नेताजी सुभाषचन्द्र बोस

नेताजी सुभाषचन्द्र बोस



       जिन लोगों ने देश की स्वतन्त्रता के लिए अपना सर्वस्व यहाँ तक कि प्राण तक न्यौछावर कर दिए, हम लोगों में से अधिकतर लोग उनके विषय में, दुर्भाग्य से, बहुत कम जानते हैं। नेताजी सुभाषचन्द्र बोस भी उन महान सच्चे स्वतन्त्रता संग्राम सेनानियों में से एक हैं जिनके बलिदान का इस देश में सही आकलन नहीं हुआ क्योंकि आज़ादी के तुरंत बाद हुए सत्ताधीशों ने कभी चाहा ही नहीं कि उनके अलावा ये देश और किसी को आज़ादी की लड़ाई का सिपाही समझे। देखा जाए तो अपनी महान हस्तियों के विषय में न जानने या बहुत कम जानने के पीछे दोष हमारा नहीं बल्कि हमारी शिक्षा का है जिसने हमारे भीतर ऐसा संस्कार ही उत्पन्न नहीं होने दिया कि हम उनके विषय में जानने का कभी प्रयास करें।


       होश सम्भालने बाद से ही जो हमसे “महात्मा गांधी की जय”, “चाचा नेहरू जिन्दाबाद” जैसे नारे लगवाए गए हैं उनसे हमारे भीतर यह गहरे तक पैठ गया है कि देश को स्वतन्त्रता सिर्फ गांधी जी और नेहरू जी के कारण ही मिली। हमारे भीतर की इस भावना ने अन्य सच्चे स्वतन्त्रता संग्राम सेनानियों को उनकी अपेक्षा गौण बना कर रख दिया। हमारे समय में तो स्कूल की पाठ्य-पुस्तकों में यदा-कदा “खूब लड़ी मर्दानी वो तो झाँसी वाली रानी थी…”, “अमर शहीद भगत सिंह” जैसे पाठ होते भी थे किन्तु आज तो वह भी लुप्त हो गए हैं। ऐसी शिक्षा से कैसे जगेगी भावना अपने महान हस्तियों के बारे में जानने की?


       खैर, यहाँ बात करेंगे आज़ादी की लड़ाई के सबसे बड़े सेनानायक नेता जी सुभाष चन्द्र बोस की जिनका जन्म 23 जनवरी 1897 को उड़ीसा में कटक के एक संपन्न बंगाली परिवार के मशहूर वकील पिता जानकीनाथ बोस और माता प्रभावती के यहाँ हुआ था। प्रभावती और जानकीनाथ बोस की कुल मिलाकर 14 संतानें थी, जिसमें 6 बेटियाँ और 8 बेटे थे। सुभाष चंद्र उनकी नौवीं संतान और पाँचवें बेटे थे। नेताजी ने अपनी प्रारंभिक पढ़ाई कटक के रेवेंशॉव कॉलेजिएट स्कूल में हुई। तत्पश्चात् उनकी शिक्षा कलकत्ता के प्रेज़िडेंसी कॉलेज और स्कॉटिश चर्च कॉलेज से हुई और बाद में भारतीय प्रशासनिक सेवा (इण्डियन सिविल सर्विस) की तैयारी के लिए उनके माता-पिता ने बोस को इंग्लैंड के केंब्रिज विश्वविद्यालय भेज दिया। अँग्रेज़ी शासन काल में भारतीयों के लिए सिविल सर्विस में जाना बहुत कठिन था किंतु उन्होंने सिविल सर्विस की परीक्षा में चौथा स्थान प्राप्त किया परन्तु उन्होंने देश सेवा हेतु इसमें शामिल होना उचित नहीं समझा और भारत लौट कर वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में शामिल हो गए।


       सक्रिय राजनीति में आने से पहले नेताजी ने पूरी दुनिया का भ्रमण किया और वह 1933 से 36 तक यूरोप में रहे। यूरोप में यह दौर था हिटलर के नाजीवाद और मुसोलिनी के फासीवाद का जिसका निशाना इंग्लैंड था, जिसने पहले विश्वयुद्ध के बाद जर्मनी पर एकतरफा समझौते थोपे थे। वे उसका बदला इंग्लैंड से लेना चाहते थे। भारत पर भी अँग्रेज़ों का कब्जा था और इंग्लैंड के खिलाफ लड़ाई में नेताजी को हिटलर और मुसोलिनी में भविष्य का मित्र दिखाई पड़ रहा था क्योंकि वो इस सिद्धांत पर यकीन करते थे कि दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है। उनका मानना था कि स्वतंत्रता हासिल करने के लिए राजनीतिक गतिविधियों के साथ-साथ कूटनीतिक और सैन्य सहयोग की भी जरूरत पड़ती है।


       वापस लौटकर सुभाष बाबू कांग्रेस की राजनीति में सक्रिय हो गए। वो गाँधी जी का युग था और कांग्रेस में वही होता था जो गाँधी जी चाहते थे पर सुभाष की अपनी एक अलग विचारधारा थी और वो गाँधी के अहिंसा के विचारों से सहमत नहीं थे इसलिए उन दोनों के बीच मतभेद होने लगे। 1938 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का अध्यक्ष निर्वाचित होने के बाद एक बार फिर से 1939 में सुभाष गाँधी जी के प्रबल विरोध के बाबजूद उनके उम्मीदवार पट्टाभि सीतारमैय्या को हराकर कांग्रेस के अध्यक्ष बने, पर गाँधी जी ने इसे अपनी हार की तरह लिया और कांग्रेस कार्यसमिति में भरे अपने समर्थकों के दम पर वह स्थिति उपन्न कर दी कि सुभाष को अध्यक्ष पद से त्यागपत्र देना पड़ा। पर यह सुभाष बाबू की महानता ही थी कि अपनी राह में कांटे बिछाने वाले गाँधी जी को उन्होंने हमेशा सम्मान दिया और सबसे पहले उन्हें राष्ट्रपिता कह कर संबोधित किया।


