गय । आप ने अपने पुरुषार्थ से आर्य समाज्के कार्य को भर पूर प्रगति दी । इन्हीं दिनों पंजाब में हिन्दी आन्दोलन का भी निर्नय हुआ । आपको इस आन्दोलन की बागदॊर सौंपी गयी तथा यह पूरा व सफ़ल आन्दोलन आप ही के नेत्रत्व में लडा गया ।


     यह रीषि का सच्चा भक्त जीवन प्रयन्त आर्य समाज के प्रचार व प्रसार में लगा रहा तथा अन्त में जब वह किसी कार्य वश गुरुकुल झज्जर गये हुए थे , अक्स्मात दिनांक १८ दिसम्बर १९६० इस्वी को उनका देहान्त हो गया ।


 


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