मत्तगयन्द सवैया

||मत्तगयन्द सवैया ||


मोह निशा अभिशाप अखंडित, आहट हीन विकार बसेरा !
शूल अनेक छिपी वसुधा रज , अंकुर का नव चेतन फेरा !
तुंग तने तम पर्वत भीतर , स्वप्न अनंत विहंगम घेरा !
संबल स्निग्ध मिला गुरु पावन, पीर मिटी सब जाग सवेरा !!


प्यास सदैव बढ़े इस जीवन, दस्यु समान भविष्य बिगारे!
नीच कृतघ्न मनोरथ में रत , स्वार्थ भरा चित लाभ विचारे !
स्नेह कहाँ सुख वैभव शासन, नित्य अशांत विश्रृंखल हारे !
दिव्य तरंग भरे उर भीतर, सिंधु सुधा गुरु देव हमारे !!


छगन लाल गर्ग 'विज्ञ'!


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