वृद्धों की दिनचर्या



वृद्धों की दिनचर्या




         वृद्धों की दिनचर्या:- सेवानिवृत्त होने पर क्या करें? समय कैसे बिताया जाये? यह समस्या बहुतों को सताती है। ऐसा इसलिये होता है, क्योंकि अधिकांश लोग उद्देश्यहीन जीवन जीते हैं। वे पैदा हो गये, इसलिये जीना पड़ता है। खाने-पीने के आगे कुछ सोचते ही नहीं। दयानन्द कॉलेज शोलापुर में विज्ञान के एक अत्यन्त योग्य प्राध्यापक टोले साहिब थे। धोती पहने कॉलेज में आते थे। अध्ययनशील थे, परन्तु थे नास्तिक। एक बार वह हमारे निवास पर पधारे। मेरे स्वाध्याय व अध्ययन की उन्होंने वहाँ बैठे व्यक्तियों से चर्चा चला दी। वह सेवानिवृत्त होने वाले थे। उनकी पुत्रियों के विवाह हो चुके थे। अपने बारे में बोले, मेरी समस्या यह है कि रिटायर होकर समय कैसे बिताऊँगा? मैं नास्तिक हूँ। मन्दिर जाना, सन्ध्या-वन्दन में प्रात:-सायं समय लगाना, सत्संग करना, यह मेरे स्वभाव में नहीं।


        पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय जी से प्रात: भ्रमण करते समय एक व्यक्ति ने पूछा, मुझे बताइये मैं रिटायर होने वाला हूँ। रिटायर होकर क्या करूँ? उपाध्याय जी ने कहा, जो आप अब तक करते रहे हो, वही करोगे। यह उत्तर बड़ा मार्मिक है। कई व्यक्ति रिटायर होने पर मुझसे भी यही प्रश्न पूछते हैं कि आप दिनभर व्यस्त रहते हैं, हमें भी कुछ बतायें, हम क्या करें?


       डॉ. वसन्त जी का उदाहरण:- परोपकारी के एक प्रेमी पाठक डॉ. स.ल. वसन्त ९२ वर्ष पूरे करने वाले हैं। देश के एक जाने-माने आयुर्वेद के आचार्य रहे हैं। अब बच्चे कोई काम-धंधा नहीं करने देते। कई प्रदेशों में उच्च पदों पर कार्य कर चुके हैं। वह दिनभर गायत्री जप, ओ३म् का नाद और वेद के स्वाध्याय में व्यस्त-मस्त रहते हैं। परोपकारिणी सभा से चारों वेद भाष्य-सहित मंगवाये। डॉ. धर्मवीर जी, आचार्य सोमदेव जी, कर्मवीर जी व लेखक उनके दर्शन करने गये थे। तब एक वेद का स्वाध्याय पूरा करके दूसरे वेद का स्वाध्याय आरम्भ किया था।


      अब उन्हें असली महात्मा पुस्तक भेंट करने गया, तो मेरे साथ मेरा नाती पुलकित अमेरिका में एक गोष्ठी में भाग लेने से पूर्व उनका आशीर्वाद लेने गया। हम यह देखकर अत्यन्त दंग रह गये कि आप तब तीन वेद पूरे करके चौथे का पाठ कर रहे थे। अपनी दिनचर्या के कारण वह सदा प्रसन्नचित्त रहते हैं। शरीर में किसी विकार का प्रश्न ही नहीं। परोपकारी के आरपार जाकर उन्हें चैन आता है।


       ऐसे ही मैंने आचार्य उदयवीर जी को सद्ग्रन्थों के स्वाध्याय व अनुसन्धान में डूबा देखा। जीवन की अन्तिम वेला में भी उनकी दिनचर्या सबके लिये एक उदाहरण थी। जो व्यक्ति आनन्दपूर्वक वृद्धावस्था में जीना चाहता है, उसे अपनी शास्त्र-सम्मत दिनचर्या बनानी चाहिये। अमृत वेला में उठना, भ्रमण, प्राणायाम, व्यायाम, उपासना व स्वाध्याय को जीवन का पौष्टिक आहार मानकर जीने वाले सुखपूर्वक जीते मिलेंगे। संसार से सुखपूर्वक विदा होने के इच्छुक भी दिनचर्या बनाकर जीना सीखें और कोई मार्ग है ही नहीं।





 


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