ऋषि दयानन्द का स्वराज्य चिन्तन

स्मृति शेष डॉ. भवानी लाल भारतीय स्वामी दयानन्द के अनन्य अनुयायी थे। उनकी लेखनी से स्वामी दयानन्द के दर्शन पर उच्च स्तरीय साहित्य का सृजन हुआ। हर दिवाली से पहले उनका एक लेख आ जाया करता था। दयानन्द के स्वराज्य चिंतन पर पूर्व प्रकाशित उनका एक लेख पाठकों के लिए प्रस्तुत कर रहे है - सम्पादक


भारत के राष्ट्रीय आन्दोलन में पूर्ण स्वराज्य को अपना लक्ष्य 'बनाने का विचार 1929 में


उस समय आया जब इण्डियन नेशनल कांग्रेस ने अपने लाहौर अधिवेशन में पूर्ण स्वराज्य प्राप्ति को भारतवासियों का लक्ष्य घोषित किया। उससे पहले लोकमान्य तिलक ने स्वराज्य को भारतवासियों का जन्मसिद्ध अधिकार बताया था और उसे प्राप्त करने के लिए अन्तिम क्षण तक प्रयत्न करने की प्रतिज्ञा की थी। परन्तु भारतीय नवजागरण के पुरोधा दयानन्द सरस्वती ने 1875 में (कांग्रेस की स्थापना के दस वर्ष पूर्व) स्वराज्य की महिमा का उल्लेख करते हुए अपने ग्रन्थ सत्यार्थ प्रकाश में लिखा-"चाहे कोई कितना ही करे किन्तु जो स्वदेशी राज्य होता है वह सर्वोपरि उत्तम होता है। किन्तु विदेशियों का राज्य चाहे माता-पिता के समान सुखदायक, न्याययुक्त तथा मतमतान्तर के आग्रह से शून्य भी क्यों न हो, कदापि स्वीकार करने के योग्य नहीं होता।" दयानन्द के इस वाक्य में भारत की शासक महारानी विक्टोरिया के उस आश्वासन (1858 में सिपाही विद्रोह समाप्ति पर राजकीय घोषण पत्र के रूप में) का प्रत्यक्ष प्रत्याख्यान दिखाई देता है, जिसमें ब्रिटिश रानी ने भारतवासियों के दमनरूपी घावों पर मरहम लगाने जैसे वाक्यों का प्रयोग कर कहा था कि भविष्य के शासन में न तो भारतवासियों से न्यायालयों में भेदभाव किया जायेगा और न धर्म के आधार पर किसी प्रकार का पक्षपात किया जायेगा। साथ ही स्वयं एक स्त्री और माता होने के कारण रानी विक्टोरिया भारतवासियों के प्रति पुत्रवत्सला माता की भांति प्रेम दिखलाने की भी प्रतिज्ञा करती है। वह स्वयं माता तथा दादी, नानी थी


स्वामी दयानन्द भारत को स्वतंत्र और स्वाधीन देखने के लिए कितने उत्सुक थे यह उनके एक ग्रन्थ 'आर्याभिविनय में किये गये ईश्वर की प्रार्थनापरक वेदमंत्रों के अर्थों से भी स्पष्ट होता है जहाँ उन्होंने सर्वशक्तिमान् परमात्मा को 'महाराजाधिराज' कह कर सम्बोधित किया तथा उनसे स्वदेश को स्वाधीनता दिलाने में सहायक होने की प्रार्थना की। 'हम सदा स्वतंत्र रहें और हम कभी पराधीन न हों इस प्रकार के क्रान्तिकारी विचार व्यक्त करना दयानन्द जैसे स्वाधीनचेता व्यक्ति के लिए ही सम्भव थे जबकि 19वीं शताब्दी के अन्य महापुरुष अंग्रेज़ों के सुराज्य (स्वराज्य नहीं) की प्रशंसा कर रहे थे और उस राज्य के चिंरजीवी होने की प्रार्थना करते थे। साहित्य या काव्य में जिस प्रकार व्यंग्यार्थ को महत्त्व दिया गया है, इसी व्यंग्यार्थपूर्ण शैली का प्रयोग करते हुए स्वामी दयानन्द ने संस्कृत संवादों की पुस्तक 'संस्कृत वाक्य प्रबोध' में निम्न प्रकरण लिखा। यह उन दिनों की बात है जब अफगानों और ब्रिटिश सत्ता में युद्ध छिड़ा था। सैनिक शक्ति में कमज़ोर होने पर भी अफगान सेनाएँ जी जान से लड़ रही थी और अंग्रेज़ सेनाएँ आक्रमण का प्रतिकार कर रही थीं। इस संदर्भ में "संस्कृत वाक्य प्रबोध' के निम्न संवाद को देखें


