मानव की शरीर रचना और भोजन

मानव की शरीर रचना और भोजन



         संसार में अनेक प्रकार के जीव देखने में आते हैं, जिनके भोजनों में विभिन्नता है । ध्यान से देखने पर पता चलता है कि भोजन की विभिन्नता के अनुसार ही उनकी शरीर रचना में भी विभिन्नता है ।


 


१. फलाहारी जीव


     बन्दर, गुरिल्ला आति कन्द फूल ही खाते हैं ।


 १ : इनके दाँत चपटे, एक दूसरे से मिले हुए और उनकी दाढ़ भोजन की पिसाई का कार्य करने योग्य होती है ।


२ : इनके जबड़े छोटे, तीनों ओर, सब ओर हिल सकने वाले अर्थात् ऊपर-नीचे, दायें-बायें, इधर-उधर हिलने वाले होते हैं ।


३ : ये घूंट भरकर जल पीते हैं ।


४ : शरीर के भाग हाथ पैर में गोल नखों वाली अंगुलियां होती हैं ।


५ : इनके पेट में अन्तड़ियां इनके शरीर की लम्बाई से बारह गुणी लम्बी होती हैं ।


 


२. वनस्पति खाने वाले जीव


     घास-फूस आदि वनस्पति खाने वाले गाय, भैंस एवं घोड़ा आदि हैं ।


१. : इनके दांत चपटे, मिले हुए, किन्तु थोड़ी-थोड़ी दूर पर लगे हुए होते हैं । इनके जबड़े पिसाई-कुटाई करने के सर्वथा अयोग्य होते हैं ।


२. : जबड़े लम्बे तथा ऊपर-नीचे और इधर-उधर दायें-बायें हिलने वाले होते हैं ।


३. : ये घूंट भरकर जल पीते हैं ।


४. : इनके गोल नखदार खुर होते हैं ।


५. : इनके पेट की अन्तड़ियां अपने शरीर की अपेक्षा तीस गुणा लम्बी होती हैं ।


 


३. मांसाहारी जीव


     जो केवल मांस खाते हैं उनमें शेर, चीता, भेड़िया आदि हैं ।


१. : इनके दांत लम्बे, नोक वाले, थोड़ी-थोड़ी दूर पर और दाढ़ें आरे के समान चीरने वाली होती हैं । जबड़े लम्बे तथा एक ओर (आगे को) कैंची के समान हिलने वाले होते हैं ।


२. : ये जीभ से जल पीते हैं तथा पीते समय लप-लप की आवाज सुनाई पड़ती है ।


३. : इनके हाथ-पाँव लम्बे, पंजे नोकदार नखों वाले होते हैं ।


४. : इनके पेट की अन्तड़ियां अपने शरीर की लम्बाई की अपेक्षा तीन गुनी लम्बी होती हैं ।


 


४. मिश्रितभोजी जीव


               कुछ जीव दोनों प्रकार का मिला जुला भोजन करने वाले होते हैं, जैसे कुत्ता, बिल्ली आदि । इनके शरीर की रचना भी प्रायः मांसाहारी जीवों से मिलती जुलती है ।


 
























































































































































































































































































