कैसे बनाए बच्चों को सृजनशील 1

        वास्तविकता यह है कि आज न तो घर में और न स्कूल में ही ऐसा वातावरण है जहां बच्चों की सृजनात्मक शक्ति का विकास हो सके। स्कूलों में किताबी सूचनाएँ ढूंस-ठूस कर बच्चों के मन मस्तिष्क में भरी जाती है। अधिकतर स्कूलों में खेलकूद एवं अन्य पाठ्य सामग्री क्रियाओं का पूर्ण अभाव देखा जाता है। करके सीखने के सिद्धान्त केवल किताबों में ही सीमित रह गए हैं। विज्ञान-शिक्षा जो पूर्णतया प्रायोगिक ज्ञान पर ही आधारित है, वहां भी सैद्धान्तिक ज्ञान ही अधिक दिया जाता है। विज्ञान के उपकरण और प्रयोगशालाओं का पूर्ण अभाव देखा जा रहा है। जहां ये चीजें हैं भी वहां प्रशिक्षित शिक्षक का अभाव है। यही कारण है कि इक्कीसवीं सदी की दहलीज पर पहुंचे इस देश में अभी भी अधिकतर अन्धविश्वास का बोलबाला है। भूतप्रेत अभी भी यहां डेरा जमाए बैठे हैं। जाति-पाति जैसे दकियानूसी और सड़ीगली परम्पराएँ दिन दूनी रात चौगुनी रफ्तार से फल फूल रही है। बच्चों की जिज्ञासाओं के स्वस्थ समाधान के लिए साहित्य की भूमिका महत्वपूर्ण है । लेकिन दुर्भाग्यवश आज हिन्दी क्षेत्र में बाल-साहित्य को दोयम दर्जे पर रखा जा रहा है। स्तरीय साहित्यकार बाल साहित्य लिखना अपनी तौहीन समझते हैं। जो कुछ साहित्य लिखा भी जा रहा है वह या तो बच्चों के स्तर से ऊपर का है या अवैज्ञानिक है। कामिक्स बच्चों में आज तेजी से लोकप्रिय हो रहे हैं। लेकिन कामिक्स की घटनाएं और चमत्कार ही छाये हए हैं। कामिक्स में जो कहानियां लिखी होती है उनका व्यवहारिक जीवन से कोई सरोकार नहीं होता। फलतः ऐसे कामिक्स बच्चों के कोमल मस्तिष्क के विकास के बजाय उसमें विक्रति ही पैदा करते हैं।


       खेलकूद एक ऐसा माध्यम है जिससे बच्चों का शारीरिक और मानसिक विकास बहुत अच्छा और स्वाभाविक ढंग से होता है। लेकिन दुर्भाग्यवश हमारे बच्चों में बहुत कम को ऐसा वातावरण प्राप्त है। स्कूलों में यद्यपि खेल के लिए अलग से शिक्षक जरुर रखे जाते हैं लेकिन खेल को परीक्षा में अत्यधिक महत्व नहीं दिया जाता। जिससे बच्चे खेल को उतनी वरीयता नहीं देते जितनी कि पाठ्यक्रम को। छोटे बच्चों के लिए सरकारी स्कूलों में तो छोटे खेल के मैदान होते हैं। लेकिन कुकुरमुत्ते की तरह उग आए नर्सरी स्कूलों में खेल के मैदान या खेलकूद के वातावरण का तो कोई सवाल ही नहीं। अभिभावक या समाज की दृष्टि में जो स्कूल जितना ही अच्छा माना जाता है वहीं खेलकूद की उतनी ही उपेक्षा होती है। वास्तव में यह बहुत ही गम्भीर बात है। ये ही कुछ मूल कारण है जिनके कारण ओलपिक जैसी विश्वस्तरीय खेल स्पर्धाओं में हमारा देश शून्य से आगे नहीं बढ़ पाता। बालक ही देश के भावी निर्माता व कर्णधार होते हैं तथा उनके ऊपर ही देश का भविष्य निर्भर होता है, अतएव उनमें विभिन्न प्रकार की रचनात्मक-प्रवृत्तियां उत्पन्न कर उनकी सृजन-क्षमता का विकास करना परमावश्यक माना गया है। इस सृजन-क्षमता के विकास का दायित्व बालकों के अभिभावकों एवं अध्यापकों पर होता है। अभिभावकों की भूमिका का प्रतिपादन इसलिये किया गया कि बालक चौबीस में १८ घंटे उन्हीं के सम्पर्क में रहता है। शेष छः घण्टे वह अध्यापकों के सान्निध्य में गुजारता है। इस प्रकार अध्यापक की अपेक्षा तीन गुना अधिक समय वह अभिभावक को देता है। इसीलिए सृजन-प्रतिभा के विकास में अभिभावक का योगदान महत्वपूर्ण माना गया है। कुछ न कुछ सृजन-क्षमता प्रत्येक बालक के संस्कार में होती है। आवश्यकता केवल उसके विकास की पड़ती है। अपनी रुचि का विषय होने के कारण बालक उस विषय में दिये गये ज्ञान को शीघ्र आत्मसात् करलेता है क्योकि उस विषय में उसकीसृजन-क्षमता विकासोन्मुखी होती है। कुशल शिक्षक बालक की रुचि एवं उसकी प्रकृति प्रदत्त प्रतिभा का पूर्ण लाभ उठाते हुए तदनुकूल उसकी सृजन-क्षमता का विकास करता है। रुचि एवं प्रकृति के प्रतिकूल सृजन के विकास का यत्न करना ऊसर भूमि में बीज बोने के समान ही है। इस यत्न में न तो शिक्षक को सफलताप्राप्त होती है, न ही बालक को .


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