       त्यागपत्र देने के बाद सुभाष बाबू नें कांग्रेस के अंतर्गत फॉरवर्ड ब्लॉक के नाम से अपनी पार्टी की स्थापना की पर कुछ दिन बाद ही उन्हें कांग्रेस छोडनी पड़ी और फॉरवर्ड ब्लॉक अपने आप में एक स्वतंत्र पार्टी बन गयी जो पश्चिम बंगाल में आज भी कुछ प्रभाव रखती है। द्वितीय विश्वयुद्ध शुरू होने से पहले से ही, फॉरवर्ड ब्लॉक ने स्वतंत्रता संग्राम अधिक तीव्र करने के लिए जनजागृति शुरू की, इसलिए अंग्रेज सरकार ने सुभाषबाबू सहित फॉरवर्ड ब्लॉक के सभी मुख्य नेताओ को कैद कर दिया। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान सुभाषबाबू जेल में निष्क्रिय रहना नहीं चाहते थे इसलिए सरकार को उन्हें रिहा करने पर मजबूर करने के लिए सुभाषबाबू ने जेल में आमरण उपोषण शुरू कर दिया। तब सरकार ने उन्हे रिहा तो कर दियापर उनके ही घर में नजरकैद कर के रखा पर वह अपने भतीजे शिशिर कुमार बोस की सहायता से वहां से भाग निकले और वह अफगानिस्तान और सोवियत संघ होते हुए जर्मनी जा पहुंचे।


       बर्लिन में सुभाष बाबू जर्मनी के कई नेताओं से मिले और 29 मई, 1942 के दिन एडॉल्फ हिटलर से उनकी मुलाक़ात हुयी लेकिन सुभाषबाबू को जल्दी ही समझ आ गया कि हिटलर और जर्मनी से उन्हे कुछ और नहीं मिलने वाला है इसलिए वे वहां से पूर्व एशिया के देशों की तरफ निकल गए। जापान से मदद का आश्वासन हासिल कर सुभाषबाबू ने सर्वप्रथम वयोवृद्ध क्रांतिकारी रासबिहारी बोस से भारतीय स्वतंत्रता परिषद का नेतृत्व सँभाला। 21 अक्तूबर, 1943 के दिन नेताजी ने सिंगापुर में अर्जी-हुकुमत-ए-आजाद-हिंद (स्वाधीन भारत की अंतरिम सरकार) की स्थापना की तथा 'आज़ाद हिन्द फ़ौज' का गठन किया। वे खुद इस सरकार के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और युद्धमंत्री बने और आज़ाद हिन्द फ़ौज के प्रधान सेनापति भी। इस सरकार को कुल नौ देशों ने मान्यता दी। नेताजी अपनी आजाद हिंद फौज के साथ 4 जुलाई 1944 को बर्मा पहुँचे और यहीं पर उन्होंने अपना प्रसिद्ध नारा “तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा” दिया।


       आज़ाद हिन्द फौज ने जापानी सेना के सहयोग से भारत पर आक्रमण किया और अंग्रेजों से अंदमान और निकोबार द्वीप जीत लिए जो अर्जी-हुकुमत-ए-आजाद-हिंद के अनुशासन में रहें। नेताजी ने इन द्वीपों का शहीद और स्वराज द्वीप ऐसा नामकरण किया। दोनो फौजो ने मिलकर इंफाल और कोहिमा पर भी आक्रमण किया परन्तु प्रारंभिक सफलताओं के बाद अंग्रेजों का पलड़ा भारी पड़ने लगा और दोनो फौजो को पीछे हटना पडा। जापानी सेना ने नेता जी के वहां से निकलने की व्यवस्था की और कहा जाता है कि 18 अगस्त 1945 को तोक्यो जाते समय ताइवान के पास नेताजी की हवाई दुर्घटना में मृत्यु हो गई, लेकिन उनका शव नहीं मिल पाया।


       नेताजी की मौत के कारणों पर आज भी विवाद बना हुआ है और एक बहुत बड़ा वर्ग ऐसा है जो ये मानता है कि नेता जी आज़ादी के बाद बहुत समय तक जीवित रहे। 18 अगस्त, 1945 के दिन नेताजी कहाँ लापता हो गए और उनका आगे क्या हुआ, यह भारत के इतिहास का सबसे बडा अनुत्तरित रहस्य बन गया हैं। देश के अलग-अलग हिस्सों में आज भी नेताजी को देखने और मिलने का दावा करने वाले लोगों की कमी नहीं है। फैजाबाद के गुमनामी बाबा से लेकर छत्तीसगढ़ के रायगढ़ तक में नेताजी के होने को लेकर कई दावे हुये हैं लेकिन इनमें से सभी की प्रामाणिकता संदिग्ध है। प्रख्यात पत्रकार अनुज धर की हालिया प्रकाशित पुस्तक Back from Dead: Inside the Subhash Bose Mystery में इस रहस्य पर से पर्दा उठाने की कोशिश करते हुए सरकारी दस्तावेजों की मदद से नेता जी से सम्बंधित प्रश्न का उत्तर देने का प्रयास किया गया है । सच जो भी हो पर एक बात अटल सत्य है कि नेता जी हम सबके हृदयों में सदैव जीवित रहेंगे और हमें प्रेरणा देते रहेंगे। कोटि कोटि नमन एवं विनम्र श्रद्धांजलि ।



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