मण्डूकों का वेद-गान

मण्डूकों का वेद-गान 


संवत्सरंशशयानाः, ब्राह्मणा व्रतचारिणः।


वाचं पर्जन्यजिन्विता, प्रमण्डूका अवादिषुः॥


ऋषिः मैत्रावरुणिः वसिष्ठः । देवता मण्डूका । छन्दः अनुष्टुप् ।


(संवत्सरं) वर्ष-भर (शशयानाः) (अपने-आपको ज्ञान से) तीक्ष्ण करते हुए, (ब्राह्मणा:) वेद का अध्ययन करनेवाले, (व्रतचारिणः) ब्रह्मचारी (मण्डूकाः) मण्डूक-तुल्य ब्रह्मचारी (पर्जन्य-जिन्वितां) पर्जन्य या आचार्य से प्रेरित (वाचं) वाणी को (अवादिषुः) बोल रहे हैं।


                                                                वर्षा की सुहानी ऋतु आई है। ताल-सरोवर वर्षा-जल से भर गये हैं। वर्ष-भर से जो व्रतधारी ब्राह्मणों के समान मौन धारण कर भूमि के अन्दर बिलों में सोये पड़े थे, वे मेंढक पर्जन्य से प्रीत वाणी बोल रहे है। आकाश में बादलों का रौरवगान, भूमि पर वर्षा का रिम-झिम संगीत, और सरोवरों में मेंढकों का समूह गान हो रहा है। दादुर-धुनि ऐसे लग रही है। मानों वटु-समुदाय मिलकर सस्वर वेदपाठ कर रहा हो। सचमुच वेदपाठी ब्रह्मचारी भी तो मण्डूक होते हैं। मेंढक वर्षा-जल में मज्जन करते हैं, ब्रह्मचारी ज्ञानजल में। मेंढक वर्षा-जल से मुदित और तृप्त होते हैं, ब्रह्मचारी ज्ञान-वर्षा से । मेंढकों की त्वचा मण्डित होती है, ब्रह्मचारी का आत्मा। मेंढकों का सरोवर-गृह कमल-पुष्पों से मण्डित होता है, ब्रह्मचारी का गुरुकुल-गृह वेद की ऋचाओं से।


                     प्राचीन काल में वर्षा ऋतु में ही वेदाध्ययन आरम्भ किया जाता था। श्रावणी पूर्णिमा का वेदपाठ का उपाकर्म करके साढ़े चार या पांच मास बाद उत्सर्जन होता था। इस काल में विशेष रुप से वेदाध्ययन ही होता था। वर्ष के शेष मासों में इस काल में पठित वेद की पुनरावृत्ति तथा वेदांगों का अध्ययन चलता था। एवं वर्षभर जो वेदपारायण तथा वेदांगों के अध्ययन से स्वयं को ज्ञान से तीक्ष्ण करते रहे हैं और ब्रह्मचर्याश्रम के व्रतों का पालन करते रहे हैं, वे मण्डूक-ब्रह्मचारी ज्ञानवर्षी-पर्जन्य-आचार्य से तथा वर्षाऋतु के पर्जन्य से प्रेरित वेदवाणी का उच्चारण कर रहे हैं, सस्वर वेदपाठ तथा वेदार्थ का अध्ययन कर रहे हैयज्ञशाला में मुखरित होती हुई इन मण्डूकों की वाणी सुनकर श्रोताओं के हृदय में अपूर्व उल्लास का अनुभव हो रहा है, इनकी ऋचाओं से गूंजती हुई दिशाएँ स्वर्गीय सुख और शान्ति को प्रतिध्वनित कर रही है। हे मण्डूक बटुओं! हे वेद के गायकों! अपना यह सुरीला वेद-गान सदा ही गाते रहो।


 


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