छांदोग्योपनिषद्

छांदोग्योपनिषद्


18. उद्गीथ तीन अक्षरों का उत्-गी+थ से बना हैशरीर में प्राण ही उत् है क्योंकि प्राणों के होते हुए मानव हर प्रकार की उन्नति कर सकता है। अन्न धर्म है अन्न में ही सब कुछ स्थित हैवस्तुतः ओ३म् की उच्च स्वर से उपासना करने का नाम ही उद्गीथ है। उद्गीथ व प्रणव करने का नाम ही उद्गीथ है एक ही है। ये दोनों पर्यायवाची शब्द हैं।


19. पाँच इन्द्रियों, वाणी, आँख, कान, मन और प्राण में प्राण सर्वश्रेष्ठ हैं क्योंकि वाणी, आँख, कान और मन के न होने से व्यक्ति जीवित रह सकता है। परन्तु यदि शरीर से प्राण निकल जायें तो वह मर जाता है।


20. यज्ञ के निम्नलिखित 5 अंग होते हैं(1) दीक्षाः जो व्यक्ति खाता व पीता है परन्तु इनमें रमंता नहीं। उस व्यक्ति का जीवन मानो दीक्षा का जीवन है। (2) उपसदः इसके विपरीत जो व्यक्ति खाता-पीता है और उसमें रमा भी रहता हैउसका जीवन उपसद का जीवन होता है। आम विषयी व्यक्ति ऐसा ही है। संसार में अधिकांश व्यक्ति ऐसे ही होते हैं। (3) दक्षिणा: जो व्यक्ति दान, तप, अहिंसा, सत्य का जीवन व्यतीत करता है। उसका जीवन दक्षिणा का जीवन होता है। (4) स्तुत शास्त्रः जो व्यक्ति खूब हँसता, खाता व मैथून करता है उसका जीवन स्तुत शास्त्र होता है। (5) अवभृथः जीवन रूपी यज्ञ में व्यक्ति का मनुष्य रूप में पुनर्जन्म ही सोष्यति व असीष्ट है। सोष्यति का अर्थ है रस निचोड़ेगा और असीष्ट का अर्थ रस निचोड़ा। इसे ही अवभृथ का जीवन कहा जाता है।


21. तत्वमसि का अर्थ है तू वह है। तेरा आत्मतत्व ही सत् है न कि तेरा शरीर। यह उपदेश अरूण ने अपने पुत्र श्वेतकेतु को दिया था।


22. अन्न और जल तीन प्रकार का होता है। खाये हुए अन्न का स्थूल भाग मल बनता है, जो मध्य भाग है वह माँस बनता है और जो सूक्ष्म भाग है वह मन बन जाता है। इसी प्रकार पिये हुए जल का स्थूल भाग मूत्र बन जाता है, जो मध्य भाग है वह रक्त बन जाता है और जो सूक्ष्म भाग है वह प्राण बन जाता है।


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