ईश्वर के वैदिक नाम विज्ञानस्वरूप हैं 1

परमात्मा का नाम 'हिरण्यगर्भ' भी है। स्वामी जी इस शब्द का अर्थ सूर्यादि तेजवाले पदार्थों का गर्भ और उत्पत्ति करते हैं। इसका तात्पर्य यह है कि जिसने तेजवाले स्वतः परतः प्रकाशित लोक हैं उन सबकी उत्पत्ति एक गर्भ से होती है। यह गर्भ क्या है? आकाशस्य ग्रह, उपग्रह, तारे जो एक नियम में चालित है उनकी उत्पत्ति गर्भ से हुई है। आधुनिक वैज्ञानिक ने इस बात को सिद्ध किया है कि प्रारंभ में सृष्टि उत्पत्ति के समय सूर्य, चंद्र, पृथ्वी आदि एक महापिंड से समाहित थे। एक महा विस्फोट हआ। उस महाविस्फोट के अनन्तर पृथ्वी, सूर्य, चंद्र आदि की निष्पत्ति हुई है। इस महान् पिंड का नाम वैदिक शब्द 'हिरण्यगर्भ' है । हमारा सौरमंडल उसी विस्फोट का परिणाम है। जिसकी प्रकार परिवार में अनेक सदस्य रहते हैं उसी प्रकार हिरण्यगर्भ रूपी परिवार से उत्पन्न सदस्य सूर्यादि उसी परमात्मा के आधारस्वरुप हैं। सबका आधार, उत्पत्ति का मूल कारण होने से उसका 'हिरण्यगर्भ' नाम सार्थक और वैज्ञानिक है।


परमात्मा का एक नाम 'वृहस्पति' है। स्वामी जी लिखते हैं कि जो बड़ों से भी बड़ा और बड़े आकाशादि पिंडों का स्वामी है इससे उस परमात्मा का नाम 'वृहस्पति' है। चंद्रमा से बड़ी पृथ्विी है। पृथ्विी से १३ लाख गुना बड़ा सूर्य है। बृहस्पति ग्रह में १३०० प्रविष्टियाँ समा सकती हैसूर्य से भी लाखों गुना बड़े-बड़े सूर्य है। इतने बड़े-बड़े भूखंडों को नियम में बाँधकर उनको कौन चलाता है ? सन् १९८० के दशक में एक पुच्छल तारे की पूँछ का टुकड़ा बृहस्पति ग्रह पर गिरा था। उस पर हमारी पृथ्वी के जैसे तीन गड्ढे बन गए थे। इतने बड़े-बड़े भूखंड जिनकी कल्पना नहीं की जा सकती। उन सबका स्वामी है परमात्मा । वह उन सबसे बड़ा है। उससे बड़ा कोई नहीं है। इतना बड़ा परमात्मा मानव की चिंतनशील से परे है। इसी कारण उसका नाम 'वृहस्पति' है। यह नाम भी वैज्ञानिक अर्थप्रदान करता है 


