पाखण्डियों के लक्षण


        पाखण्डियों के लक्षण


 


धर्मध्वजी सदा लुब्धश्छंद्मीको लोकदम्भक:।
वैडालव्रतिको ज्ञेयो हिंस्त्रः सर्वाभिसन्धक:।।
अधोदृष्टिनैष्कृतिक: स्वार्थसाधन तत्पर:।
शठो मिथ्याविनितश्च वकव्रतचरो द्विज:।।   "मनु स्मृति"
अर्थात:- धर्म कुछ भी न करे परन्तु धर्म के नाम से लोगों को ठगे, सर्वदा लोभ से युक्त, कपटी, संसारी मनुष्यों के सामने अपनी बड़ाई के गपोड़े मारा करे, प्राणियों का घातक, अन्यों से वैरबुद्धि रखनेवाले को बिलाव के समान धूर्त और नीच समझो।  
कीर्ति के लिए नीचे दृष्टि रखे, किसी ने उसका रत्तीभर भी अपराध कर दिया हो उससे बदला लेने के लिए प्राण तक लेने को तैयार रहे चाहे उसके लिए उसके साथ कपट, अधर्म और विश्वासघात ही क्यों न करना हो, अपना प्रयोजन साधने में चतुर, चाहे अपनी बातें कितनी भी  झूठ क्यों न हो परन्तु हठ कभी न छोड़े, झूठ मूठ ऊपर से शील, सन्तोष और साधुता दिखावे उसको बगुले के समान नीच समझो।  ऐसे ऐसे लक्षणों वाले पाखंडी होते हैं उनका विश्वास व सेवा कभी न करें।।  
       सन्दर्भ: सत्यार्थ प्रकाश
  
         ✍🏽आचार्य धर्मराज


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