अपरिग्रह

आइए आज हम पांचवें 'यम्' 'अपरिग्रह' के विषय में चर्चा करते हैं। 
 मनुष्य जीवन का लक्ष्य ईश्वर प्राप्ति है। और ईश्वर प्राप्ति में जो-जो साधन, जो-जो विचार, जो-जो वस्तुएं आवश्यक है, सहायक हैं उनका ग्रहण करना, और अनावश्यक वस्तुओं का, अनावश्यक विचारों का परित्याग करना अपरिग्रह कहलाता है।
 अपरिग्रह का लाभ
"अपरिग्रहस्थैर्ये जन्मकथन्तासम्बोध:"
(योग २/३९)
अर्थात् - अपरिग्रह की स्थिरता होने पर भूत, भविष्यत् तथा वर्तमान जन्म से संबंधित जिज्ञासा और अनुमानित ज्ञान हो जाता है।
अर्थात् अपरिग्रह के दृढ़ हो जाने पर व्यक्ति अपने जीवन के विषय में विचार न प्रारंभ करता है कि मैं भूतकाल में कौन था, कैसा था, यह जीवन क्या है, और कैसा है, आगे भविष्य में हम सभी कैसे होंगे? भूत भविष्य और वर्तमान जीवन विषयक जिज्ञासा उत्पन्न होती है। इसका परिणाम यह होता है कि आत्मा क्या है, शरीर क्या है, इंद्रियां क्या है, और भूत, भविष्य, वर्तमान काल में इनकी क्या क्या स्थिति रहती है? मेरा कल्याण कैसे हो सकता है? और मैं दुखों से कैसे छूट सकता हूं? इत्यादि विषयों को जानने का प्रयास करता है। विषय भोगों में विविध दुख देखकर भोग मार्ग को छोड़कर योग मार्ग पर चलने लगता है। योग मार्ग पर चलकर ही मनुष्य अपने स्वरूप को अच्छी प्रकार से जान पाता है, और तब ही वह ईश्वर साक्षात्कार करने में सफल हो सकता है।
अतः हम सब को अपने जीवन में इन नियमों का पालन करने के लिए अपने अपने सामर्थ्य के अनुसार पूर्ण पुरुषार्थ करना चाहिए। क्योंकि यह ऐसे नियम हैं जो प्रत्येक जाति देश, काल, और समय में जिनका पालन किया जाना नितांत आवश्यक है। क्योंकि - 
 "जातिदेशकालसमयानवच्छिन्ना: सार्वभौमा महाव्रतम्" 
(योग २/३१) अर्थात जाति, स्थान, काल, नियम विशेष इन सब से अबाधित सब अवस्था में पालन करने योग्य अहिंसा आदि महाव्रत हैं।
आइए परमपिता परमात्मा से हम सब मिलकर प्रार्थना करें कि वह हमें इतनी सद्बुद्धि दे, इतना आत्मिक बल दे, इतनी प्रेरणा दे, इतनी सहायता दे, कि हम इन महा व्रतों का पालन करने में सफल व सक्षम हो सकें।


ओ३म् अग्ने व्रतपते व्रतं चरिष्यामि तच्छकेयं तन्मे राध्यताम्।
इदमहमनृतात् सत्यमुपैमि।।
(यजुर्वेद १/५)
अर्थात् -  हे सर्वरक्षक का प्रभु! हे सत्यभाषण आदि व्रतों के पालक! हे सत्य धर्म के उपदेशक प्रभु! मैं जो इन महाव्रतों को पालन करने का निश्चय करता हूं मेरा यह संकल्प आपकी कृपा से सिद्ध हो। और मैं इन महा व्रतों को अपने आचरण में लाने के लिए जो संकल्प करता हूं मेरा यह व्रत भी, मेरा यह संकल्प भी, आपकी कृपा से सिद्ध होवे।
ओ३म्
     आर्य कृष्ण 'निवाड़ी' 
            अध्यक्ष
 राष्ट्रीय आर्य निर्मात्री सभा                      
    जनपद ग़ाज़ियाबाद    


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