आर्य समाज की स्थापना

दयानंद सरस्वती ने संभवत: 7 या 10 अप्रैल सन्‌ 1875 ई. को बम्बई में आर्य समाज की स्थापना की[1]। इसका उद्देश्य वैदिक धर्म को पुनः शुद्ध रूप से स्थापित करने का प्रयास, भारत को धार्मिक, सामाजिक व राजनीतिक रूप से एक सूत्र में बांधने का प्रयत्न, पाश्यात्य प्रभाव को समाप्त करना आदि था। 1824 ई. में गुजरात के मौरवी नामक स्थान पर पैदा हुए स्वामी दयानंद को बचपन में ‘मूलशंकर’ के नाम से जाना जाता था। 21 वर्ष की अवस्था में मूलशंकर ने गृह त्याग कर घुमक्कड़ों का जीवन स्वीकार किया। 24 वर्ष की अवस्था में उनकी मुलाकात दण्डी स्वामी पूर्णानंद से हुई। इन्हीं से सन्न्यास की दीक्षा लेकर मूलशंकर ने दण्ड धारण किया। दीक्षा प्रदान करने के बाद दण्डी स्वामी पूर्णानंद ने मूलशंकर का नाम 'स्वामी दयानन्द सरस्वती' रखा। ज्ञान की खोज में भटकने के बाद 1861 ई. में स्वामी ने दयानंद को वेंदों की दार्शनिक व्याख्या का परिचय कराया। दयानन्द ने इन्हें गुरु बना लिया। वेदों और भारतीय दर्शन के गहन अध्ययन के बाद स्वामी जी ने यह निष्कर्ष निकाला कि आर्य श्रेष्ठ हैं, वेद ही ईश्वरी ज्ञान है तथा भारत भूमि ही श्रेष्ठ है।


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