"प्रश्नकर्ता - क्या कारण है कि ताकत में कम होने पर भी अफगान लोग शत्रु से भिड़ रहे हैं और स्वदेश रक्षा में जी जान की ताकत लगा रहे हैं? उत्तर-अरे भाई, यह तो पक्षियों का भी स्वभाव होता है कि यदि कोई उनके आशियाने (घोंसला) पर दुर्भावना से हमला करता है जो वे उसका प्रतिकार अपनी चोंच या पंजों से भी करते हैं। इस वाक्य के द्वारा स्वामी दयानन्द देशवासियों को प्रेरित करते हैं कि यदि पक्षीगण अपने घर को बचाने के लिए जान की बाजी लगा सकते हैं तो प्राणियों में सर्वश्रेष्ठ मनुष्य या हम भारतवासी अपने देश की स्वाधीनता के लिए प्राणपण से तत्पर क्यों नहीं हो सकते? दयानन्द ने निर्भीकता से स्वराज्य का शंखनाद किया। अपने धर्मप्रचार हेतु किये गये व्यापक देशभ्रमण के दौरान जब कभी अवसर आता दयानन्द स्वराज्य की महिमा बताने तथा उसके लिए प्रयत्नशील होने के लिए लोगों को प्रेरणा देते। उत्तरप्रदेश में वे एक स्थान पर जब स्वराज्य के महत्त्व और पराधीनता के अभिशापों का वर्णन कर रहे थे, तो उनकी सभा में भारत के तत्कालीन प्रधान सेनापति जनरल रावर्ट्स आये और हैट उतार कर वक्ता के प्रति सम्मान व्यक्त किया। व्याख्यान के समाप्त होने पर वक्ता (दयानन्द) के प्रति कहा "आपकी निर्भीकता और स्वदेशप्रेम धन्य है। सर्वोच्च सेनापति के सामने भी आप देशवासियों को स्वराज्य के लिए उत्साहित करते हैं, यह आपके व्यक्तित्व की विशेषता है।" पंजाब के एक नगर में उन्होंने ब्रिटिश अफसरों को सावधान करते हुए कहा-"जिस प्रकार आलस्य और प्रमाद के कारण हम आर्यों (भारतवासियों) को पराजित होना पड़ा, उसी प्रकार यदि शासक वर्ग का व्यवहार रहा तो उन्हें अपना राज्य गंवाना पड़ सकता है।" दयानन्द की इसी राष्ट्रीय विचारधारा को लक्ष्य में रखकर श्रीमती ऐनी बेसेन्ट ने कहा था-"दयानन्द प्रथम व्यक्ति था जिसने भारत भारतीयों के लिए (India for Indians) का नारा लगाया। महात्मा गाँधी ने 1942 में भारत महात्मा गाँधी ने 1942 में भारत छोड़ो (Quit India) का नारा हमें दिया था किन्तु दयानन्द ने तो उससे भी पहले पटना के एक अंग्रेज़ व्यवसायी मि. जोन्स से वार्तालाप के प्रसंग में कहा-"यदि मेरे कहे अनुसार भारतवासी स्वराज्य साधना करें तो आप लोगों (अंग्रेज़ों को) यहाँ से अपना बिस्तर गोल करना पड़ेगा।" दयानन्द की यह भविष्यवाणी निधन के चौंसठ वर्ष बाद 1947 में सार्थक हुई।


