गुलाम-ए-मुस्तफ़ा

गुलाम-ए-मुस्तफ़ा 



      अहमदिया मुस्लिम ज़मात के संस्थापक मिर्ज़ा गुलाम अहमद कादियानी ने खुद को पहले नबी घोषित किया फिर कहा कि हिन्दू और बौद्ध ग्रंथों में वर्णित कल्कि अवतार और अमिताभ मैत्रेय भी मैं ही हूँ। हौसला बढ़ा तो आगे जाकर ये भी कह दिया कि जिस जीसस के दुबारा आने की बात बाईबल में है वो भी मैं ही हूँ। खुद को नबी, अवतार बताने के दावे करने वाले तो कुकुरमुत्ते की तरह रोज़ पैदा होते रहतें हैं इसलिये चिंता इस बात से नहीं है पर मिर्ज़ा गुलाम अहमद की हरकत यहीं पर नहीं रुकी।


      अपनी किताब 'सतवचन' में उन्होंने लिख दिया कि सिख पंथ प्रवर्तक गुरु नानक देव एक सच्चे मुसलमान थे और उनकी गुरुग्रन्थ साहिब और कुछ नहीं बल्कि कुरान-शरीफ की ही व्याख्या है। अपने इस दावे को मिर्ज़ा गुलाम अहमद ने पूरे पंजाब में फैला दिया। मिर्ज़ा गुलाम अहमद के दावों से पंजाब का सिख समाज बड़े परेशान हो गये. वो सबके सब इस बात से चिंतित थे कि अगर हमारे प्रवर्तक गुरु ही मुसलमान थे तो फिर हम सब सिख भी मुसलमान ही हुए। 


       इसी उहापोह में वहां सिख समाज के कुछ लोग आर्य समाज के पास गये कि गुरु नानक देव जी के बारे में जो सत्य है उसे उद्घाटित करिये। आर्य समाज ने पंडित लेखराम से कहा कि वो फिरोजपुर शहर में एक सार्वजनिक सभा आयोजित करें और वहां गुरु नानकदेव जी के बारे में जो सत्य है उसे उद्घाटित करें। 


      रात में एक बड़ी सार्वजनिक सभा हुई और आर्य समाजी पंडित लेखराम ने गुरू नानक देव जी के पक्ष में प्रमाणों की झड़ी लगा दी, वो कई घंटे तक बोलते रहे और मिर्ज़ा गुलाम अहमद के बकवासों की धज्जियाँ उड़ा कर रख दी। डावांडोल मन के साथ जी रहा अपना सिख समाज आनंदित हो उठा, सबके मन से ये संशय दूर हो गया कि बाबा गुरु नानक देव मुसलमान थे। 


     जब पंडित लेखराम भाषण देकर नीचे उतरे तो सिख फौजियों में उन्हें कंधे पर उठाने के लिये हंगामा बरपा हो गया। सारी रात उनके नाम के जय-जयकारे लगते रहे।


     उस समय तो पंडित लेखराम थे जिन्होंने अलगाववादियों के दुष्प्रचार से हमारे सिख समाज को बचा लिया था पर उनके बाद इस काम को करने का बीड़ा उठाने वाला कोई था नहीं इसलिये सिख समाज फिर इस षड्यंत्र में फँस गया, जिसके नतीजे में खालिस्तान नाम का जिन्न वजूद में आया।


      आपको कई बार ताज्जुब होता होगा कि सिख गुरुओं पर हुए इतने भीषण अत्याचारों को और विभाजन के समय अपने साथ हुई क्रूरताओं को भूल कर कुछ सिख खालिस्तान जैसी अलगाववादी सोच कैसे रख सकतें हैं तो इसके मूल में अहमदियों का गुरु नानक देव जी के बारे में किया गया दुष्प्रचार है। अहमदियों के दुष्प्रचार ने कुछ सिखों को ये समझा दिया था कि तुम और तुम्हारे गुरु तो इस्लाम के ज्यादा करीब थे और ये हिन्दू तो गंदे लोग हैं जिन्होंनें तुम्हारे पवित्र पंजाब और अमृतसर पर कब्ज़ा किया हुआ है, इनसे छुटकारा चाहिये तो अलग खालिस्तान बनाओ हम यानि पाकिस्तान तुम्हारे साथ हैं। अहमदी तो खैर पाकिस्तान की तलपट से गायब हो गये पर उनका फार्मूला आईएसआई ने हाथों-हाथ लिया और भारत को भिंडरावाले जैसे कई ज़ख्म दिये।


       किसी ज्ञानी ने कहा है कि समस्या से आप तब तक नहीं लड़ सकते जब तक आपको समस्या की मूल वजह पता न हो। खालिस्तान समस्या के मूल में अहमदियत और उसके प्रवर्तक की वो किताब है जिसने कुछ सिखों को अलगाववाद सिखाया। 


     गुरु नानक देवजी जो को अहमदियों के चौथे ख़लीफ़ा मिर्ज़ा ताहिर अहमद ने कई बार एक मुस्लिम फ़कीर और वलीउल्लाह बताया है; जिस विचार को अहमदियों से तमाम घृणाओं के बाबजूद शेष पाकिस्तान, वहाँ के हुक्मरान और ISI ने चुरा लिया है। 


       कल पवित्र ननकाना साहिब पर हुई पत्थरबाजी के बाद उस जगह का नाम का नाम बदलकर "गुलाम-ए-मुस्तफ़ा" यानि "नबी का गुलाम" करने की मानसिकता और माँग का सच यही है।


       अब ऐसे में "मियाँ मीर' वाले झूठ के साथ जी रहे और उनके साथ एकात्मकता की पींगे बड़ा रहे अलगाववादी नेताओं को सोचना है कि गुरु महाराज जी को गुलाम-ए-मुस्तफ़ा घोषित करवाकर उनको सुकून आ गया है या फिर हिन्दू विरोध में उनके पाप अभी और बढ़ने वाले हैं?


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