मांसाहारी और निरामिषभोजी जीवों में अन्तर



मांसाहारी



शाकाहारी


           
१. रात को जागना और दिन में छिपकर रहना ।१. रात को विश्राम करना और दिन में जागना ।           
२. तेजी और बेचैनी का होना ।२. तेजी और बेचैनी का न होना ।           
३. अपना भोजन बिना चबाये निगल जाते हैं ।३. अपना भोजन चबा-चबाकर खाते हैं ।           
४. दूसरों को सताना और मारकर खाना ।४. दयाभाव और दूसरे पर कृपा करना ।           
५. अधिक परिश्रम के समय थकावट शीघ्र होती है और अधिक थक जाते हैं, जैसे शेर, चीता, भेड़िया आदि ।५. सन्तोष, सहनशीलता और परिश्रम से कार्य करना तथा अधिक थकावट से दूर रहना जैसे घोड़ा, हाथी, उंट, बैल आदि ।           
६. मांसाहारी एक बार पेट भरकर खा लेते हैं और फिर एक सप्ताह वा इस से भी अधिक समय कु्छ नहीं खाते, सोये पड़े रहते हैं ।६. मनुष्य दिन में अनेक बार खाता है । घास और शाक सब्जी खाने वाले प्राणी दिन भर चरते, चुगते और जुगाली करते रहते हैं ।           
७. मांसाहारी जीवों के चलने से आहट नहीं होती ।७. अन्न और घास खाने वालों के चलने से आहट होती है ।           
८. मांसाहारी प्राणियों को रात के अंधेरे में दिखायी देता है ।८. अन्न और घास खाने वालों को रात के अंधेरे में दिखायी नहीं देता ।           
९. मांसाहारी जीवों की अन्तड़ियों की लम्बाई अपने शरीर की लम्बाई से केवल तीन गुणी होती है ।९. फलाहारी जीवों की अन्तड़ियों की लम्बाई अपने शरीर की लम्बाई से बारह गुणी तथा घास फूस खाने वाले प्राणियों की अन्तड़ियां उनके शरीर से तीस गुनी तक होती हैं ।           
१०. चलने फिरने से शीघ्र हांफते हैं ।११. दौड़ने से भी नहीं हांफते ।           
११. मांसाहारी प्राणियों के वीर्य में बहुत अधिक दुर्गन्ध आती है ।११. अन्न खाने वाले तथा शाकाहारी प्राणियों के वीर्य में साधारणतया अधिक दुर्गन्ध नहीं आती ।           
१२. मांसाहारी प्राणियों के बच्चों की आंखें जन्म के समय बन्द होती हैं जैसे शेर, चीते, कुत्ते, बिल्ली आदि के बच्चों की ।१२. अन्न तथा शाकाहारी प्राणियों के बच्चों की आंखें जन्म के समय खुली रहती हैं जैसे मनुष्य, गाय, भेड़, बकरी आदि के बच्चों की ।           
१३. मांसाहारी जीव अधिक भूख लगने पर अपने बच्चों को भी खा जाते हैं (फिर मांसाहारी मनुष्य इस कुप्रवृति से कैसे बच सकता है ?) जैसे सर्पिणी, जो बहुत अण्डे देती है, अपने बच्चों को अण्डों से निकलते ही खा जाती है । जो बच्चे अण्डों से निकलते ही भाग दौड़ कर इधर-उधर छिप जाते हैं, उनसे सांपों का वंश चलता है ।१३. सब्जी खाने वाले प्राणी चाहे मनुष्य हों अथवा पशु, पक्षी, भूख से तड़फ कर भले ही मर जायें किन्तु अपने बच्चों की ओर कभी भी बुरी दृष्टि से नहीं देखते । सांप के समान मांसाहारी मनुष्य आदि दुर्भिक्ष में ऐसा कर्ते देख गये हैं कि वे भूख में अपने बच्चे को भून कर खा गये ।           
१४. बिल्ली बिलाव से छिपकर बच्चे देती है और इन्हें छिपाकर रखती है । यदि बिलाव को बिल्ली के नर बच्चे मिल जायें तो उन्हें मार डालता है । मादा (स्त्री) बच्चों को छोड़ देता है, कुछ नहीं कहता । इसी प्रकार पक्षियों में तीतरी भी छिपकर अण्डे देती है । यदि नर तीतर अण्डों पर पहुंच जाये तो वह नर बच्चों के अण्डे तोड़ डालता है, मादा अंडों को रहने देता है । बिच्छू के बच्चे माता के ऊपर चढ़ जाते हैं । माता को खा कर बच्चे पल जाते हैं, माता मर जाती है ।१४. शाकाहारी प्राणियों में न माता बच्चों को खाती है, न पिता बच्चों को मारता है । न बच्चे माता-पिता को मार कर खाते हैं ।           
१५. मांसाहारी जीवों के घाव देरी से अच्छे होते हैं और ये अन्न वा शाक खाने वाले प्राणियों की अपेक्षा बहुत अधिक संख्या में घाव के कारण मरते हैं ।१५. निरामिषभोजी शाकाहारी जीवों के घाव बहुत शीघ्र अच्छे हो जाते हैं और मांसाहारियों की अपेक्षा कम मरते हैं ।           
१६. पक्वाशय (मेदा) बहुत सरल (सादा) जो बहुत तेज भोजन को बड़ा शीघ्र पचाने के योग्य होता है । जिगर अपने शरीर के अनुपात से बहुत बड़ा और इसमें पित्त बहुत अधिक होता है । मुंह में थूक की थैलियां बहुत छोटी, स्वच्छ जिह्वा, बच्चे को दूध पिलाने के स्तन पेट में । ये आगे की ओर तथा सब ओर देखते हैं१६. पक्वाशय (मेदा) चारा खाने वाला, जिसमें बहुत हल्की खुराक को धीरे धीरे पचाने के गुण हैं । जिगर अपने शरीर की अपेक्षा बहुत छोटा होता है । जिह्वा स्वच्छ, बच्चे को दूध पिलाने के स्तन छाती पर और प्राअणी साधारणतया आगे को देखते हैं और बिना गर्दन मोड़े इधर-उधर नहीं देख सकते ।           
१७. मांसाहारी पशु पक्षिओं को नमक की तनिक भी आवश्यकता नहीं होती । इन्हें बिना नमक के कोई कष्ट नहीं होता ।१७. शाकाहारी प्राणी और मनुष्य सामान्य रूप से नमक खाये बिना जीवित नहीं रह सकते वा जीवन में कठिनाई अनुभव करते हैं ।           


 

          इससे निष्कर्ष यही निकलता है कि मनुष्य की शरीर रचना तथा उपर्युक्त गुण, कर्म, स्वभावानुसार मनुष्य का स्वाभाविक भोजन माँस कदापि नहीं हो सकता । क्योंकि मनुष्य के शरीर की रचना भी उन प्राणियों से मिलती है जो अन्न, फल, शाक आदि खाते हैं । जैसे बन्दर, गोरेल्ला आदि, किन्तु मांसाहारी शेर, चीते, भेड़िया आदि से नहीं मिलती । बन्दर के शरीर की रचना और मनुष्य के शरीर की रचना परस्पर बहुत मिलती है, इसमें समता है । हाथ पैरों की समता और शरीर के दूसरे अंग, विशेषकर अन्तड़ियां पूर्णतया मनुष्य के समान हैं । मनुष्य की अन्तड़ियों की लम्बाई जिनमें से होकर भोजन पचते समय जाता है, घुमाव खाती हुई ३३ फुट के लगभग होती है । यद्यपि मांसाहारी जीवों की अन्तड़ियों में घुमाव तनिक भी नहीं होता । उनकी अन्तड़ियां लम्बी अथवा सीधी थैली सी होती हैं ।

 


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