मृत्यु से जीवन

मूसा और एलिया में बहुत सी बातें समान थीं। दोनों ने ४० दिन का उपवास रखा था। दोनों ने आश्चर्य कर्म किए थे। दोनों ही शक्तिशाली और दुष्ट शासकों के सामने उपस्थित हुए थे। दोनों होरेब पर्वत् पर परमेश्वर से मिले थे। यीशु के रुप परिवर्तन के समय पर्वत् पर दोनों ही यीशु के साथ दिखे थे।


दोनों ने ही अवान्छित रुप से अपनी मृत्यु के लिये प्रार्थना की थी। १ राजा १९ में हम पढते हैं, “और आप जंगल में एक दिन के मार्ग पर जा कर एक झाऊ के पेड़ के तले बैठ गया, वहां उसने यह कह कर अपनी मृत्यु मांगी कि हे यहोवा बस है, अब मेरा प्राण ले ले, क्योंकि मैं अपने पुरखाओं से अच्छा नहीं हूँ” (१९:४)। गिन्ती ११:१५ में मूसा ने प्रार्थना की, “और जो तुझे मेरे साथ यही व्यवहार करना है, तो मुझ पर तेरा इतना अनुग्रह हो, कि तू मेरे प्राण एकदम ले ले, जिस से मैं अपनी दुर्दशा न देखने पाऊं”।


योना, अय्यूब और यिर्मयाह ने भी इसी प्रकार की प्रार्थनायें की थीं जब वे विभीन्न प्रकार की समस्याओं में घिरे थे।


जहाँ तक मैं समझता हूँ, प्रार्थना सभाओं में इस प्रकार की प्रार्थना नहीं की जातीं, लेकिन तब न ही वहाँ मूसा और एलिया जैसे व्यक्ति होते हैं।


इस प्रकार की प्रार्थना करने पर क्या हुआ? क्या परमेश्वर ने उन्हें उत्तर दिया? परमेश्वर ने मूसा से कहा, “इस्त्राएली पुरनियों में से सत्तर ऐसे पुरूष मेरे पास इकट्ठे कर,.... और जो आत्मा तुझ में है उस में से कुछ ले कर उन में समवाऊंगा”। परमेश्वर ने एलिया को भी ऐसा ही उत्तर दिया, “यहोवा ने उस से कहा, लौटकर दमिश्क के जंगल को जा, ....और अपने स्थान पर नबी होने के लिये आबेलमहोला के शापात के पुत्र एलीशा का अभिषेक करना”। बाद में एलिया की आत्मा एलिशा पर आ गया।


यह अद्भूत बात है कि उनकी प्रार्थनाओं के उत्तर में परमेश्वर ने उनकी आत्माओं को लेकर ऐसे व्यक्तियों पर उँडेल दिया जो इनके काम को लेकर आगे बढ सकें।


पराने करार में अन्य कोई भी व्यक्ति ऐसा नहीं था जो अपनी आत्मा को दूसरों के उपर उँडेल सके। परमेश्वर के और लोगों ने भी बडे बडे काम किये, लेकिन कोई भी उत्तराधिकारी नहीं हुआ जो इनके द्वारा आरम्भ किये गये काम को आगे बढा सके। इसीलिये पुराने कारार में अधिकांश घटनायें असफलता की कहानियाँ बनीं। महान् भविष्यवक्ता, याजक या राजा, किसी के भी द्वारा आरम्भ किये गये अच्छे कामों को आगे बढाने वाला कोई नहीं था।


पुराने करार के समय यह एक समस्या थी, और मूसा और एलिया ने भी अपनी आत्मा को सिर्फ अपने पुस्ता में हीं अपने उत्तराधिकारियों पर उँडेल सके थे। लेकिन नये करार के समय इसमें बडा अन्तर था। यीशु ने मूसा और एलिया की तुलना में बहुत बडा काम किया था। उन्होंने अपनी मृत्यु के लिये सिर्फ प्रार्थना ही नहीं की, लेकिन वे वास्तव में मरे और अपने पिता के पास वापस गये। अपने पिता के सिंहासन से वह अपनी आत्मा उँडेलने में सक्षम बने। और यह उँडेला जाना सिर्फ एक उत्तराधिकारी या केवल एक पुस्ता के लिये सिमित नहीं था, लेकिन पतरस के इन शब्दों के अनुसार, “तुम पवित्र आत्मा का दान पाओगे। क्योंकि यह प्रतिज्ञा तुम, और तुम्हारी सन्तानों, और उन सब दूर दूर के लोगों के लिये भी है जिन को प्रभु हमारा परमेश्वर अपने पास बुलाएगा” (प्रेरित २:३८-३९)।


इस प्रकार यीशु ने अपने उत्तराधिकारियों को भविष्य के सभी पुस्तों के लिये नियुक्त कर दिया, ताकि उनके द्वारा आरम्भ किये गये काम को वे आगे बढा सकें। यह काम उन्हें कैसे करना था? उनकी अपनी शक्ति से नहीं, परन्तु उस आत्मा को ग्रहण करके जो यीशु में था। यीशु के द्वारा किये गये काम अन्य कोई भी नहीं कर सकता था या इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि यीशु की आत्मा को ग्रहण किये बिना कोई भी यीशु के सदृश नहीं हो सकता।


लेकिन मूसा और एलिया के द्वारा किये गये प्रार्थनाओं से हम एक और पाठ सिख सकते हैं। किस अवस्था में वे अपनी आत्मा अपने उत्तराधिकारियों पर उँडेल सकते थे? जब वे अपनी क्षमता के अन्तिम छोर पर पहुँच चुके थे। जब हम अपनी शक्ति से करने लायक काम के अन्त में पहुँच चुके हों, तभी हम परमेश्वर की शक्ति का अनुभव कर सकते हैं। यह हमारी दक्षता नहीं है, न ही हमारा मनोहर व्यक्तित्व, हमारी लिखने और प्रवचन करने की शक्ति, हमारी शिक्षा या और कोई वरदान, इनमें से कोई भी चीज हमें परमेश्वर के काम करने की शक्ति नहीं देता। धर्मशास्त्र बाइबल का ग्यान भी नहीं। ऐसा तभी हो सकता है जब हम अपने शरीर और अपने धन सम्पत्ति के लिये मर चुके हों, तब हम पवित्र आत्मा के काम लायक उपयोगी बर्तन बन सकते हैं।


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