हरिद्वार का प्रसाद


मिल सके और कृषि के लिए अच्छे बैल मिल सकें। अब देश में लोकतन्त्र राज्य है, हमारी अपनी सरकार है, वह तो इस सेवा में लगी ही है, परन्तु जब तक जनता स्वयं देश की त्रुटियों को पूरा नहीं करती तब तक अकेली सरकार भी सफल नहीं हो सकती। अतएव सब मिल कर गो-वृद्धि के यत्न में तत्पर हो जाओ। इस समय जो सज्जन इस सेवा को करेंगे, वे अक्षय पुण्य के भागी होंगे। दूसरी बड़ी सेवा यह है कि अपठित लोगों को हिन्दी पढ़ाओ। दिन को, रात्रि को, प्रातः सायं जब भी समय मिले, ग्राम-ग्राम में जाकर हिन्दी का प्रचार करो ताकि अगले हरिद्वार पर भारत देश में कोईबाल, वृद्ध, युवा, युवती ऐसा न हो जो हिन्दी पढ़ लिख न सके। इसी प्रकार घर से बेघर हुई पीड़ित जनता की हर प्रकार से सेवा करो। पीड़ितों को भी चाहिए कि वे निराशा छोड़कर राष्ट्रनिर्माण में सहायता दें। एक और अत्यन्त आवश्यक सेवा यह है कि देशवासियों को शराब, भङ्ग, तम्बाकू इत्यादि नाश करने वाले नशों से बचाया जाये ताकि बुद्धि की रक्षा हो सके और धन बच सके।


जनता में यह भाव भी पैदा करना चाहिए कि हाथ से काम करने का स्वभाव हो जाय, कोई न कोई हुनर सीख कर देश का धन बढ़ाना चाहिए। ___ अब आप समझे, मैंने जो चार ‘स' कहे थे उनका कितना बड़ा महत्त्व है? और क्या यही प्रसाद सर्वोत्तम नहीं है? यह कहकर महात्मा मौन हो गए और श्रोतागण एक साथ पुकार उठे सर्वोत्तम, सर्वोत्तम। तो भैया, मैंने तो यही प्रसाद हरिद्वार के मेले से ले जाने का निश्चय कर लिया है। निस्सन्देह, यदि ऐसा प्रसाद ये लाखों लोग, जो हरिद्वार में पधारते हैं, साथ जायें, तो फिर भंवर में पड़ी देश और संसार की नैया शीघ्र पार पहुँच जाये। आइए प्यारे प्रभु से कल्याण की प्रार्थना करें ओम् पवमानः सो अद्य नः पवित्रेण विचर्षणिः। यः पोता स पुनातु नः।। (ऋ. 6/67/22) ओ३म् प्रभु पवमान है, पवित्र करने वाला है, वह आज अपनी पवित्रता की शक्ति से हमें पवित्र करे। ओम् एतो न्विन्द्रं स्तवाम शुद्ध साम्ना। शुद्धैरुक्थैर्वा वृध्वांसं शुद्ध आशीर्वान्ममत्तु।। (ऋ. 8/15/7) आओ भक्तो! हम शुद्ध-हृदय होकर, पवित्र साम के गीतों से, और पवित्र ऋग्वेद के भजनों से शक्तिमान् प्रभु की स्तुति करें, जो पवित्र है और सबसे बढ़ा हुआ है, वह पवित्र हमारी पवित्र आशाओं का मालिक ओम् त्वं हि न पिता वसो त्वं माता शतक्रतो बभूविथ। अधा ते सुम्नमीमहे।। (ऋ. 8/98/11) सहस्त्रों शक्तियों तथा कर्मों वाले दयालु! तू हमारा पिता है, तू हमारी माता है, इसी कारण हम तुझ से कल्याण की याचना करते हैं।


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