'ईश्वर' शब्द स्वयं में वैज्ञानिक अर्थ रखता है। अनंत ऐश्वर्यवान् होने के कारण उसका नाम 'ईश्वर' है। ईश्वर का अनंत ऐश्वर्य क्या है ? उसका अनंत ऐश्वर्य है उसका परमधाम, परमधाम, परमगति या मोक्षसुख । मोक्षसुख से बढ़कर अन्य कोई सुख नहीं है। उसी सुख की प्राप्ति मानवजीवन का मुख्य उद्देश्य है। वहाँ पहुँचकर आत्मा परमात्मा के अनंत आनंद का बहदीर्घ काल तक उपभोग करता है। उसी सुख को प्राप्त करने के लिए आत्मा सदा लालायित रहता है। उसको मोटे रूप में इस प्रकार समझा जा सकता है - वह धनी व्यक्ति है। उसके पास अपार धन संपदा है। महल है। जमीन-जायदाद है । मोटर-कार है। नौकर-चाकर हैं। ये सब सबके सुक के साधन है। यही उसकेऐश्वर्य हैं। वह ऐश्वर्यशाली व्यक्तिक उसके ये ऐश्वर्य एक निश्चित सीमा में बंधे हुए हैं। परमात्मा का मोक्षसुक सीमा या बंधन से रहित है। आत्मा परमात्मा जिसकी अनंत ज्ञानपूर्ण सृष्टि का आनंदपान करता है। यह मोक्षसुख अनंत है। परमात्मा अनंत ऐश्वर्यवाला है। अनंत ऐश्वर्यवान् होने के कारण उसका 'ईश्वर' नाम वैज्ञानिक अर्थ से परिपूर्ण है। उसका दूसरा ऐश्वर्य है - यह अनंत कोटि का ब्रह्माण्ड, यह सौंदर्यशालिनी सृष्टि जो अनंत रहस्यों से भरीहुई है। प्रकृति में जितना रहस्य है वह सब परमात्मा का ऐश्वर्य ही तो है। प्रातःकाल वायु का एक शीतल झोंका आपके तन-मन को आनंद से विभोर कर देता है। प्रकृति के नजरों को देखकर न जाने कितने भावुकजन मंत्रमुग्ध होकर अपने को कुछ समय के लिये भुला दिए । सृष्टि के रहस्य को जानकर न जाने कितने वैज्ञानिक दाँतों तले अंगुली दबा लिए। ये सारे ऐश्वर्य भौतिक है जो परमात्मा के हैं। इन पर उसी का अधिकार है ।इसी से वह ईश्वर कहलाता है।


'सरस्वती' एक ऐसा शब्द है जो लोक में एक देवी विशेष के अर्थ में प्रयुक्त होता है किन्तु यह शब्द भी परमात्मा का एक नाम है जो स्त्रीलिंग में है। स्वामी जी ने इसका अर्थ किया है- जिसको विविध यथावत होवे, इससे उस परमेश्वर की नाम सरस्वती है । अर्थात् शब्द, अर्थ, संबध प्रयोग का ज्ञान । इसको इस रूप में समझें-परमात्मा की सृष्टि पूर्णतया वैज्ञानिक हैमानव का शरीर लें। यह रचना कितनी विचित्र है जिसे देखकर बड़े-बड़े वैज्ञानिक हतप्रभ रह जाते हैं। शरीर की बाह्य रचना तो विचित्र है, ही इसकी आंतरिक रचना और भी विचित्र है। मानव के मस्तिष्क में पूरा ब्रह्माण्ड समाया हुआ है। आँख एक नहीं दो बनाया । काम एक नहीं दो बनाया। हाथ एक नहीं दो बनाया। नथुने एक नहीं दो बनाया। पैर एक नहीं दो बनाया । इनको कैसे उचित स्थान पर स्थिर किया है। ऊपर चमड़ी, अंदर. रक्त-मांस, अस्थि. हृदय, यकृत, उदर आदि। फिर सपनों की अनोखी दनियां रचाई। यह सब परमात्मा का विविध विज्ञान ही है। इनका संबंध यथावत् बनकर अपनी विज्ञानवती विद्या का परिचय दिया है। इसी कारण उसका नाम 'सरस्वती' है। यह तो रही शरीर की बात । आप एक परमाणु से लेकर ब्रह्माण्ड तक की रचना में विविध विज्ञान देख सकते हैं। एक छोटे से कण या एक छोटे से पत्ते में भी आपको बहुत बड़ा विज्ञान नजर आएगा। 'सृ' धातु से 'सरस्वती' शब्द निष्पन्न है। यह धातु विविध विज्ञान अर्थ प्रतिदिन करता है। इस नाम का आधार परमात्मा की बनाई विविध वैज्ञानिक सृष्टि है।


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