इतिहास

‘त्रिएक परमेश्वर’ का सिद्धांत नए नियम के समय में आरम्भ नहीं हुआ था। आश्चर्य की बात है यह यीशु के समय से बहुत पहले शुरू हुआ था। सुमेरियन, बेबीलोनियन, भारतीय, यूनानी और मिस्रवासी के सभी देवताओं की त्रिदेव के सिद्धांत थे! (इसके बारे में अधिक जानकारी के लिए वेबसाइट Ancient Trinitarian Gods को देखें।) इनमें से अधिकांश धर्मों का दावा था कि उनके तीन देवता त्रिएक थे।


बेबीलोन की त्रिमूर्ति में निम्रोद, सेमिरमिस और तमुज़ शामिल थे, जो पिता, माता और पुत्र थे। हिंदू त्रिमूर्ति में ब्रह्मा, विष्णु और शिव शामिल थे। अन्य प्राचीन धर्मों में समान त्रिदेव थे।


न तो यीशु और न ही उनके प्रेरितों ने ‘त्रिएक परमेश्वर’ के सिद्धांत को सिखाया। जैसा कि हमने देखा है कि यह पुराने नियम या नए नियम में कहीं नहीं दिखाई देता है।


त्रिएक परमेश्वर के सिद्धांत ने सम्राट कॉन्सटेंटाइन के समय तक धीरे-धीरे जड पकडा। उन्होंने घोषणा की कि ईसाई धर्म रोमन साम्राज्य का राष्ट्रीय धर्म होगा, और इसी अवधी में कलीसिया ने बुतपरस्त त्योहारों, बुतपरस्त इमारतों और कई अन्य बुतपरस्त प्रथाओं को अपनाना शुरू कर दिया। क्या यह संयोग था कि इसी समय कलीसिया ने आधिकारिक तौर पर त्रिएक परमेश्वर के सिद्धांत को अपनाया था? कुछ समय बाद में यही कलीसिया का केंद्रीय सिद्धांत बन गया।


अन्य धर्मों में पिता और पुत्र और माता देवता थे, लेकिन त्रिएक परमेश्वर के तीसरे व्यक्ति के लिए कलीसिया के पास कोई स्पष्ट विकल्प नहीं था; इसलिए ऐसा प्रतीत होता है कि कलीसिया ने पवित्र आत्मा को यह भूमिका दी।


यहां हमें एक महत्वपूर्ण प्रश्न पूछना चाहिए। क्या पेंतीकोस के दिन से लेकर कॉन्स्टेंटाइन के समय तक या वर्तमान समय तक या बीच में किसी अन्य बिंदु तक सत्यता के ज्ञान में कलीसिया लगातार बढ़ता गया? या कुछ बिंदु पर कलीसिया ने अंधेरे और त्रुटि में एक नीचे ओर जाने लगी? क्या त्रिएक परमेश्वर का सिद्धांत परमेश्वर प्रदत्त शुद्ध सत्य था? या यह बुतपरस्ती के रास्ते पर नीचे की ओर एक और कदम था?


यदि बाईबलीय भाषा का उपयोग करें तो, क्या त्रिएक परमेश्वर का सिद्धांत यीशु के वादे की परिपूर्ति था (यूहन्ना १६:१३) कि पवित्र आत्मा विश्वासियों को सभी सत्यता में मार्गदर्शन करेगा? या यह पॉलुस की भविष्यवाणी ‘ब्रिहत् स्वधर्मत्याग’ की परिपूर्ति का हिस्सा था (२थिस। २:३)?


कॉन्स्टेंटाइन शासनकाल में त्रिएक परमेश्वर के सिद्धान्त में विश्वास व्यक्तिगत विश्वास का मुख्य आधार बन गया। कौन वास्तविक ईसाई है और कौन नहीं है, इसी विश्वास पर निर्भर करता था। कोई भी जो त्रिएक परमेश्वर में विश्वास व्यक्त नहीं करता था उसे विधर्मी का ठप्पा लगा देते थे।


यह स्थिति तब से लेकर आज तक जारी है। त्रिएक परमेश्वर में अविश्वास के लिए दिए जाने वाले दंड सदियों से निधारित हैं जो विविध हैं। कई बार दोषी को प्रमुख राष्ट्रीय कलीसिया से निस्कासन कर दिया जाता है। कुछ केसों में दोषियों को जीवित जला दिया जाता है। वर्तमान अवस्था में त्रिएक परमेश्वर पर विश्वास करने वाली कलीसिया से ऐसा विश्वास नहीं करने वाले दोषी को किसी भी आधिकारीक पद से निस्काशित कर दिया जाता है।


त्रिएक परमेश्वर के सिद्धांत का बहुत बुरा इतिहास रहा है!


हमें एक और प्रश्न पूछना चाहिए: विश्वास की सच्ची पारख क्या है? क्या यह त्रिएक परमेश्वर के सिद्धांत का मौखिक समर्थन है? यीशु ने कैसी परीक्षा दी? “सच में, मैं तुमसे कहता हूं, जब तक कोई पानी और आत्मा से पैदा नहीं होता, वह परमेश्वर के राज्य में प्रवेश नहीं कर सकता” (यूहन्ना ३:५))। पौलुस ने क्या कहा? “जिस किसी के पास मसीह की आत्मा नहीं है वह उसका नहीं है” (रोम ८:९)। और यूहन्ना के शब्दों में: “जिसके पास पुत्र है उसके पास जीवन है; जिसके पास परमेश्वर का पुत्र नहीं है उसके पास जीवन नहीं है” (१यूहन्ना ५:१२)। ये विश्वास की असली पहचान हैं।


सदस्यता के लिए मानव संगठन मानवीय परीक्षणों का उपयोग करते हैं। एक उम्मीदवार क्या कहकर अपना विश्वास व्यक्त करता है? लेकिन परमेश्वर की सच्ची कलीसिया एक मानव संगठन नहीं है । “मनुष्य ( और अधिकांश कलीसिया) तो बाहर का रूप देखता है, परन्तु परमेश्वर की दृष्टि मन पर रहती है।” (१शमूएल १६:७)।


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