स्वामी आनन्दबोध

   स्वामी आनन्दबोध    



           सन १९०९ में काशमीर के अनन्तनाग क्शेत्र में एक बालक का जन्म हुआ , जिसका नाम रामगोपाल रखा गया । इनके पिता का नाम लाला नन्द लाल था । आप मूलत: अम्रतसर के रहने वाले थे । यह बालक ही उन्नति व व्रद्धि करता हुआ आगे चल कर राम गोपाल शालवाले के नाम से विख्यात हुआ ।


            आप काशमीर से चलकर सन १९२७ में दिल्ली आ गए । दिल्ली आकर आप आर्य सम,आज के नियमित सदस्य बने । आप को पं.रमचन्द्र देहलवी की कार्य्शैली बहुत पसन्द आयी तथा आप ने उन्हें अपनी प्रेरणा का स्रोत बना लिया ।


          आप के आर्य समाज के प्रति समर्पण भाव तथा मेहनत व लगन के परिणाम स्वरूप आपको आर्य समाज दीवान हाल का मन्त्री बनाया गया । बाद में आप इस समाज के प्रधान बने । इन पदों को आपने लम्बे समय तक निभाया । इस आर्य समाज के पदाधिकारी रहते हुए ही आपने सामाजिक कार्यों का बडे ही सुन्दर टंग से निर्वहन किया ।


        आप की प्रतिभा का ही यह परिणाम था कि आप आर्य प्रतिनिधि सभा पंजाब के अनेक वर्ष तक अन्तरंग सद्स्य रहे । अनेक वर्ष तक आप आर्य समाज की सर्वोच्च सभा सार्वदेशिक आर्य प्रतिनिधि सभा के उपमन्त्री, उप प्रधान तथा प्रधान रहे । उच्चकोटि के व्याख्यान करता, उच्चकोटि के संगटन करता तथा आर्य समाज के उच्चकोटि के कार्य कर्ता लाला रामगोपाल जी  ने सदा आर्य समाज की उन्नति मेम ही अपनी उन्नति समझी तथा इस के लिए किसी भी सीमा तक जा सकते थे । देश के उच्च अधिकारियों से आप का निकट का सम्पर्क था तथा बडे बडे काम भी आप सरलता से निकलवा लेते थे ।


        जब अबोहर के डी ए वी कालेज में सिक्ख विद्यार्थियों ने उत्पात मचाया तथा यग्यशाला को हानि पहुंचाई तो कालेज के प्रिन्सिपल नारायणदास ग्रोवर जी ने मुझे आप से सम्पर्क कर यथा स्थिति आप के सामने रखने के लिए भेजा । आप ने मुझ किंचित से युवक की बात को ध्यान से सुना , समझा व कुछ करने के आदेश दिये ।


        जब १९७१ में अलवर में सम्पन्न सार्वदेशिक के अधिवेशन में स्वामी अग्निवेश के साथियों ने उत्पात मचाया तो आप की बात मंच द्वारा न मानने पर आप जब यहां से पलायण करने लगे तो मेरे तथा प्रा. राजेन्द्र जिग्यासु जी की प्रार्थना पर आप ने अपना निर्णय बदला तथा फ़िर से सम्मेलन को सुचारु रुप से चलाया ।


        आप ही के प्रयास से हैदराबाद सत्याग्रह को राष्ट्रीय स्वाधीनता संग्राम स्वीकार किया गया । जिसका लभ आर्य समाज को मिला । आपके नेत्रत्व में अनेक आन्दोलन व अनेक सम्मेलन किए गय । कालान्तर में आपने संन्यास की दीक्शा स्वामी स्रर्वानन्द जी से ली तथा रामगोपाल शालवाले से स्वामी आनन्द बोध हुए ।


        आप ने पूजा किसकी , ब्रह्मकुमारी संस्था आदि पुस्तकें भी लिखीं । १९७८ इस्वी में आप की सेवाओं को सामने रखते हुए आप का अभिनन्दन भी किया गया तथा इस अवसर पर एक अभिनन्दन ग्रन्थ भी प्रकाशित किया गया । अन्त में आप का  अक्टूबर १९९४ देहान्त हो गया ।


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