भारत में गुरुकुल परम्परा

भारत में गुरुकुल परम्परा


मनुष्य इस धरती पर जन्म लेकर मानवोचित तरीके से ही जीकर सन्तोष व शान्ति प्राप्त कर सकता है। चिन्तनशील होना व्यक्ति का स्वभाव है। चिन्तनशीलता ही सैद्धान्तिक स्वरूप प्रदान करती है और जीवन का सैद्धान्तिक होना ही शिक्षा कहलाता है। शिक्षा का दूसरा नाम अनुशासन भी होता है। अनुशासित जीवन को बिताने के लिए ऋषियों ने चार आश्रम में विभाजित किया-1.ब्रह्मचर्य, 2. गृहस्थ,3. वानप्रस्थ,4. संन्यास। ब्रह्मचर्य अवस्था में विद्या व भक्ति अर्जन करना। गृहस्थाश्रम में भौतिक प्रवृत्ति व जिम्मेदारी पूर्वक परिवार पालन करना। वानप्रस्थाश्रम में पति-पत्नी दोनों ही घर के दायित्वों को योग्य पुत्रों को सौंपकर उनके कार्यों का निरीक्षण व ईश्वर-चिन्तन करें। संन्यास आश्रम में सारी भौतिक प्रवृत्तियों का त्याग करके केवल ईश्वर-चिन्तन करना चाहिए। इन आश्रमों का मूल ब्रह्मचर्य आश्रम है। यही अवस्था मनुष्य के शारीरिक व मानसिक विकास की अवस्था है। ब्रह्मचर्य आश्रम में मानसिक व शारीरिक विकास के लिए गरुकलों में प्रवेश कराए गए बालकों का सर्वप्रथम यज्ञोपवीत संस्कार गुरु करता था, जिसमें मनुस्मृति के अनुसार.


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