वैदिक सिद्धान्त

स्वामी दयानन्द के वैदिक सिद्धान्त को संक्षेप में इस प्रकार समझा जा सकता है-'वेद' शब्द का अर्थ ज्ञान है। यह ईश्वर का ज्ञान है इसलिए पवित्र एवं पूर्ण है। ईश्वर का सिद्धान्त दो प्रकार से व्यक्त किया गया है-



  1. चार वेदों के रूप में, जो चार ऋषियों (अग्निवायुसूर्य एवं अगिंरा) को सृष्टि के आरम्भ में अवगत हुए।

  2. प्रकृति या विश्व के रूप में, जो वेदविहित सिद्धान्तों के अनुसार उत्पन्न हुआ। वैदिक साहित्य-ग्रन्थ एवं प्रकृति-ग्रन्थ से यहाँ साम्य प्रकट होता है। स्वामी दयानन्द कहते हैं, 'मैं वेदों को स्वत: प्रमाणित सत्य मानता हूँ। ये संशयरहित हैं एवं दूसरे किसी अधिकारी ग्रन्थ पर निर्भर नहीं रहते। ये प्रकृति का प्रतिनिधित्व करते हैं, जो ईश्वर का साम्राज्य है।' वैदिक साहित्य के आर्य सिद्धान्त को यहाँ संक्षेप में दिया जाता है-



  • वेद ईश्वर द्वारा व्यक्त किये गये हैं जैसा कि प्रकृति के उनके सम्बन्ध से प्रमाणित है।

  • वेद ही केवल ईश्वर द्वारा व्यक्त किये गये हैं क्योंकि दूसरे ग्रन्थ प्रकृति के साथ यह सम्बन्ध नहीं दर्शाते।

  • वे विज्ञान एवं मनुष्य के सभी धर्मों के मूल स्रोत हैं।


आर्य समाज के कर्तव्यों में से सिद्धान्त दो महत्त्वपूर्ण हैं:-



  1. भारत को (भूले हुए) वैदिक पथ पर पुन: चलाना और

  2. वैदिक शिक्षाओं को सम्पूर्ण विश्व में प्रसारित करना।


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