क्रान्तिकारियों के प्रेरणास्त्रोत एवं मार्गदर्शक पं. रामप्रसाद बिस्मिल

भारत देश का इतिहास क्रान्ति ज्वाला से सदैव जाज्वल्यमान रहा है। क्रान्ति की मशाल थामने वाले नव युवकों का निर्माण और मातृभूमि पर न्यौछावर होने की भावना भरना आर्य समाज के गौरवपूर्ण इतिहास की स्वर्णिम परम्परा रही है। भारतीय क्रान्तिदल के अमर सेनापति तथा क्रान्तिकारियों के प्रेरणास्त्रोत एवं मार्गदर्शक पं. रामप्रसाद “बिस्मिल' का अमर बलिदान इसी दिसम्बर मास की 19वीं तारीख को सन् 1927 ई. में हुआ था, जब क्रूर अंग्रेजी सरकार ने उन्हें गोरखपुर की जेल में और उनके अभिन्न मित्र श्री अश्फाकउल्ला खाँ को फैजाबाद में फाँसी पर चढ़ा दिया था। बिस्मिल जी का व्यक्तित्व विकास आर्य समाज तथा आर्य कुमार सभा की छत्रछाया में हुआस्वामी सोमदेव जी की प्रेरणा और प. गेंदालाल जी दीक्षित जैसे स्वनाम धन्य देश भक्तों की संगति ने आपको परम आस्तिक और आजीवन देशहित में कार्य करने की प्रेरणा प्रदान की। पण्डित जी पूरी तरह भारत माता के लिए समर्पित जीवन जीते रहे और आमरण भारतीय क्रान्तिकारी दल के मार्गदर्शक बने रहेविविध गुणों से सम्पन्न बिस्मिल जी एक अच्छे कवि भी थे। अपनी एक कविता में उन्होंने स्वयं लिखा है।


यदि देशहित मरना पड़े मुझको सहस्त्रों बार भी, तो भी न इस दुःख को निज ध्यान में लाऊँ कभी, हे ईश! भारत वर्ष में शतबार मेरा जन्म हे, कारण सदा ही मृत्यु का देशोपकारक कर्म हो। भारत माता की दासता की बेड़ियों को काटने तथा जनता को देश सेवा के लिए सशिक्षित करने की उनकी योजना थी जिसे वे आजीवन करते रहे। जनता की प्रवृत्ति देश सेवा की हो. उनमें देश के लिए बलिदान होने की भावना होशोषण और अत्याचार भ्रष्टाचार के साथ-साथ भारत की परतन्त्रता समाप्त हो यह उनकी हार्दिक इच्छा थी। कर अंग्रेजों द्वारा दी गई सजा से न तो वह निराश थे न ही भयभीत। क्योंकि देश सेवा का व्रत उन्होंने बहत सोच विचारकर लिया था। अपना कर्तव्य बोध और ईश्वरीय न्याय ਜੇ ਚ जनन या व्यवस्था पर उनका पूर्ण आस्था था। फासा क तख्त पर ल जान वाल लाग जब आए ता वह "वन्द मातरम्" और "भारत माता का जय' के नारे लगाते हुए गये। उस समय उन्होंने एक कविता पढ़ी:


मालिक तेरी रजा रहे और तू ही तू रहे, बाकी न मैं रहूं-न मेरी आरजू रहे। तब तक कि तन में जान रंगों में लहू रहे, तेरा ही जिक्र या, तेरी जुस्तजु रहे॥


फाँसी के समय उन्होंने ईश्वर की विशेष प्रार्थना की तथा “विश्वानि देवसतिर्दुरितानि..." आदि मन्त्रों का पाठ करते हुए वे गोरखपुर की जेल में फांसी के फन्दे पर झूल गयेबिस्मिल जी के फाँसी पर चढ़ने के दृश्य का वर्णन करते हुए शहीदे-आजम भगत सिंह ने लिखा है.... फिर ईश्वर के आगे प्रार्थना की और फिर एक मन्त्र पढ़ना शुरु किया। रस्सी खींची गई। रामप्रसाद जी फाँसी पर लटक गएआज वह वीर इस संसार में नहीं है। उसे अंग्रेजी सरकार ने अपना खौफनाक दुश्मन समझा। आम ख्याल यह है कि का संवा वह इस गुलाम देश में जन्म लेकर भी एक बड़ा भारी बोझ बन गया था और लड़ाई की विद्या से खूब परिचित था। आपको मैनपुरी षड्यन्त्र के नेता श्री गेंदा लाल दीक्षित जैसे शूरवीर ने विशेषतौर पर शिक्षा देकर तैयार किया था। मैनपुरी के मुकदमें के समय आप भागकर नेपाल चले गये थे। अब वही शिक्षा आपकी मृत्यु का एक कारण बन गई। 7 बजे आपकी लाश मिली और बड़ा भारी जुलूस निकला। स्वदेश प्रेम में आपकी माता ने कहा-"मैं अपने पुत्र की इस मृत्यु पर प्रसन्न हूँ दु:खी नहीं। मैं श्री रामचन्द्र जैसा ही पुत्र चाहती थी। बालो श्री रामचन्द्र की जय।" पाठको! जो जाति अपने बलिदानियों और देश भक्तों को कृतज्ञता पूर्वक स्मरण नहीं करती, उसका विनाश सनिश्चित होता है और वह कभी संकट से मुक्त नहीं हो सकती। आज की युवा पीढ़ी मातृभूमि के लिए समर्पित इन महान् क्रान्तिकारियों की भावना उददेश्य और कार्यशैली से परिचित होकर इनसे की प्रेरणा लेकर प्राण पण से उददेश्य प्राप्ति हेत लगे यही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगीउनका अपूर्ण कार्य तभी पूर्ण होगा। आज केवल पात्र बदल गए हैं, नाटक जारी है। आवश्यकता है कि आज की युवा शक्ति उन्हीं क्रान्तिकारियों के समान भ्रष्टाचार अन्याय, उत्पीड़न और शोषण के विरूद्ध अपनी पूरीक्षमता से लड़कर लक्ष्य प्राप्ति करे तभी शहीदों की आत्मा को शान्ति और . सद्गति मिलेगी।


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