मुंशी केवल कृष्ण





     आर्य समज के आरम्भिक विद्वनों को आर्य समज के सिधान्तों तथा ऋषि  दयानन्द  जी के विचारों पर पूरी आस्था थी । इस का यह तात्पर्य नहीं  कि आज एसे विद्वान नहीं मिलते किन्तु यह सत्य है कि उस समय के विद्वान बिना किसी किन्तु परन्तु के आर्य समाज के लिए कार्य करते थे तथा सिधान्त से किंचित भी न हटते थे । एसे ही विद्वानों , एसे ही दीवानों में मुन्शी केवल कृष्ण जी भी एक थे । मुन्शी जी का जन्म मुन्शी राधाकिशन जी के यहां अश्विन पूर्णिमा १८८५ विक्रमी तद्नुसार सन १८२८ इस्वी को हुआ । इन की विरासत पटियाला राज्य के गांव छत बनूड से थी । भाव  यह है कि इन के पूर्वज बनूड के निवसी थे । परिस्थितिवश मुसलमनी शासन कल में  यह रोहतक आ कर रहने लगे ।


     उस काल में मुसलमानी प्रभाव से हमारे हिन्दु लोगो में भी अनेक बुराइयां आ गई थीं । एसी ही बुराईयों के मुन्शी जी भी गुलाम हो गये थे । यह बुराईयां जो मुन्शी जी ने अपना रखी थीं , उनमें मांसाहार करना, मदिरा पान करना । इस सब के साथ ह साथ यह वैश्गयामन तक भी करने लगे थे ।


     इन बुराईयों में फ़ंसे मुन्शी जी पर एक चमत्कार हुआ । हुआ यह कि इन दिनों ही स्वामी द्यानन्द सरस्वती का पंजाब में आगमन हुआ । । इन दिनों मुन्शी जी शाहपुर मे मुन्सिफ़ स्वरुप कार्य कर रहे थे । मुन्शी जी ने स्वामी जी के उपदेश सुने । इन उपदेशों पर मनन चिन्तन करने पर इन का मुन्शी जी पर अत्यधिक प्रभाव हुआ । वह स्वामी जी के उपदेशों से धुलकर शुद्ध हो गये । स्वामी  जी के प्रभाव से उन्होंने मांसाहार का सदा के लिए त्याग कर दिया , मदिरा के बर्तन उटा कर फ़ैंक दिये तथा भविष्य मे इस बुराई को भी अपने पास न आने देने का संकल्प लिया तथा वैश्यागमन , जो कि से  बडी बुराई मानी जती है , उसे भी परित्याग कर दिया । इस प्रकार स्वांमी जी के प्रभाव से मुन्शी जी शुद्ध व पवित्र हो गये ओर आर्य समाजी बन गये ।


      जब कोई व्यक्ति भयानक बुराईयों को छोड कर सुपथ गामी बन जता है तो लोगो मे उस का आदर स्त्कार बट जाता है, उस की ख्यति दूर दूर तक जती है तथा जिस सधन से उसने यह दोष त्यागे होते हैं , अन्य लोग भी उसका अनुगमन करते हुए उस  पथ के पथिक बन जाते हैं । हुआ भी कुछ एसा ही ।


      मुन्शी जी  ने अपने आप को आर्य समाज के सिद्धान्तों के साथ खूब टाला तथा इन्हे अपने जीवन का अभिन्न अंग बना लिया । आप ने यत्न पूर्वक उर्दू में परंगकता प्राप्त की तथा अपने समय के उर्दू के उ च्च कोटि के कवि बन गये । आप ने आर्य समाज के सिद्धान्तो व मन्तव्यों के प्रचार के लिए अनेक कवितायें लिखीं ।


     मुन्शी जी अनेक वर्ष आर्य समाज गुजरांवाला के प्रधान भी रहे । आप के ही प्रभाव  से आप के भाई नारायण  कृष्ण भी  आर्य समाज को समर्पित हो गए तथा आप के सुपुत्र  कर्ता  कृष्ण भी अपने पिता  के अनुगामी बन कर आर्य समाज के सदस्य बन गए । जिस परिवार में कभी बुराईयों के कारण सदा कलह क्लेश रहता था , वह परिवार आज उत्तमता का ,स्वर्गिक आनंद का एक उदाहरण था  ।


      जब लाहोर में डी.ए.वी कालेज की स्थापना हुई , उस समय इस संस्था को चलाने के लिए धन का आभाव सा ही रहता था । इस कमीं के दिनों में आपने कालेज के सहयोगी स्वरूप एक भारी धनराशी इसे सहयोग के लिए अपनी और से दी ।


     आप उर्दु के सिद्ध हस्त कवि थे किन्तु आर्य समाज मे प्रवेश से पूर्व आप ने प्रचलित परम्परा को अपनाते हुए श्रंगारिक रचनायें ही लिखीं किन्तु आर्य समाज में प्रवेश के साथ ही जहां आप ने अपने जीवन की अनेक बुराईयों का त्याग किया  , वहां अपने काव्य को भी नया रूप दिया आप ने अब शृंगार रस को सदा के लिये त्याग दिया तथा इस के स्थान पर शान्त रस को अपना लिया । अब शान्त रस के माध्यम से आप उर्दू मे काव्य की रचना करने लगे । आप ने अपने काव्य में जो विशेष शब्द , जिन्हें तखलुस कहते हैं , वह उर्दू में ” उर्फ़” होता था जब कि हिन्दी मे ” केवल ” होता था ।


     मुन्शी जी ने आर्य समाज के प्रचार प्रसार में अपनी लेखनी का भी खूबह सहारा लिया तथा अनेक पुस्तकें भी लिखी तथा  दिसम्बर १९०९ को इस जीवन लीला को समप्त कर चल बसे ।ध्यान मंजूम,आर्यभिविनय मंजूम, आर्य विनय पत्रिका ,संगीत सुधाकर, भजनमुक्तवली,इन पुस्तकों के अतिरिक्त कुछ एसी पुस्तकें भी लिखीं जो मांसहर आदि दुर्व्यस्नों तथा इन के परिणम स्वरुप होने वले झगडों आदि पर भी प्रकाश दलती हैं । एसी पुस्तकों में विचर पत्र, राजेसरबस्ता,हारेसदाकत या जबाबुलजुबाब आदि ।


      इस प्रकर जीवन प्रयन्त  आर्य समाज की सेवा करने वाला यह दीवाना आर्य समज की सेवा करते हुए अन्त में १५ दिसम्बर १९०९ इस्वी को इस चलायमान जगत से चल बसा ।



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