संसार के निरामिषभोजी महापुरुष

संसार के निरामिषभोजी महापुरुष



जगद् गुरु श्री शंकराचार्य (शारदा पीठ, द्वारिका) 


        यह अत्यन्त दुःख की बात है कि संसार की युवक पीढ़ी और विशेषकर हिन्दू युवक वर्ग पवित्र शाकाहार को छोड़ता जा रहा है और मांसाहार की ओर प्रवृत्त हो रहा है, जो हिन्दुत्व नहीं है । वह मानव का धर्म नहीं है । इसलिये हम सब को सावधान करते हैं और उपदेश देते हैं कि मानवमात्र को विशेष रूप से हिन्दुओं को शपथ लेनी चाहिये, प्रतिज्ञा करनी चाहिये कि हम शुद्ध शाकाहार ही करेंगे और मांस कभी नहीं खायेंगे । इस शपथ को सद्व्यवहार में लाना ।


श्री जगद् गुरु शंकराचार्य (श्रृंगेरी मठ) 


          शाकाहार ने केवल शरीर को ही शुद्ध रखता है बल्कि आत्मा को भी शुद्ध पवित्र करता है । यह सार्वभौम स्वीकृत सिद्धान्त है कि शाकाहार ही सब राष्ट्रों और जातियों को अधिक स्वस्थ और सुखी करने वाला है ।


श्री जगद् गुरु शंकराचार्य (बद्रिकाश्रम) 


         अब संसार शुद्ध शाकाहार के महत्त्व को समझने लगा है । क्योंकि शुद्ध सात्त्विक आहार मानसिक, शारीरिक और आत्मिक उन्नति का एकमात्र कारण है । यही स्वास्थ्य, शक्ति और पवित्रता को देता है ।


श्री जगद् गुरु कामाकोठी पीठ 


         मनुष्यों में पूर्ण शक्ति और सुख की प्राप्ति के लिये वातावरण का निर्माण शुद्ध शाकाहार ही करता है ।


सन्त विनोबा भावे 


        मानव को शीघ्रातिशीघ्र इस निष्कर्ष पर अवश्य पहुंचना है कि शाकाहार ही सब भोजनों में श्रेष्ठतम भोजन है, जो शक्ति प्रदान करता है ।


योरूप के महान् ईसाई सन्त बासिल (३२०-३७६ ई०) 


        यदि मानव मांसाहार का परित्याग कर दे तो सब प्राणियों के प्राण बच जायेंगे । उनका व्यर्थ में खून नहीं बहेगा । भोजन की मेजों पर प्रचुर मात्रा में फलों के ढ़ेर लग जायेंगे, जो प्रकृति ने प्रभूत मात्रा में उत्पन्न किये हैं, और सर्वत्र शान्ति ही शान्ति हो जायेगी ।


ईसाई सन्त जेरोमे (Saint Jerome) (३४०-४२० ई०) 


         ईसा मसीह हमें मांस खाने की अब आज्ञा नहीं देता । यह बहुत ही अच्छा है कि कभी मांस नहीं खाना चाहिये, न कभी शराब-मद्यपान करना चाहिये – “Jesus Christ today does not permit us to eat flesh according to Apostle (Rom XV-21). It is good never to drink wine and never to eat flesh.”


St. Augustine (354-430 ई०) 


        Bishop of HIPPO in Africa says – not only abstain from flesh, wine, but also quotes “That is good never to eat meat and drink wine when by doing so we scandalize our brothers.”


कोन्स टेंटी नोपल का आर्कबिशप क्राइसोस्टोम Chrysostom 


        लिखता है – रोटी और जल को छोड़कर मद्य मांस का कोई सेवन नहीं करता था – No streams o fblood are among them, no but cheering and cutting of flesh. Nor are there the horrible smells of flesh meats among them. Or disagreeable fumes from kitchen. No tumult and disturbance and scarisome clamours, but bread and water.


पीथागोरस (Pythagoras – 570-470 ईसा पूर्व) 


        यह योरुप का एक बहुत बड़ा दार्शनिक, गणितज्ञ और संगीत विद्या का भी बहुत बड़ा विद्वान् था । उसने कभी मांस और मद्य का सेवन नहीं किया । वह शाक, सब्जी और रोटी ही खाता था ।


योरुप के कवि


        अंग्रेज कवि सामुयल टेलर कॉलरिज (Samuel Taylor Coleridge – 1772-1834) लिखता है – “He prayeth best who loveth best. Both man and bird and beast for the dear God who loveth us. He made and loveth all.”


       अर्थात् जो व्यक्ति मनुष्य, पक्षी और पशुओं अर्थात् सब प्राणियों से बहुत अधिक प्रेम करता है, वही भगवान् का सच्चा भक्त व उपासक है । जो प्रिय प्रभु के लिये हम सबसे प्रेम करता है, वही यथार्थ में सबका प्रेमी है ।


       अमेरिका के हेनरी वाड्सवर्थ लोंगफैलो लिखते हैं – “मैं उस व्यक्ति को सबसे अधिक वीर मानता हूँ जो किसी बड़े नगर में बिना पक्षपात और भय के मित्रहीन पशुओं का मित्र बनकर उनकी सेवा और सुरक्षा, प्राणरक्षार्थ डटकर खड़ा रहता है ।”


      अंग्रेज कवि जोहन विल्टन कहता है – “जो हिंसा से अन्य प्राणियों के प्राण लेते हैं, वे भी अग्नि, बाढ़, दुर्भिक्ष आदि के द्वारा नष्ट हो जायेंगे । मांस और मदिरापान से भूमि पर अनेक प्रकार के भयंकर रोग फैल जायेंगे । राष्ट्रहित के लिये लिखने वाला लेखक शुद्ध जल और शाकाहार पर ही निर्वाह करता है ।”


       इसी प्रकार अंग्रेज कवि विलियम वर्डसवर्थ, विलियम शेक्सपीयर, परसी वेशी शैले और विलियम कोपर आदि सभी ने मद्य मांस के सेवन का अपने कविताओं और लेखों में सर्वथा निषेध किया है । विस्तार से उनके पृथक् उदाहरण नहीं दे रहा हूँ ।


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