गंवईसुख बनाम अपसांस्कृतिक बाजारवाद 1

यस गांवों की कुटीर उद्योग खतम हो गए हैं। पेड़ लगातार काटे जा रहे हैं। कुएँ सुख गए हैं और जो बचे हैं वह सूखने के कगार पर है। ताल, पोखर, बावड़िया, छोटी नदियां और नहरें सभी अपना अस्तित्व खोते जा रहे हैं योखो चुके हैं। लाखों गांवों में पीने के पानी के लाले पड़े हुए हैं। मवेशी मर रहे हैं और खेती सूख रही है। गर्मी का बढ़ता प्रकोप जिंदगी को बदहाल कर दिया है। महाराष्ट्र, राजस्थान, तेलंगाना, गुजरात, आंध्रप्रदेश, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, बिहार, उत्तरप्रदेश, झारखंड, हरियाणा, पंजाब, तमिलनाडु जैसे अनेक राज्यों की हालात अत्यंत भयावह होती जा रही है। कहीं सूखे ने बदहाल किया है तो कहीं बरसात ने। कहीं तूफान ने तो कहीं बाढ़ने। गांव से बदहाली के चलते लगातार पलायन जारी है।


गांवों में जो समरसता, भाईचारा, सुचिता और सद्भावना हुआ करते थे वहां बाजार आकर खड़ा हो गया है। सारे रिश्ते, बाजार से तय होने लगे हैं। दूध तो दूध पानी भी बिकने लगे हैं। चौपाल में चलने वाली बैठकें, ठहाकें, किस्से और लोकगीत नये बाजार के भेंट चढ़ गए हैं। गंवई सुख की जगह बाजारु तनाव लोगों के माथे पर साफ देखा जा सकता है। बाजार ने गांव के हर व्यक्ति को आर्थिक प्रलोभन देकर अपने चंगुल में फंसा लिया है। इसी ने गांव को भी स्वार्थ, छल, प्रपंच, झूठ, हिंसा, ठकाई और आराम तलबी में रहना सीखा दिया है। गांवों के वाद्य यंत्र, कलाकार, गीत और कहकहें अपसांस्कृतिक बाजारवाद के शिकार बन गए।


आजादी के बाद सैकड़ों नये कस्बे और शहर अस्तित्व में आए हैं। वह सभी गांवों को बलि देकर। शहरों के ५० किमी. तक के गांव आज शहरों की प्रदूषित हवा, अपसंस्कृति और बचकानेपन में खपते जा रहे हैं। इसे विकास का नाम दिया जा रहा है। गांवों में आज कृषि सबसे उपजाऊ कार्य है जिसे गांव का कोई नौजवान नहीं करना चाहता है। इसलिए वह रोजगार की तलाश में शहर की ओर भागता है और कमरतोड़ मेहनत के बाद भी उसी बदहाली में रहने के लिए अभिशप्त है। खेती करना पिछड़ेपन की निशानी हो गई है। हिंदी या उसकी मातृभाषा अब उसके लिए हीनभावना का सबब बनती जा रही है। यह सब बाजारी विज्ञापनों का असर है जिसे धीमे जहर की तरह गांव के प्रत्येक व्यक्ति के नश-नश में अखबारों. टीवी सीरियलों और फिल्मों के द्वारा चढ़ाया जा रहा है। बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने बहुत चालाकी और योजनाबद्ध तरीके से मीडिया के जरिए भारत के गांवों को खत्म करने का जो अभियान २५ वर्ष पहले चलाया था, उसका असर पूरी तरह से दिखाई पड़ने लगा है। बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने भारत के गांवों को और वहां की जाति आधारित परम्परागत रोजगार को तोड़ने के लिए जो योजनाबद्ध तरीके से कार्य किया, उसका प्रतिफल है आज गांवों से जातिगत रोजगार लगभग खत्म हो गए हैं।


भारत के किसी भी गांव में चले जाइए, चारों तरफ फाय-फाय की एक हांफने वाली आवाज सुनाई पड़ती है। ऐसा लगता है, गांव बूढ़े हो गए हैं। उनके अंदर की शक्ति, शुचिता, सामर्थ्य और शांति खत्म हो गई है। न लोगों के आंखों में पानी बचा है और न ही जीवन ही। यदि कुछ दिखाई पड़ता है तो वह बाजार और केवल बाजार । बाजार की विडम्बना और संवदेनहीनता । जिसे विकास का नाम देकर आगे बढ़ाया जा रहा है।


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