स्वामी ध्रुवानन्द

स्वामी ध्रुवानन्द




         गांव पानी जिला मथुरा उतर प्रदेश में आप का जन्म हुआ । आप का नाम धुरेन्द्र था तथा शास्त्री होने पर नाम के साथ शास्त्री लग गया ओर सन १९३९ में राजा उम्मेद सिंह , नरेश शाहपुर ने आप को राजगुरु की उपाधि दी तो आप के नाम के साथ राजगुरु भी जुड गया । इस प्रकार आप का पूरा नाम धुरेन्द्र शास्त्री , राजगुरु बना ।


       स्वामी सर्वदानन्द जी ने अलीगट से पच्चीस किलोमीटर दूर काली नदी के तट पर एक सुरम्य स्थान पर गुरुकुल की स्थापना की । इस स्थन का नाम हर्दुआगंज है । वास्तव में यह हरदुआगंज नामक गांव इस गुरुकुल से मात्र पांच किलोमीटर की दूरी पर है । इस गांव में ही स्वामी दयानन्द सरस्वती के अनन्य सेवक मुकन्द सिंह जी निवास करते थे । उनकी सन्तानें अब भी यहीं रहती हैं । स्वामी जी जब भी इधर आते थे तो काली नदी के पुल के पास स्थापित चौकी पर बैटा करते थे । यह चौकी गुरुकुल के मुख्य द्वार के टीक सामने है । आप की शिक्शा मुख्य रुप से इस गुरुकुल मेम, ही हुई ।


       आर्य समाज की सेवा का ही परिणाम था कि आप आर्य प्रतिनिधि सभा संयुक्त प्रान्त के प्रधान बने तथा बाद में सार्वदेशिक आर्य प्रतिनिधि सभा के भी अनेक वर्ष्ज तक प्रधान रहे ।  आर्य समाज के आन्दोलनों में आप स्स्दा ही बट चट कर बाग लेते थे । इस कारण ही आप हैदराबाद सत्याग्रह में भी आगे आए तथा इस आन्दो;लन का नेत्रत्व किया ।


      आप ने जब संन्यस लिया तो आप को स्वामी ध्रुवानन्द का नाम दिया गया । आप की सम्पादित  एक पुस्तक सन १९३८ इस्वी में शाहपुर से ही प्रकाशित हुई । इस पुस्तक में विवाह संस्कार के अन्तर्गत ” वरवधू के बोलने योग्य मंत्र ” शीर्षक दिया गया । दिनांक २९ जून १९६५ इस्वी को आप का देहान्त हो गया ।



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